वैदिक विवाह कुष्मांडहोम प्रायश्चित
वैदिकविवाह में आयु अतिक्रमण और अपूर्ण कुष्मांड होम प्रायश्चित बना पाखंड :
देश काल स्थिति का सिद्धांत के पालन के साथ उचित समय पर उचित विधि विधान होने से ही सिद्धि की प्राप्ति होती है - कुष्मांड होम प्रायश्चित का कोई विरोध नहीं हम इस विधान का पूर्ण श्रद्धा से स्वीकार भी करते हैं।
यह लेख से हमारा किसी की वैदिक आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं है। किसी के स्वीकार अस्वीकार से हमें कोइ फर्क नहीं पड़ता यह आपका निजी वैदिक अधिकार है - यह वैदिक समय सूचकता हेतु है - जो आजकल दुर्लभ है।शायद आधुनिक काल में किसी को पसंद न भी आए वर्तमान समय के मेरे निजी वैदिक मर्यादा मूलक विचार है । मूल विषय पढ़ना गहन अभ्यास करना परिबलो का मर्यादा का भी विचार करना उत्तमोत्तम विश्लेषण होता है।केवल लिखा है तो कर लिया और रहस्यो को न जानना पाखण्ड है -
वैदिक विवाहविधि से कन्यादान का उचित आरंभिक काल - अंतिमकाल अतिक्रमण -भूतकाल -वर्तमान काल पर विचार करें अंत तक जरूर पढ़ें
विद्वज्जनों को निवेदन है आप कोइ भी पक्ष रखें लेकिन सिद्धांत को , समयस्थिति को और जिस समय प्रायश्चित लिखा गया उस प्रायश्चितकाल पर उस प्रायश्चितकाल के अतिक्रमण पर भी वर्तमान में विचार करें यह लेख आपकी सहायता के लिए है न कि विवाद के लिए प्रायश्चितकाल का - विष्णु स्वरूप वर के लिए कन्या की शुद्धि की प्रायश्चित - पूर्ण प्रायश्चित इत्यादि समय पर सूक्ष्मता से विचार करें विवाद नहीं यही आपकी वेदों के सिद्धांतो के प्रति सेवा होगी हम ब्रह्मपुराण - विष्णुपुराण इत्यादि सभी क्रम पर संक्षिप्त विचार भी किए हैं विस्तृत विचार करना आपका कार्य है। अन्य कोइ भी प्रमाण भी रखें तो उपरोक्त मुद्दों पर विचार जरूर करें - अन्यथा यह होम शुद्धि के लिए ही बनकर रह जाता है।
*विवाह संस्कार आयु निर्णय*
कारिकानिबन्धे पूर्णभाग :
*अन्धो मूक: क्रियाहीन*
*श्चापस्मारी नपुंसक:।*
*दूरस्थ: पतित: कुष्ठी*
*दीर्घरोगी वरो न सन्।।*
जो अन्धा न हो, मूक न हो, क्रियाहीन न हो, अपस्मार रोगी न हो, नपुंसक न हो, दूरस्थ न हो, पतित न हो, कुष्ठ रोगी न हो, दीर्घरोगी न हो, ऐसे व्यक्ति को वर बनाना चाहिए।
*नात्यासन्ने नातिदूरे*
*नात्याढ्ये नातिदुर्बले।*
*वृत्तिहीने च मूर्खे च*
*षट्सु कन्या न दीयते।।*
जो अत्यधिक निकट न हो, अत्यधिक दूर न हो, अत्यधिक धनवान न हो, अत्यधिक दुर्बल न हो, वृत्तिहीन न हो, और मूर्ख न हो, इन छह प्रकार के व्यक्तियों को कन्या देनी चाहिए।
*मूर्खनिर्धनदुर्गन्ध*
*शूरमोक्षाभ लाषिणाम्।*
*त्रिगुणाधिकवर्षाणां*
*न देया जातु कन्यका।।*
जो मूर्ख न हो, निर्धन न हो, दुर्गन्धयुक्त न हो, शूर न हो, मोक्ष की इच्छा रखता न हो, तो तीन गुना अधिक उम्र का हो, ऐसे व्यक्ति को कन्या न देनी चाहिए *अगर हो तो नही देनी चाहिए*
*ब्रह्मपुराणे*
*यद्यष्टवर्षाकन्या*
