गर्भाधान विशेष

 

#गर्भाधान_और_लग्नबल 


गण्डान्तंत्रिविधं त्यजेन्निधनजन्मर्क्षे च मूलान्तकं।

दास्रं पौष्णमयोपरागदिवसं पातं तथा वैधृतिम् ।।


पित्रोः श्राद्धदिनं दिवा च परिधाद्याद्धं स्वपत्नीगमे । 

भान्युत्पातहतानि मृत्युभवनं जन्मक्षतः पापभम् ।।


भद्राषष्ठी पर्वरिक्ताश्च संध्या भौमार्कार्कोनाद्यरात्रीश्चतस्रः । 

गर्भाधानं व्युत्तरेन्द्रर्कमैत्रब्राह्मस्वाती विष्णुवस्वम्बुपे सत् ॥


👉 विविधं गण्डान्तं, निधनजन्मक्ष च मूलान्तकं दात्रं पौष्णं अथ उपराग- दिवसान् पातं तथा वैधृति, पित्रोः श्राद्धदिनं दिवा च परिचाद्यर्ध उत्पातहतानि भानि जन्मक्षेतः मृत्युभवनम् (तथा) पापभं (एतानि) स्वपत्नीगमे त्यजेत् । भद्राषष्ठीपर्व- रिक्ताः, च सन्ध्याओमार्कान्, चतस्रः जाद्यरात्रीः (स्वपत्नीगमे त्यजेत्), व्युत्तरेन्द्वर्क- मैव ब्राह्मस्वातीविष्णुवस्वम्बुषे गर्भाधानं सत् ।। 


👉 रजोदर्शन से चार दिन बाद अपनी स्त्री के गमन में नक्षत्र गण्डान्त, तिथि गण्डान्त, लग्न गण्डान्त, जन्मनक्षत्र से सातवाँ नक्षत्र, जन्मनक्षत्र, मूल, भरणी, अश्विनी, रेवती, ग्रहण का दिन, व्यतीपात और वैश्तियोग, माता- पिता का श्राद्धदिन, परिषयोग का पूर्वाद्धे, उत्पात से दूषित नक्षत्र, जन्मराशि- जन्मलग्न से आठवीं लग्न, पापग्रहयुक्त नक्षत्र अथवा लग्न, इन सबका त्याग करे ॥  

👉भद्रा, छठि, पर्व अर्थात् कृष्णपक्ष की चतुर्दशी, अष्टमी, अमावास्या, पूर्णिमा, सूर्यसंक्रान्ति और रिक्ता अर्थात् चौथि, नवमी, चतुर्दशी, संध्याकाल, मंगल, रविवार, शनैश्चर दिन इन सबको छोड़ शुभ तिथि, बासर, लग्न, योगादि में, रात्रि में, तीनों उत्तरा, मृगशिरा, हस्त, अनुराधा, रोहिणी, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष इन नक्षत्रों में गर्भाधान शुभ होता है ।।


गर्भाधान में लग्नबल


#केन्द्रत्रिकोणेषु_शुभैश्च 

        #पापस्यायारिर्गः_पुंग्रहबृष्टलग्ने । 

#ओजांशगेऽजेऽपि_च_युग्मरात्री                                                  

       #चित्रादितीज्याश्विषुमध्यमं_स्यात् ।। 


👉 शुभैः केन्द्रतिकोणेषु (स्थितैः) पापः जबाबारिगैः पुर् अदृष्टलन्ने अब्जे ओजांशने च युग्मरात्रो (गर्भाधानं शुभम्), न (पुनः) चितादिलीज्याश्विषु (नक्षत्रेषु) मध्यमं स्यात् ।। 

👉 पहिले, चौथे, सातवें, दशवें, नवें और पांचवें स्थान में शुभग्रह स्थित हों; 

👉तीसरे, छठे, गेरहवें स्थान में पापग्रह हों; 

👉सूर्य, मंगल वा बृहस्पति लग्न को देखते हों; 

👉विषम राशि वा विषम नवांश में चन्द्रमा स्थित हो, ऐसे लग्न में और रजोदर्शन के बाद 

👉चोथी, छठी, आठवी, दशवीं, बारहवीं, चौदहवीं, सोलहवीं रात्रि में गर्भाधान शुभ होता है। 

👉 चित्रा, पुनर्वसु, पुष्य और अश्विनी नक्षत्र में गर्भाधान मध्यम फलदायक होता है ।।

पं० धवलकुमार शास्त्री गुजरात 

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