शिवरात्रि पूजा संकल्प

 शिवरात्रौ संक्षिप्त चतुर्यामयामपूजा - संकल्प:- नमो भगवते रुद्राय । विष्णुः विष्णुः विष्णुः। फाल्गुनमासे(माघमासे)कृष्णपक्षे त्रयोदश्यां (चतुर्दश्यां )तिथौ __वासरे श्रीसाम्बसदाशिवप्रीत्यर्थं प्रथमयामपूजां (द्वितीययाम/तृतीययाम/चतुर्थयाम पूजां) करिष्ये। यथालाभ उपचारद्रव्य से गणपति का संक्षिप्तपूजन करें, तदनन्तर "शिवाय नमः" इसी मन्त्र से मिट्टी का शिवलिंग निर्माण करे जो अंगुठे से लेकर बारह अंगुल तक के प्रमाण में से यथानुकूल व्यवस्थानुरूप हो। ह्रीं ईशानाय नमः - मन्त्र से आसन , पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, दुग्धस्नान करावें, शिवपंचाक्षर स्तोत्र "नागेन्द्रहाराय ०० आदितः" से पल्लव या पुष्प की सहायता से दूध से ही अभिषेक करें। (द्वितीय प्रहर में दहीं से, तृतीय प्रहरमें केवल घृत , चतुर्थ प्रहर में शहद से स्नानाभिषेक करें) अभिषेकान्ते जल द्वारा सीधे हाथ से अन्य पात्र में तर्पण करे " सभी नाम के अन्तमें "तर्पयामि" पद लगावें "भवं देवम्" शर्वं देवम्" ईशानं देवम्" पशुपतिं देवम्" रुद्रं देवम्" उग्रं देवम्" भीमं देवम्" महान्तं देवम्" तर्पयामि। ह्रीं ईशानायनमः मन्त्र से वस्त्र। आचमन। (१ प्रहर "शिवायनमः। २ प्रहर "शङ्कराय नमः। ३प्रहर " महेश्वरायनमः। ४ प्रहर रुद्रायनमः। ) -- इन्ही मन्त्रो से उक्त प्रहर में गन्ध, अक्षत तिल (२ प्रहर - अक्षत यव, ३ प्रहर - अक्षत गेहूँ, ४ प्रहर - अक्षत मूँग कँगू उड़ीद) कनेर गैंदे के पुष्प, (२ प्रहर - कमल , बिल्वपत्र, ३ प्रहर - आक के पुष्प ४ प्रहर में शंखुष्पी, जूही , चम्पा के पुष्प) लिंग के पश्चिम में - श्वेतपुष्प से "सद्योजाताय नमः" उत्तर में - तुलसी, गैंदे के पुष्प से "वामदेवाय नमः" दक्षिण में - कनेरपुष्प से "अघोरायनमः" पूर्व में - दूर्वा , आक पुष्पों से "तत्पुरुषाय नमः" शिवलिंगपर - बिल्वपत्र, धतूरे के पुष्प से " ईशानाय नमः" शिवलिंगसमीप मूलभाग में - चिरचीटा, बकुल पुष्प से "हाटकेश्वराय नमः - इस प्रकार पंचवक्त्रपूजन अधिके हाटकेश्वर की भी पूजा करके कर्पूर केसर रक्तचंदनचूर्ण , कचूर चूर्ण , हल्दी, भस्म आदि (१ प्रहर "शिवायनमः। २ प्रहर "शङ्कराय नमः। ३प्रहर " महेश्वरायनमः। ४ प्रहर रुद्रायनमः। ) -- इन्ही मन्त्रो से उक्त प्रहर में पूजन करें। यथाशक्ति "शिवाय नमः" मन्त्र से बिल्वपत्र, तुलसीपत्र, पुष्प आदि जो सम्भव हो वह समर्पित करें। शिवलिंग के वामभाग में अक्षत से शक्ति का पूजन - " उमादेव्यैनमः, शंकरप्रियायै, पार्वत्यै, गौर्यै, कालिन्द्यै, कोटर्यै, विश्वधारिण्यै, शिवायै, गंगादेव्यै नमः । एकादशरुद्रपूजन अक्षत से - अघोराय , पशुपतये, शर्वाय, विरूपाक्षाय, विश्वरूपाय, त्र्यंबकाय, कपर्दिने, भैरवाय, शूलपाणये, ईशानाय, महेशाय नमः। पार्षदपूजा अक्षत से लिंग के सामने - रावणाय नमः। बाणासुराय नमः। चण्डेश्वराय नमः। नन्दीने नमः। भृंगरिटये नमः। ( गणपतये नमः, षड्मुखाय नमः) १. प्रहर "शिवायनमः " २ प्रहर - शङ्करायनमः" ३- प्रहर "महेश्वराय नमः" ४ प्रहर - रुद्राय नमः - इन मन्त्रों से धूप- दीप - नैवेद्य अर्पण करें (१ प्रहर बिना जल के देशी गाय के दूध में पकी खीर, २ प्रहर - नारियेल के जल , केले के जल अथवा देशी गाय के दूध के संयोग से बने गेहूँ गुड के लड्डु, ३ प्रहर - नारिकेल अथवा केले के जल के संयोग से बने उड़ीद+मूँग की दाल के वड़े , ४ प्रहर - दूध गेहूँ या रवा के संयोग से बना हलुवा ) 