*स्यात्तदातत्त्रिगुणःपुमान्* यदि कन्या 8 वर्ष की है, तो पुरुष की आयु उससे तीन गुना होनी चाहिए, अर्थात् 24 वर्ष
विष्णुपुराण दशम अध्याय तृतीय अंश १६ के और्व मतानुसार यही है - *और्व उवाच : वर्षैरेकगुणां भार्यामुद्धहेत्त्रिगुणस्स्वयम्।*
अपनेसे तृतीयांश अवस्थावाली कन्यासे विवाह करना चाहिए। यह विष्णु पुराण का प्रमाण है जो ब्रह्म पुराण से भिन्न है। इस शास्त्रीय प्रमाण का अनादर न करके ब्रह्म पुराण के बाद विष्णु पुराण में यह व्यवस्था गृहस्थाश्रमीओ के लिए मान्य होनी चाहिए क्योंकि सभी युगों के धर्म भी भिन्न भिन्न है इस प्रकार तो कलौ पाराशर स्मृता: के वचन से आयु अतिक्रमण के कारण प्रायश्चितो को भी स्वीकार करना पड़ेगा फिर आगे ब्रह्म पुराण में कहा है कि,
*यदि द्वादशवर्षास्यात्कन्यारूपगुणान्विता॥* यदि कन्या 12 वर्ष की है और रूप-गुण से संपन्न है, तो पुरुष की आयु 32 वर्ष होनी चाहिए *द्वात्रिंशद्वर्षपूर्णेन*
*यदि_षोडशवार्षिकी* यदि कन्या 16 वर्ष की है तो उस कन्या को *षट्त्रिंशद्वर्षपूर्णेन विवाह्या ह्यन्यथा न हि॥*
36 वर्ष की आयु वाले पुरुष के साथ ही विवाह करना चाहिए।
*वशिष्ठ जी ने इसी कारण कहा कि १५ वर्ष के बाद केवल जल के छींटें मारकर ही कन्यादान कर देना चाहिए।* जब कन्या रजस्वला हो चुकी होती है तो वो वृषली तो पहले से ही कहलाती है जब वो 12 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुकी होती थी तो प्रतिमाह या विवाह संस्कार समय शक्तिसंपन्नतानु सार अपने आचार्यों से मार्गदर्शन प्राप्त करके यथोचित प्रायश्चित करना कहा है इसके लिए पराशर जी ने इसी कारण कहा कि *अष्टावर्षे भवेद्गौरी* और अपना वेदाधिकार और धर्म सुरक्षित रहे इसमें विवाद का कोइ प्रश्न ही नहीं है। पाराशर ने इसलिए कहा था कि वेदधर्मपरायणो एकबार उपभोग करके 3 या 12 वर्ष तक जो भी लिखा है वो जान लेना चाहिए यह वैदिक आयु का अतिक्रमण जानना चाहिए
अर्थात् 8 वर्ष से 16 वर्ष तक की कन्या का ही वैदिक विधान से शास्त्रीय विवाह का वर्णन ही शास्त्रो में मिलता है गु०सूत्रो से मिलता जूलता है इसकारण यह स्पष्ट है कि वैदिक विवाह विधि में 16 या 50%3 की आयु की कन्या से विवाह कर सकते हैं लेकिन वर के लिए कुछ आचार्यों की शास्त्रीय व्यवस्थानुसार इसे गौण काल माना जाता है इसके आगे शुद्ध वेदाधिकार के लिए कलीयुग मान्य प्रायश्चित जानना चाहिए-
कुष्मांड होम का पूर्ण प्रायश्चित तभी माना जाना चाहिए कि जब कन्या का विवाह सूत्रोक्त और वशिष्ठ जी के मतानुसार १५ वर्ष की आयु में हो तब यह पूर्ण प्रायश्चित स्वीकार करना चाहिए तभी वेदाधिकार की प्राप्ति रहती है एसा मेरी समझ में आता है। क्योंकि इसमें वैदिक विवाह आयु की प्राधान्यता विशेष है न कि व्यवस्था की कुष्मांड होम की प्रायश्चित की विधि भी इसी कारण है कि पूर्वकाल में पाराशर माधव वशिष्ठ जी के वचनानुसार 12 वर्ष से 15 वर्ष तक वैदिक विवाह की विधि प्राप्त है।
लेकिन आयु का अतिक्रमण हो तो भी प्रश्न उठता है क्या करें ?
