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धौम्य बोले -

१ *सूर्याय नम:*

२ *अर्यम्णे नम:*

३ *भगाय नम:*

४ *त्वष्ट्रे नमः*

५ *पूष्णे नम:*

६ *अर्काय नम:*

७ *सवित्रे नम:*

८ *रवये नम:*

९ *गभस्तिमते नम:*

१० *अजाय नम:*

११ *कालाय नम:*

१२ *मृत्यवे नम:*

१३ *धात्रे नम:*

१४ *प्रभाकराय नम:*

१५ *पृथिव्यै नम:*

१६ *आपाय नमः*

१७ *तेजसे नम:*

१८ *आकाशाय नम:*

१९ *वायवे नम:*

२० *परायणाय नम:*

२१ *सोमाय नम:*

२२ *बृहस्पतये नम:*

२३ *शुक्राय नम:*

२४ *बुधाय नम:*

२५ *अंगारकाय नम:*

२६ *इन्द्राय नम:*

२७ *विवस्वते नम:*

२८ *दिप्तांशवे नम:*

२९ *शुचये नम:*

३० *शौरये नम:*

३६ *शनैश्चराय नम:*

३२ *ब्रह्मणे नम:*

३३ *विष्णवे नम:*

३४ *रुद्राय नम:*

३५ *स्कन्दाय नम:*

(३६ वैश्रवणाय नमः )

 ३६ *वरुणाय नम:*

३७ *यमाय नम:*

३८ *वैद्युताग्नये नम:*

३९ *जाठराग्नये नम:*

४० *ऐन्धनाग्नये नम:*

४१ *तेजसाम्पतये नम:*

४२ *धर्मध्वजाय नम:*

४३ *वेदकर्त्रे नम:*

४४ *वेदांगाय नम:*

४५ *वेदवाहनाय नम:*

४६ *कृताय नमः*

४७ *त्रेताय नम:*

४८ *द्वापराय नम:*

४९ *सर्वमलाश्रय कलये नम:*

५० *कला -काष्ठा-मूहुर्तरुप समयाय नम:*

५१ *क्षपायै नम:*

५२ *यामाय नम:*

५३ *क्षणाय नम:*

५४ *संवत्सरकराय नम:*

५५ *अश्वत्थाय नम:*

५६ *कालचक्रप्रवर्तकविभावसवे नम:*

५७ *शाश्वत पुरूषाय नम:*

५८ *योगिने नम:*

५९ *व्यक्ताव्यक्ताय नम:*

६० *सनातनाय नम:*

६० *कालाध्यक्षाय नम:*

६२ *प्रजाध्यक्षाय नम:*

६३ *विश्वकर्मणे नम:*

६४ *तमोनुदाय नम:*

६५ *वरुणाय नम:*

६६ *सागराय नम:*

६७ *अंशवे नम:*

६८ *जीमूतये नम:*

६९ *जीवनाय नम:*

७० *अरिघ्ने नम:*

७१ *भूताश्रयाय नम:*

७२ *भूतपतये नम:*

७३ *सर्वलोकनमस्कृताय नम:*

७४ *स्रष्ट्रे नम:*

७५ *संवर्तकाय नम:*

७६ *वह्नये नम:*

७७ *सर्वादये नम:*

७८ *अलोलुपाय नम:*

७९ *अनन्ताय नम:*

८० *कपिलाय नम:*

८१ *भानवे नम:*

८२ *कामदाय नम:*

८३ *सर्वतोमुखाय नम:*

८४ *जयाय नम:*

८५ *विशालाय नम:*

८६ *वरदाय नम:*

८७ *सर्वधातुनिषेचिताय नम:*

 ८८ *मन: सुपर्णाय नम:*

 ८९- *भूतादये नम:*

९० *शीघ्रगाय नम:*

 ९१ *प्राणधारकाय नम:*

९२ *धन्वन्तरये नम:*

 ९३ *धूमकेतवे नम:*

 ९४ *आदिदेवाय नम:*

९५ *अदितिसुताय नम:*

९६ *द्वादशात्मने नम:*

९७ *अरविन्दाक्षाय नम:*

९८ *पितामातापितामहेभ्यो नमः*

९९ *स्वर्गाद्वाराय -प्रजाद्वाराय नम:*

१०० *मोक्षद्वाराय - त्रिविष्टपाय नम:*

१०१ *देहकर्त्रे नम:*

१०२ *प्रशान्तात्मने नम:*

१०३ *विश्वात्मने नम:*

१०४ *विश्वतोमुखाय नम:*

१०५ *चराचरात्मने नम:*

१०६ *सूक्षात्मने नम:*

१०७ *मैत्रेयाय नम:*

१०८ *करुणान्विताय नम:*


 ये अमिततेजस्वी भगवान् सूर्यके कीर्तन करनेयोग्य एक सौ आठ नाम हैं, जिनका उपदेश साक्षात् ब्रह्माजीने किया है ।। १६-२८ ।।