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 नैवेद्य में लगने वाली सभी कच्ची सामग्री सीधा बाजार से बिलकूल नया खरीदे, सामान्य जल का उपयोग न करे, मिट्टी खटाई जल आदि से चूल्हा बर्तन आदि वस्तु साफ करें , स्नान करके बिना सीला शण आदि के वस्त्र पहने ही नैवेद्य पकाएं - साफ धूले कपड़े का उपयोग करें , चीमटे का उपयोग न करें , बनाते समय पहने कपड़े, बाल और शरीर के छीद्रों का तथा स्नानरहितों का स्पर्श न करें , बाल आदि का स्पर्श होनेपर तुरंत हाथ धोएं , स्नानरहितों के स्पर्श होने पर पुनः सचैल स्नान करें, नैवेद्य बनाते समय खाँसी, छींक लगनेपर तुरंत ही दूरीपर जाएं हाथ धोएं, ऊंचे स्वर में बातें न करे थूंक के छींटे गिरने की संभावना रहती है सावधानी रखें ================ 


ताम्बूल -सूपारी -लवेंग आदि मुखवास , दक्षिणा " पूर्वोक्त प्रहरभेद के नाममन्त्र से अर्पण करें। 


प्रहर १ बिल्वफल गंध पुष्प सहित अर्घ्यदान - 

नमः शिवाय शान्ताय सर्वपापहराय च। शिवरात्रौ मया दत्तं गृहाणार्-घ्यमिदं प्रभो। शिवरात्रि व्रतं देव पूजाजप परायणः। करोमि विधिवत् दत्तं गृहाणार्-घ्यं नमोस्तुते।। 


प्रहर २- बीजौरा गंध पुष्प सहित अर्घ्यदान - 

मया कृतान्यनेकानि पातकानि च शङ्कर। गृहाणार्-घ्यमुमाकांत शिवरात्रौ प्रसीद मे। नमः शिवाय शांताय सर्वपापहराय च। शिवरात्रौ ददाम्यर्-घ्यं प्रसीद उमया सह।। 


प्रहर ३- दाडिम(अनार) गंध पुष्प सहित अर्घ्यदान - 

दुःखदारिद्र्यभारैश्च दग्धोऽहं पार्वतीपते। मां त्वं त्राहि महादेव गृहाणार्-घ्यं नमोस्तुते। दुःखदारिद्र् च शोकेन दग्धोऽहं पार्वतीपते। शिरात्रौ ददाम्यर्-घ्यमुमाकांत गृहाण मे।। 


चतुर्थप्रहर - कैले गंध पुष्प सहित अर्घ्यदान -

किं न जानासि देवेश तावद् भक्तिं प्रयच्छ मे। स्वपादाग्रतले देव दास्यं देहि जगत्पते। मया कृतान्यनेकानि पापानि हर शङ्कर। शिवरात्रौ ददाम्यर्-घ्यमुमाकांत गृहाण मे।।


नीराजन - 


प्रदक्षिणा - शिवाय नमः। 


प्रार्थनापूर्वक नमस्कार -

स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्तां 

न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः।

गोब्राह्मणेभ्यश्शुभमस्तु नित्यं 

लोकास्समस्तास्सुखिनो भवन्तु।।

तव तत्त्वं न जानामि किदृशोऽसि महेश्वर। 

यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः।। 


पूजासमर्पण संकल्प प्रथम प्रहर- 

नमो यज्ञ जगन्नाथ नमस्त्रिभुवनेश्वर। पूजां गृह्ण मया दत्तां महेश प्रथमे पदे। 


द्वितीय प्रहर - पूर्वे नंदीमहाकालौ गणभृंगौ च दक्षिणे। वृषस्कन्दौ पश्चिमे च देशकालौ तथोत्तरे।। गंगा च यमुनापार्श्वे पूजां गृह्ण नमोऽस्तु ते। 


तृतीयप्रहर - नमोऽव्यक्ताय सूक्ष्माय नमस्ते त्रिपुरान्तक। पूजां गृहाण देवेश यथा शक्त्युपपादिताम्।। 


चतुर्थप्रहर - बद्धोऽहं विविधैः पाशैः संसारभयबंधनैः। पतितं मोहजाले मां त्वं समुद्धर शङ्कर।। इति तत्सत् श्री ब्रह्मार्पणमस्तु।।  


"महेश्वराय नमः " प्रयान्तु महादेव ! विसर्जन करें।


साभार - पु० शास्त्रीजी 

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