ब्रह्मपुराण मे आगे कहते हैं कि
*विंशत्यब्दा यदा कन्या वस्तव्यं तत्र वै त्र्यहम् ।*
*अत ऊर्ध्वमहोरात्रं वस्तव्यमतिसंयतैः ॥*
बीस वर्ष से अधिक की आयु हो जाए तो 55 वर्ष तक *यवीयसी* अर्थात् समान आयु के साथ विवाह करना धर्म है लेकिन धर्म में यह भी कहा है कि कन्या वर की आयु से छोटी हो पूर्व में बताए ब्रह्म पुराण के बाद के *व्यवस्थापको की* विष्णु पुराणानुसार वर की आयु से तृतीयांश अवस्था वाली तो 20 वर्ष की आयु वाली कन्या को 59/60 वर्ष की आयु वाले वर से विवाह करना सिद्ध होगा लेकिन यह तो आश्रम व्यवस्था से ही विपरित हो जाएगा एसे में 50 वर्ष की अंतिम गृहस्थाश्रम की व्यवस्था से 50%3 की आयु ही स्वीकार किया जाना चाहिए लेकिन ब्रह्मपुराण के वचनानुसार 20 वर्ष के बाद समान /अपने से अधिक आयु वाले वर से विवाह करना शास्त्र संमत है। यह समस्त वर्णों के लिए जान सकते हैं ।
*याज्ञवल्क्य*
*अनन्यपूर्विकां कान्तामसपिण्डां यवीयमीम । अरोगिणीं भ्रातृमतीमसमानार्षगोत्रजाम् ॥*
अनन्यपूर्विकाम् - जिसका पूर्व में अन्य कोई पति न हो (अविवाहित)
कान्ताम् - सुन्दर स्त्री
असपिण्डाम् - जिसमें पिण्ड का संबन्ध न हो (5 पीढ़ी से बाहर)
यवीयसीम् - आयु में छोटी
अरोगिणीम् - रोग रहित
भ्रातृमतीम् - भाई वाली
असमानार्षगोत्रजाम् - जिसका गोत्र भिन्न हो
याज्ञवल्क्य जी कहते हैं जिसका पूर्व में अन्य कोई पति न हो, सुन्दर हो, जिसमें पिण्ड का संबन्ध न हो, *यवीयसी* आयु में छोटी हो, रोग रहित हो, भाई वाली हो और जिसका गोत्र भिन्न हो।
तिरुवल्लुवर, तिरुक्कुरल (तमिल वेद) के लेखक के मत से सामवेद में ब्रह्मचर्य का वर्णन है। सामवेद कहता है कि ब्रह्मचारी भगवान के मित्र बन जाते हैं। ब्रह्मचारियों को वसु, रुद्र और आदित्य भी कहा जाता है। जो 24 वर्षों तक ब्रह्मचारी रहते हैं, उन्हें *वसु,* 36 वर्षों तक *ब्रह्मचारी* और 48 वर्षों तक ब्रह्मचारी रहने वालों को *रुद्र* कहा जाता है। इस प्रकार वैदिक विवाह विधि का विचार करें तो भी 48 वर्ष के वर से तृतीयांश अवस्था वाली 16 वर्ष की कन्या से विवाह करना धर्म है -
