कन्यादान का शास्त्रसंमत समयावधि
गृहस्थीओ की कन्या संतान रजोदर्शन को प्राप्त होते ही पिता को पनोती बैठ जाती है। जब उसका विवाह होता है तो वो पनौती पति को बैठ जाती है -- एसा कुछ शनि से भी दृष्टिगोचर होता है -- और रजोदर्शन होते ही सुपात्र को कन्यादान न होने के कारण पिता को भ्रूणहत्या ब्रह्महत्या का पाप लगता है यह भी कारण होता है -- पनौती भी तीन प्रकार की होती है शुभ फलदायक पनौती- मध्यम फलदाई और अनिष्ट फलदाई/ अति अनिष्टकारी पनौती होती है - पुत्री के रजोदर्शन से १२ वर्ष की पनौती शुभकारी - १२ से १६/१८/१९ (वर्तमान मे जो मनघडंत विवाह योग्य समयावधि है १८/१९ ) वर्ष तक की पनौती मध्यम फलप्रद और पुत्री के १६ वर्ष की आयु के बाद कठीन प्रायश्चित के कारण पिता पर अनिष्टकारी पनौती सिद्ध होती है - इसका प्रायश्चित्त न होने के कारण दिन प्रतिदिन अत्यंत अनिष्टकारी पनौती सिद्ध होती है -- पति यदि अपने स्वधर्मपालन से विमुख हो द्विज होने पर वैदिक धर्म से विमुख हो तो पति के लिए भी यह पनोति मध्यम या अनिष्टकारी होती है - मूलतः सिद्धांत यह है कि इहलोक और परलोक के कल्याण के लिए विवाह के बाद संभवतः विधि विधान का पालन करके अपने ग...