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वर्धापनदिन विधान

 ॥ अथ वर्धापनविधिः ॥ આ વિધિ બાળકના જન્મથી એક વર્ષપર્યંત પ્રત્યેક માસે જન્મ-તિથિના દિવસે કરવો, અને તે પછી પ્રત્યેક વર્ષે વર્ષગાંઠના દિવસે કરવો. બાલ્યાવસ્થા હોય ત્યાંસુધી પિતાએ ને તે પછી તેણે પોતાની જાતે કરવો. ॥ अथ वर्धापनप्रयोगः ॥ પોતાના બાળકની જન્મતિથિના દિવસે માતાપિતાએ ઉત્સાહપૂર્વક મંગલસ્નાન કરી, યથાવૈભવ વસ્ત્રાલંકાર ધારણ કરી, રંગાદિ વડે અલંકૃત કરેલી પવિત્રભૂમિમાં પૂજનસાહિત્ય પાસે લઈ, તથા મંગલસ્નાન કરાવી વસ્ત્રાલંકારથી શણગારેલા પોતાના બાળકને માતાએ પોતાની પાસે લઇ, સ્ત્રીપુરુષે પોતાનાં આસનો ઉપર બેસવું, ને તે પછી આચમન-પ્રાણાયામ કરી, નીચે પ્રમાણે બોલી સંકલ્પ કરવોઃ– अत्राद्य महामाङ्गल्यप्रदे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुक-वासरे अस्य बालस्यायुष्याभि- वृद्धयर्थं वर्धापनाख्यं कर्म करिष्ये ॥ આ ક્રિયા પોતાની મેળે કરવાની હોય તો ममायुष्याभिवृद्ध्यर्थं ઉચ્ચારણ કરવુ -  તે પછી તેના અંગભૂત કર્મો ગણપતિપૂજન તથા પુણ્યાહવાચન કરવાનો સંકલ્પ નીચે પ્રમાણે બોલીને કરવોઃ- तत्र निर्विघ्नतासिद्धयर्थं गणपतिपूजनं पुण्याहवाचनं च करिष्ये ॥ પછી આચાર્ય આજ્ઞાનુસાર ગણપતિપૂજન અને પુણ્યાહવાચન વિધિ કરવી. પછી એક ...

सूर्य

सूर्य स्तुति हिंदू धर्म में भगवान सूर्य को जीवन का आधार, ऊर्जा का स्रोत और सत्य का प्रतीक माना गया है। उन्हें प्रत्यक्ष देवता कहा गया है, क्योंकि वे प्रत्यक्ष रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। सूर्य देव की उपासना से आत्मविश्वास, स्वास्थ्य, तेज, और मान-सम्मान प्राप्त होता है। सूर्य स्तुति का नियमित पाठ जीवन में सफलता, मानसिक स्पष्टता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। सूर्य भगवान की स्तुति आदित्याय च सोमाय मङ्गलाय बुधाय च। गुरु शुक्र शनिभ्यश्च राहवे केतवे नमः॥ जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्। तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्॥ आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर। दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥ सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम्। श्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्यं प्रणम्यहम्॥ सप्तलोकप्रकाशं च तेजोराशिं समुद्भवम्। सप्तवर्णैः समायुक्तं सूर्यं देव नमोऽस्तु ते॥ यः शत्रूणां विनाशाय रक्षणाय च सज्जनम्। सदैव पथदर्शी च तं सूर्यं प्रणम्यहम्॥ सर्वदोषहरं देवं सर्वरोगनिवारणम्। अर्जुनस्य सखा कृष्णे साक्षात् देवदिवाकरः॥ नमस्ते रविरूपाय नमस्ते दिव्यचक्षुषे। नमस्ते सर्वलोकस्य जीवनं तेजसां न...

वैदिक विवाह

 मनुष्यकृत संविधानिक व्यवस्था से पाणिग्रहण करने वाले कथित वैदिकों को मेरी करबद्ध प्रार्थना है उत्तम धर्म के लिए मनु और शतरूपा से विवाह के मान्य सिद्धांतो को जानना और स्वीकार करना चाहिए यदि स्वीकार नहीं कर सकते तो मनुष्य कृत परंपरा बंध करके शास्त्रीय वैदिक प्रणयफाग रचाकर उत्तमोत्तम ब्रह्मादि प्राजापत्य लोक की प्राप्ति और पूर्वजों के समस्त कल्याण के लिए वैदिक धर्म का स्वीकार करके अपने स्वधर्म का विधिवत पालन करें!  पं० धवलकुमार शास्त्री गुजरात

दक्षिणा

 दक्षिणा का महत्व -:-  बिना दक्षिणा किया हुआ कर्म वृथाक्रिया हो जाती है जिसका कोइ फल नही मिलता -:- अल्प दक्षिणा से कर्म विफल होता है। *ददाति नो दानं ग्रहीता तन्न याचते॥ उभौ तौ नरकं यातश्छिन्नरज्जुर्यथा घटः । नार्पयेद्यजमानश्चेद् याचितारं च दक्षिणाम् ॥ भवेद् ब्रह्मस्वापहारी कुम्भीपाकं व्रजेद् ध्रुवम् । वर्षलक्षं वसेत्तत्र यमदूतेन ताडितः ॥ ततो भवेत् स चाण्डालो व्याधियुक्तो दरिद्रकः । पातयेत् पुरुषान् सप्त पूर्वान् वै पूर्वजन्मनः ॥(ब्रह्मवैवर्त ० प्रकृतिखण्ड ४२।६०-६३)”* अर्थ 👇 उचित दक्षिणा न दैने वाले यजमान और दक्षिणा के अधिकारी ब्राह्मण दक्षिणा की याचना न करे तो दौनों नरक में जाय उचित दक्षिणा न दैनेवाला यजमान कुम्भीपाकनरक कौ तीनलाख वर्षतक यमदूतों से यातना भूगतकर पृथ्वीपर दरिद्र चाण्डाल योनि में जन्म लेता हैं, दक्षिणा न दैनेवाले यजमान अपने पूर्व के सातपिढी़ के पितरों का भी नरक में पतन करवाता हैं। ⭕ जय महादेव ‼️ पं० धवलकुमार शास्त्री गुजरात

