ग्रहों की डीग्री
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केवल वैदिक द्विजों के लिए
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ब्रह्मांड में एक भचक्र की कल्पना करी है जिसे ३६०° डीग्री में वृताकार में पूर्वाचार्यों ने हमें ज्ञान दिया है। यह सब आप बाल्यावस्था में स्कूल आदि में इतिहास आदि पढ़ें हो तो ज्ञात ही होगा चलिए आज पुनः उसका अभ्यास करे -
एक वृत निर्माण करेंगे जिसमें १२ भाग होंगे सभी में ३०° का एक भाग रहेगा इस प्रकार पूरा भचक्र होगा -
चंद्रमा १ घंटे बारह मिनट पूर्व अगली राशि का फल देते हैं जैसे कि १७ तारीख को चंद्रमा कन्या राशि में २९° का दोपहर २:२२ मिनट को था १ घंटे बारह मिनट के बाद तुला राशि में चंद्र ने राशि परिवर्तन किया - बाद में यह तुला राशि में आया आज वृश्चिक राशि में चंद्रमा 5° का है जो फलित के लिए है ।
यहां पर ध्यान दें सज्जनों ---
हम अंश पर चर्चा कर रहे हैं जबकि फलित से उपर एक संशोधन ही जाने जो आप सभी के मौलिक ज्ञान की अभिवृद्धि के लिए रखा है किसी वाद विवाद के लिए प्रचार के लिए नहीं।
एक राशि का पूर्ण भोग 30° का होता है यदी चंद्रमा 25° का मू० त्रिकोण के अंशों से भी बलाबल का विचार करते हैं सार यह है कि 30° पर ही पूर्ण भोग होगा - इसमें राशि के स्वभाव के अनुसार थोड़ा भेद हो सकता है -
मूल विषय वस्तु अंश विचार से है। मान लीजिए की चंद्रमा अभी २° पर वृश्चिक राशि में है और २८° तुला राशि में है तुला राशि में पहले से ही शुक्रदेव 29° का miracle degree में है जिस प्रकार नरेंद्र मोदी के कुछ ग्रह इस डीग्री में स्थित है।
चंद्रमा तो वृश्चिक में है वो भी २° का तो आप विचार करें २° का फल क्या होगा ? और शेष भाग तुला में है जो २८° है शुक्रदेव भी तुला राशि में 29° के है तो स्पष्ट है चंद्र और शुक्रदेव की युति है अर्थात चंद्रदेव ने तुला राशि में २८° का भोग कर लिया है औश्र तुला में २ का भोग कर चुके हैं तो क्या इस शुक्र - चंद्र युति का फल नहीं मिलेगा जब भोग हो ही चुका है तो कोइ प्रश्न ही न होता लेकिन ग्रहों की एक राशि की डीग्री भी तो ३०° की होती है
इसलिए चंद्रमा तुला राशि में केवल २° का फल ही देंगे और वृश्चिक के २८° का क्यों कि उसका भाग वृश्चिक राशि से संबंधित है।
इसको सिद्ध करने के लिए दिप्तांश की आवश्यकता होगी शुक्र और चंद्र के प्राप्त दिव्यांश से ही उस युति का शुभाशुभ फल प्राप्त होगा इसी प्रकार सभी ग्रहों के विषय में जानना चाहिए शनि महाराज की साढ़ेसाती में उत्तर और पूर्व की दो राशि से संबंध बनाएंगे तभी साढ़ेसाती आरंभ होगी और साढ़ेसाती का मोक्ष भी होगा लेकिन शनि समेत अन्य सभी ग्रहों के विषय में आप सभी को जानना आवश्यक है कि कोइ ग्रह जिस राशि में जिस डीग्री पर स्थित होगा उसमे १८०° का जोड़ करके ही १८०° की डीग्री पर पूर्ण सप्तम दृष्टि होगी - इसी रेखाओ में यदि कोई ग्रह होगा तभी उस पर दृष्टि होगी क्योंकि पूर्ण सप्तम दृष्टि तो १८०° पर होगी उसके आगे उसकी पूर्ण सप्तम दृष्टि नहीं जाएगी -- इसमें विशेष में भी ग्रहों के अंशों से सूक्ष्म विश्लेषण किया जा सकता है।
विशेष ज्ञातव्य: श्री वैदिक ब्राह्मण
शास्त्री धवलकुमार दवे
नारायण 🙏
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