द्विजों के लिए -


श्रीसूर्याष्टोत्तरशतनाम सूर्य स्तोत्रम् 

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भगवान सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं। समस्त वेद, पुराण, ग्रन्थों में भगवान सूर्य की महिमा का विस्तारपूर्वक वर्णन है। वेदों के अनुसार सूर्य उत्पत्ति परमात्मा की आँखों से हुई है। सूर्य ही दिन-रात का विभाजन करते हैं। इन्हीं द्वारा समस्त संसार की सृष्टि, स्थिति और संहार होता है। 


ऋग्वेद में वर्णित है कि सूर्य ही अपने तेज से सबको प्रकाशित करते हैं। सूर्य की पत्नी छाया और पुत्र यम और शनिदेव हैं। सूर्य ज्योतिष शास्त्र में सिंह राशि के स्वामी, रत्नों में माणिक्य रत्न के अधिपति हैं। इनका रथ स्वर्णमयी है जिसमे सात घोड़े जुते हैं, इस रथ का एक पहिया है और इस रथ को सारथि अरुण हांकते हैं। 


महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्यदेव की उपासना कर 'शुक्लयजुर्वेद' को लिखा था। सूर्य भगवान के वरदान से द्रौपदी ने अक्षय पात्र प्राप्त किया था। यहाँ तक की महर्षि अगस्त द्वारा उपदेशित 'आदित्य हृदय स्तोत्र' का पाठ करके ही भगवान श्रीराम ने रावण के ऊपर विजय प्राप्त की थी। योगशास्त्र में इड़ा और पिंगला दो नाड़ियाँ हैं उनमे इड़ा चन्द्रमा की तथा पिंगला सूर्य की नाड़ी कही गयी है। इन्हीं दोनों नाड़ियों में पांचो तत्वों का प्रवाह होता है। 


सूर्य उपासना से रोग निवृत्ति, निरोगी काया, दीर्घायु जीवन, पद-प्रतिष्ठा, आर्थिक समृद्धि प्राप्त होकर अंतः समय में परम धाम की प्राप्ति होती है। 


यद्यपि सूर्य उपासना के अनेक स्तोत्र और मन्त्रों का हमारे ऋषि-मुनियों ने विभिन्न ग्रंथों में उल्लेख किया है। परन्तु उनमें से महाभारत ग्रन्थ के वनपर्व में तीसरे अध्याय में उल्लेखित धौम्य ऋषि द्वारा रचित 'अष्टोत्तरशतनाम सूर्य स्तोत्र ' की अपार महिमा कही गयी है। 


जब दुर्योधन ने युधिष्ठिर को चालाकी से द्यूतक्रीड़ा में हराकर उनसे उनका राजपाट छीन लिया तब समस्त पांडव द्रौपदी सहित वन को प्रस्थित हो गए। उस समय पांडवों के साथ उनके वैदिक ब्राह्मण ऋषि भी चल दिए। कुछ दूर जाकर युद्धिष्ठिर ने अपने ऋषि श्री धौम्य से प्रार्थना की-'हे ऋषिवर ये सब ब्राह्मण मेरा साथ देने के लिए मेरे साथ आएं हैं तो नियमानुसार इनके भोजन की व्यवस्था भी मुझे ही करनी चाहिए अतः आप इनके भोजन की व्यवस्था का उपाय मुझे सुझाएँ।' तब ऋषि धौम्य ने युधिष्ठिर को ब्रह्मा जी द्वारा रचित 'अष्टोत्तरशतनाम सूर्य स्तोत्र ' से सूर्य भगवान की आराधना करने की सलाह दी। 

 

इस प्रकार युधिष्ठिर द्वारा इस स्तोत्र से सूर्य भगवान की उपासना पर सूर्य भगवान ने प्रसन्न उन्हें 'अक्षय पात्र' प्रदान किया और कहा -हे राजन तुम्हारे समस्त साथियों के भोजन करने के पश्चात भी जब तक द्रौपदी भोजन नहीं करेगी तब तक यह पात्र खाली नहीं होगा और यदि द्रौपदी इस पात्र में भोजन बनाएगी तो उस भोजन में छप्पन भोगों और छत्तीस व्यंजनों का स्वाद आएगा। 


इस प्रकार सूर्य देव के इस अक्षय पात्र की सहायता से युद्धिष्ठिर ने सभी ब्राह्मणो, अश्वों की सेवा करते हुए अपने वनवास के, १२ वर्ष व्यतीत किये। 


इसी 'अष्टोत्तरशतनाम सूर्य स्तोत्र' का यहाँ उल्लेख किया जा रहा है। इसके नित्य पाठ, अनुष्ठान करके सभी मनोरथों को पूर्ण किया जा सकता है। व्यक्ति इस स्तोत्र के पाठ से भगवान सूर्य की विशेष कृपा स्वरुप, संतान, धन, आजीविका के साधन, धैर्य, आत्मिक शक्ति, दृणइच्छाशक्ति युक्त बुद्धि, प्रतिष्ठा आदि अनेक लाभ प्राप्त कर सकता है। 