शिवरात्रि पूजा संकल्प

 शिवरात्रौ संक्षिप्त चतुर्यामयामपूजा - संकल्प:- नमो भगवते रुद्राय । विष्णुः विष्णुः विष्णुः। फाल्गुनमासे(माघमासे)कृष्णपक्षे त्रयोदश्यां (चतुर्दश्यां )तिथौ __वासरे श्रीसाम्बसदाशिवप्रीत्यर्थं प्रथमयामपूजां (द्वितीययाम/तृतीययाम/चतुर्थयाम पूजां) करिष्ये। यथालाभ उपचारद्रव्य से गणपति का संक्षिप्तपूजन करें, तदनन्तर "शिवाय नमः" इसी मन्त्र से मिट्टी का शिवलिंग निर्माण करे जो अंगुठे से लेकर बारह अंगुल तक के प्रमाण में से यथानुकूल व्यवस्थानुरूप हो। ह्रीं ईशानाय नमः - मन्त्र से आसन , पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, दुग्धस्नान करावें, शिवपंचाक्षर स्तोत्र "नागेन्द्रहाराय ०० आदितः" से पल्लव या पुष्प की सहायता से दूध से ही अभिषेक करें। (द्वितीय प्रहर में दहीं से, तृतीय प्रहरमें केवल घृत , चतुर्थ प्रहर में शहद से स्नानाभिषेक करें) अभिषेकान्ते जल द्वारा सीधे हाथ से अन्य पात्र में तर्पण करे " सभी नाम के अन्तमें "तर्पयामि" पद लगावें "भवं देवम्" शर्वं देवम्" ईशानं देवम्" पशुपतिं देवम्" रुद्रं देवम्" उग्रं देवम्" भीमं देवम्" महान्तं दे...

भ्रममाकुमारी

 #ब्रह्मकुमारी_या_भ्रमकुमारी 'ओम् शान्ति', 'ब्रह्माकुमारी'... हम लोगों ने छोटे-बड़े शहरों में आते-जाते एक साइन बोर्ड लिखा हुआ देखा होगा *'प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय'* तथा मकान के ऊपर एक लाल-पीले रंग का झंडा लगा हुआ भी देखा होगा, जिसमें अंडाकार प्रकाश निकलता हुआ चित्र अंकित होता है। इस केन्द्र में व आसपास ईसाई ननों की तरह सफेद साड़ियों में नवयुवतियाँ दिखती हैं। वे सीने पर *'ओम् शान्ति'* लिखा अंडाकार चित्र युक्त बिल्ला लगाये हुए मंडराती मिलेंगी। आप *विश्वविद्यालय* नाम से यह नहीं समझना कि वहाँ कोई छात्र-छात्राओं का विश्वविद्यालय अथवा शिक्षा केन्द्र है, अपितु *यह सनातन धर्म के विरुद्ध सुसंगठित ढ़ंग से विश्वस्तर पर चलाया जाने वाला अड्डा है।* *स्थापना*:  इस संस्था का संस्थापक *लेखराज खूबचंद कृपलानी* था। इसने अपने जन्म-स्थान *सिन्ध* (पाकिस्तान) में दुष्चरित्रता व अनैतिकता का घोर ताण्डव किया, जिससे जनता में इसके प्रति काफी आक्रोश फैला। तब यह सिन्ध छोड़कर सन *1938 में* कराची भाग गया। इसने वहाँ भी अपना कुकृत्य चालू रखा, जिससे जनता का आक्रोश आसमान पर...

वैदिक विवाह कुष्मांडहोम प्रायश्चित

वैदिकविवाह में आयु अतिक्रमण और अपूर्ण कुष्मांड होम प्रायश्चित बना पाखंड :  देश काल स्थिति का सिद्धांत के पालन के साथ उचित समय पर उचित विधि विधान होने से ही सिद्धि की प्राप्ति होती है - कुष्मांड होम प्रायश्चित का कोई विरोध नहीं हम इस विधान का पूर्ण श्रद्धा से स्वीकार भी करते हैं। यह लेख से हमारा किसी की वैदिक आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं है। किसी के स्वीकार अस्वीकार से हमें कोइ फर्क नहीं पड़ता यह आपका निजी वैदिक अधिकार है - यह वैदिक समय सूचकता हेतु है - जो आजकल दुर्लभ है।शायद आधुनिक काल में किसी को पसंद न भी आए  वर्तमान समय के मेरे निजी वैदिक मर्यादा मूलक विचार है । मूल विषय पढ़ना गहन अभ्यास करना परिबलो का मर्यादा का भी विचार करना  उत्तमोत्तम विश्लेषण होता है।केवल लिखा है तो कर लिया और रहस्यो को न जानना पाखण्ड है -  वैदिक विवाहविधि से कन्यादान का उचित आरंभिक काल - अंतिमकाल अतिक्रमण -भूतकाल -वर्तमान काल पर विचार करें अंत तक जरूर पढ़ें  विद्वज्जनों को निवेदन है आप कोइ भी पक्ष रखें लेकिन सिद्धांत को , समयस्थिति को और जिस समय प्रायश्चित लिखा गया उस प्रायश्चितकाल पर उस ...