*16* वर्ष की आयु की कन्या को आयुर्वेद के चरक संहितानुसार गर्भधारण करने योग्य भी कहा है लेकिन वशिष्ठादि ऋषियों के मतानुसार 15 वर्ष में विवाह तो हो प्रायश्चित कुष्मांड होम तो हो -
यहां पर बहुत लोग विवाद भी करते हैं कि पुरे भारत के लोग बाजारु जनेऊ पहनते हैं जो द्विजों के लिए अमान्य है द्विजों के लिए स्वनिर्मित जनेऊ ही मान्य है तो पुरे भारत के लोग कुष्मांड होम भी करते हैं तो हम भी करके प्रायश्चित से मुक्त हो जाएं एसा नहीं है इसमें काल की अवधि का विचार करना चाहिए - 1939 तक यह भारतीय और मूल में वैदिक संविधान था कि 14 वर्ष की आयुवाली कन्या को कन्यादान के लिए योग्य माना जाता था 1949 में यह आयु 15 वर्ष कर दी गई थी - इसलिए कुष्मांड होम का प्रायश्चित के रूप में स्वीकार किया जाता था फिर भी आप अतिक्रमण कर करके कितना अतिक्रमण करोगे? याज्ञवल्क्य के मतानुसार भी मानो तो 20 वर्ष की कन्या का कन्यादान में अतिक्रमण नहीं है? शांतचित्त से विचार करें आप 20 वर्ष की कन्या का या 55 वर्ष की कन्या का कुष्मांड होम करके स्वीकार करें हमें कोइ आपत्ति नहीं है कोइ विरोध नहीं हें धर्म है आस्था है विश्वास है श्रद्धा है विरोध या उग्रता वाली मूर्खता हममें नहीं हम सदा शांतचित्त होकर सभी को वर्षों से श्रवण करते आए हैं और स्वीकार भी करते हैं - यह निर्णय करना आपका निजी विषय है आप जो स्वीकार करते हो वो हम भी स्वीकार करते हैं हमारा किसी भी विधि विधान का कोइ विरोध नहीं है। जो भी कुष्मांडादि प्रायश्चित के विचार रखे हैं वो तो करना ही है लेकिन किस विधि से वो हमें पता है आपका आपको पता है इससे हमारा आपसी कोई संबंध नहीं है। पुरे देश में क्या चल रहा है वो हमें नहीं जानना हम समयकालीन -पद्धति और वेदों की सिद्धांतो की रक्षा करना प्रथम कर्तव्य है। आप भी वैदिक काल मान्य प्रायश्चित काल और आधुनिक संविधान के बदलाव को ध्यान में रखकर हमारे विचार प्रकट किए हैं। परिणाम तो हम आज देख ही रहे हैं भविष्य में समाज भी देखेगा । समय वर्ते सावधान कन्या पधरावो सावधान वर कन्या सावधान। इति !