।। श्रीसूर्याष्टोत्तरशतनाम सूर्य स्तोत्रम् ।।


श्रीगणेशाय नमः।


आचम्य।

सङ्कल्प।

श्रीसूर्यनारायणदेवतामुद्दिश्य प्रीत्यर्थं,

श्रीसूर्याष्टोत्तरशतनामस्तोत्रमहामन्त्रपठनं करिष्ये।।


अस्य श्रीसूर्याष्टोतर शतनामस्तोत्र महामन्त्रस्य, ब्रह्मा ऋषिः,अनुष्टुप्च्छन्दः, श्रीसूर्यनारायणो देवता, ह्रां बीजं, ह्रीं शक्तिः ह्रूं कीलकं, श्रीसूर्यनारायण देवता प्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।

 

न्यासौ- करन्यासः।

हृदयन्यासः।

ओं ह्रां अघोर श्रीसूर्यनारायणाय- अङ्गुष्ठाभ्यां नमः - हृदयायनमः

ॐ ह्रीं चतुर्वेदपारायणाय - तर्जनीभ्यां नमः - शिरसेस्वाहा

ॐ ह्रूं उग्रभयङ्कराय - मध्यमाभ्यां नमः - शिखायै वषट्

ॐ हैं श्रीसूर्यनारायणाय - अनामिकाभ्यां नमः - कवचाय हुं

ॐ हौं कौपीनमौञ्जीधराय - कनिष्ठिकाभ्यां नमः - नेत्रत्रयाय वौषट्

ओं ह्रं सहस्रकिरणाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः - अस्त्राय फट्

भूर्भुवस्स्वरोमिति दिग्बन्धः।


ध्यानं।

सुरगणपितृयक्षसेवितं ह्यसुरनिशाचर सिद्धवन्दितम्।

वरकनकहुताशनप्रभं प्रणिपतितोऽस्मि हिताय भास्करम्।।


लमिति पञ्चपूजां कृत्वा गुरुध्यानं कुर्यात्।

सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्कस्सविता रविः।

गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रजापतिः।।


वैशम्पायन उवाच।

श‍ृणुष्वावहितो राजन् शुचिर्भूत्वा समाहितः।

क्षणं च कुरु राजेन्द्र गुह्यं वक्ष्यामि ते हितम्।।१।।


धौम्येन तु यथा प्रोक्तं पार्थाय सुमहात्मने।

नाम्नामष्टोत्तरं पुण्यं शतं तच्छृणु भूपते।।२।।


सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्कः सविता रविः। 

गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः।।३।।


पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम्। 

सोमो बृहस्पतिः शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च।।४।।


इन्द्रो विवस्वान्दीप्तांशुः शुचिः शौरिः शनैश्चरः। 

ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वैश्रवणो यमः।।५।।


वैद्युतो जाठरश्चाग्निरैन्धनस्तेजसां पतिः। 

धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः।।६।।


कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिः सर्वामराश्रयः। 

कला काष्ठा मुहुर्ताश्च पक्षा मासा ऋतुस्तथा।।७।।


संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः। 

पुरुषः शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तः सनातनः।।८।।


लोकाध्यक्षः प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः।

वरुणः सागरोंऽशुश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा।।९।।


भूताश्रयो भूतपतिः सर्वलोकनमस्कृतः।

स्रष्टा संवर्तको वह्निः सर्वस्यादिरलोलुपः।।१०।।


अनन्तः कपिलो भानुः कामदः सर्वतोमुखः।

जयो विशालो वरदः सर्वधातुनिषेचिता।।११।।


सर्वभूतनिषेवितः

मनः सुपर्णो भूतादिः शीघ्रगः प्राणधारणः।

धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवोऽदितेः सुतः।।१२।।


द्वादशात्मारविन्दाक्षः पिता माता पितामहः। 

स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्।।१३।।


देहकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः। 

चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेण वपुषान्वितः।।१४।।


एतद्वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यैव महात्मनः।

सूर्यस्यामिततेजसः

नाम्नामष्टशतं पुण्यं शक्रेणोक्तं महात्मना।।१५।।


प्रोक्तमेतत्स्व्यम्भुवा

शक्राच्च नारदः प्राप्तो धौम्यश्च तदनन्तरम्।

धौम्याद्युधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान्कामानवाप्तवान्।।१६।।


सुरपितृगणयक्षसेवितं ह्यसुरनिशाचरसिद्धवन्दितम्।

वरकनकहुताशनप्रभं त्वमपि मनस्यभिधेहि भास्करम्।।१७।।


सूर्योदये यस्तु समाहितः पठेत्स पुत्रलाभं धनरत्नसञ्चयान्।

लभेत जातिस्मरतां सदा नरः स्मृतिं च मेधां च स विन्दते पराम्।।१८।।


इमं स्तवं देववरस्य यो नरः प्रकीर्तयेच्छुचिसुमनाः समाहितः।

विमुच्यते शोकदवाग्निसागराल्लभेत कामान्मनसा यथेप्सितान्।।१९।।


स्वर्भुवर्भूरोमिति दिग्विमोकः ।

हरिः ओं तत्सत्।

श्रीसूर्यनारायणपरब्रह्मार्पणमस्तु।


।। इति श्रीमहाभारते युधिष्ठिरधौम्यसंवादे आरण्यकपर्वणि श्रीसूर्याष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

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