यदि आप ब्रह्मपुराण के वचनों को स्वीकार करके विष्णु पुराण के वचनों का अस्वीकार करते हो तो यह शास्त्रीय अपराध ही तो है *जैसी जाकि भावना* जिसकी जिस जिस शास्त्रो में रूचि हो तो उस शास्त्र को अपनाना चाहिए लेकिन मर्यादा का अतिक्रमण करके प्रायश्चित का भी स्वीकार करना चाहिए कौन से प्रायश्चित किस विधि से अपनी संपन्नता के अनुसार करना है यह आपके शांतचित्त वाले आचार्यों से निर्विवाद मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए एसे आचार्यों जिनको रात्रि के स्वप्न में भी शास्त्र का चिंतन होता रहता हो - क्योंकि आजकल तो सब भारतवर्ष में धर्म अधर्म में पाखण्ड ही प्रधान है एक शास्त्र को प्रमाण मानना उसके बाद वाले नए सुधारात्मक शास्त्र को अस्वीकार करना मूर्खता है - यह सब कालक्रम से ही वेद नारायण उपदेश करते हैं पूर्ण श्रद्धा के साथ स्वीकार करना चाहिए - कुष्मांड होम का विधान जब लिखा गया था तब धर्म का महत्व भी अधिक था कन्याओ के वैदिक विवाह अधिक से अधिक 15 वर्ष तक हो ही जाते थे उस समय भी अतिक्रमण होता होगा हम यह नहीं कह सकते यह तो आपको विचार करना है कि वैदिक धर्म क्या है ? ब्रह्म पुराण की कारिका अपने सूत्रो की कंडीकाओ से भी 15 या 20 वर्ष तक का वैदिक विधि से कन्यादान ही प्रचलित था इसके बाद पाप ही समझा जाता था विचार करें सज्जनों
पहले तो यह विचार करें कि कन्या को वृषली कब मानी जाए ? वृषली होकर भी वैदिक कालावधि 15/20 वर्ष की आयु में विवाह होता है ? मैं तो 16 या 50%3 का ही वैदिक काल कन्यादान के लिए उचित समझता हु। इसका उल्लंघन करना पाप है या पुण्य यह आप पर निर्भर है मेरा धर्म है वेदों की रक्षा करना वेद परंपराओ की रक्षा करना न कि मर्यादा के अतिक्रमण करके मनघड़ंत प्रायश्चित करना यह वेदों का शास्त्रोकी आज्ञा के अतिक्रमण का उल्लंघन ही तो है।
आजकल तो 20 की आयु वाली कन्या की क्या बात करते हैं 25/30/35 की आयु वाली कन्या भी अविवाहित बैठी रहती है जिसके अनेकों कारण है पारिवारिक कारणों से या धर्मसंकरता, कर्मसंकरता, प्रायश्चितसंकरता , भारतीय संविधान का धर्म में हस्तक्षेप वर्तमान में भारतीय संविधान ने 18 वर्ष की आयु वाली कन्या को विवाह के लिए मान्यता प्रदान करी है जिसे याज्ञवल्क्य के 20 वर्ष की आयु वाली कन्या के विवाह में आप मान्यता दे सकते हैं मैं नहीं मैं तो धर्म प्रीत्यर्थे वेद स्मृति पुराणिक संविधान को ही मान्यता देता हु जो अधिक से अधिक 16%3 करके कन्यादान प्रतिग्रह करें और कुष्मांड होम करे तो ठीक है लेकिन शास्त्र दृष्टि से 15 वर्ष को प्रधानता देना ही धर्म होगा एसा मेरे निजी विचार है इसे आप शास्त्रीय कहो या शास्त्र के विरोधी कहो मुझे कोइ फर्क नहीं पड़ता में तो धर्म के लिए किसी से भी भीड़ सकता हु और तिलांजलि भी दे सकता हूं लेकिन अतिक्रमण करके अपना स्वयं का मत नहीं, मैं स्वयं संघर्ष कर रहा हु मुझे पता है यह सब धर्म के प्रति जागरूकता न होने के कारण मैं किसी पर दबाव नहीं बना सकता या किसी से कोइ जबरदस्ती पैशाचिक विवाह में भी नहीं मानता ईश्वर मुझसे जो करवाना चाहे वो ही करवाएंगे अब मैं स्वतंत्र हु। जैसा भी हूं जन्मना ब्राह्मण ही हु ।
लेकिन एक सच्चा ब्राह्मण जो भी करता है वो उच्च कोटि का ही करता है वो तो विवाह भी ब्रह्मविवाह से करें और विषय-वस्तु पर विवाद भी उच्च कोटि के प्रामिणिक शास्त्र के पक्ष में लेकिन इस धर्मविरोधी दूषित काल में भी उच्च कोटि का अपराध करने के लिए शास्त्र वचनों का ही प्रथम पक्ष रखेगा *कलियुग में अधर्मीओ को ही पूजा जाता है* अन्यान्य वचनों से जान लेना चाहिए। फिर जहां निंबू भी न घुसे वहां उच्च कोटि का नारियल भी घुसा सकते हैं। क्या करें सज्जन ही दूर्जनो की उत्पत्ति करता है पू० गुरुदेव ने बिल्कुल सही कहा है कोइ धर्मपक्ष रखने से पहले भी १०० बार विचार करेगा -- बूरा न मानो होली है।
आज विवाहरुपी धर्मसंसकार भी अंग्रेजी शासकों द्वारा संचालित होते हैं। 1939/1949 से यह स्थिति भयानक रूप से विकराल रूप धारण कर चुकी हैं न तो युवाओं का विवाह उचित समय पर हो रहा है न तो कन्याओं का एसे में व्यवस्था हमें स्वयं ही बनानी पड़ेगी जिससे वेदों की सिद्धांतो की रक्षा हो संविधान से भयभीत होकर बहानेबाजी भी वो ही मूर्ख करते हैं जिसको संविधान के अनुच्छेद 23 से 27/28 में सभी भारतवासियों को अपने अपने धर्म की स्वातंत्र्यता का उपयोग करना नहीं आता या फिर पुत्र पुत्री परिवार के मोह में फंसे रहते हैं। इससे अच्छा तो अन्य समाज में इसका परस्पर पालन होता है यह बात अलग है कि उनका धर्म हमसे विरुद्ध है।
इसलेख में प्रायश्चित के लिए केवल विचार व्यक्त करें है आपको क्या करना है ? कैसे करना है ? वो आपके उपर आपके अधिकृत आचार्यों पर निर्भर है - हमें या शास्त्र को अपराधी न बनाएं हमें क्या करना है उत्तम करना है अधम करना है हमारा क्या होगा यह अब हम ही निर्णय करेंगे - अब हम नहीं चाहते कि बात बात पर हमें केवल विचार व्यक्त करने पर शास्त्रो के अपराधी घोषित कर दिया जाए -
धर्मो रक्षति धर्म:
वैदिक शास्त्रों में कन्याको वृषली कब कहां गया है ?
वैदिक शास्त्रों में कन्या के विवाह के लिए 15 या अधिक से अधिक 20 का विधान है जो अपने बताए है आप के क्या विचार है?
हां 15 से 20 सही है तो पूर्ण कुष्मांडहोम भी इसी समय के लिए ही लिखा गया है
वैदिक संविधान अनुसार तो कन्या रजस्वला होकर वृषली हो ही चुकी होती है तभी तो ब्रह्म विवाह 8 वर्ष से पूर्व 7 वर्ष में निर्णय सिंधु में तो उपनयन संस्कार वाले मत को भी पढ़ना चाहिए लेकिन परिवार के मोह में करते नहीं होंगे या धर्म में पंगुता आने पर 12 वर्ष तक केवल गौ दान आदि प्रायश्चित का ही शास्त्रकारों ने स्वीकार किया - फिर इसमें कुष्मांड होम को जोड़ दिया जिसका हम अस्वीकार नहीं करते लेकिन इसकी अवधि तो कन्यादान की वैदिक आयु तक ही सीमित रही थी क्योंकि उस समय पाराशरादि शास्त्रकारो ने तो 8/12 वर्ष पर ही विवाह संबंध करने का वैदिक मत रखा था जो उचित ही था आप स्वयं 12 वर्ष का स्वीकार भी कर चुके हो - आज समय बदल चुका है प्रायश्चित एक व्यवस्था बन चुकी है ।
लेकिन मर्यादा तो मर्यादा ही होती है सूत्रकारो ने 15 वर्ष तक वैदिक विधि से कन्यादान को स्वीकृति दी
और अधिक गहनता से देखें तो ब्रह्मपुराण - विष्णु पुराण ने भी यही कहा कि इतने वर्षों में करना चाहिए विष्णु पुराण से यही फलित होता है क्रमशः 16/36, 16×3=/48 आप जो भी स्वीकार करें या फिर इसमें अधिक अतिक्रमण करें तो याज्ञवल्क्य को ध्यान में रखकर 20 वर्ष तक की ही अवधि को ध्यान में रखकर प्रायश्चितकारो ने कुष्मांड होम का विधान वैदिक संरक्षकों को बताया न कि जब तक चाहो घर पर बिठा रखो और जब मन करे तब कुष्मांड होम प्रायश्चित करें
लेकिन वर्तमान 1939/1949 के संविधानीक अतिक्रमण को देखते हुए यह मेरा स्पष्ट मानना है इसका तर्क यह है कि..... कुष्मांड होम विधान जब लिखा गया तब विवाह प्रथा वैदिक संस्कार से ही होते थे --
कुष्मांड होम प्रायश्चित भी उतने ही आयु की काल के लिए मान्य किए गए होंगे कि जब विवाह आयु का अतिक्रमण न हो नहीं तो सब कन्याओ को अपने घर में ही बिठा रखते और बाद में जब जी में आए तब यह प्रायश्चित कर लें -- सब धर्म में स्थित रहने वाले सज्जन अपने धर्म में स्थित रहते थे पालन करते थे तो कुछ आज की तरह पाखंड भी करते होंगे यह भी नकारा नहीं जा सकता -
लेकिन कुष्मांडहोम के लेखक ने यह नहीं सोचा होगा कि इसका ग़लत अर्थघटन किया जाएगा - और इस प्रायश्चित के नाम पर अतिक्रमण करके पाखंड बनाया जाएगा और अधर्म आडंबर बढ़ जाएगा - फिर तो कुष्मांड होम करके भी पाराशर की विधि से ही वेदाधिकार हेतु प्रायश्चित करना होगा क्योंकि विवाह आयु की मर्यादा का ही अतिक्रमण कर दिया है तो फिर कुष्मांड प्रायश्चितकार क्या करें ? मान्य विवाह आयु पर ही इसे स्वीकार करना बुद्धिमत्ता है बाकी हमे तो पराशर के वचनों को ही मानना पड़ेगा
इस प्रकार वैदिक विधि से कन्यादान की मान्य आयु की अतिक्रमण के कारण कुष्मांड होम प्रायश्चित केवल पाखंड बनकर रह जाएगा यह प्रायश्चितकार ने सोचा नहीं होगा - इसकारण कलियुग में प्रामाणिक रूप से मान्य शुद्ध पराशरोक्त प्रायश्चित करना कुष्मांडहोम के बाद भी महत्वपूर्ण बन जाता है। क्योंकि विवाह तो वैदिक निर्धारित आयु से हुआ नहीं - अगर हो जाता तो इस कुष्मांड होम प्रायश्चित का स्वीकार करने में कट्टर वैदिकों को कोइ आपत्ति न होती अब यह पराशरोक्त प्रायश्चित का रहस्य बताना में जरूरी नहीं समझता इसका श्रेय मुझे भी मिलना चाहिए पुरे भूतकाल को, इतिहास को , वर्तमानकाल का मैंने विश्लेषण किए हैं दूर्जनो से गालीया भी सुननी पड़ सकती है इसलिए में अधिक विस्तार से कुछ कहना नहीं चाहता -
वेदनारायणो विजयतेतराम 🙏
धर्म की जय हो
अधर्म का नाश हो
गौ माता की जय हो
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