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श्री सूक्त

 ॥ अथ लक्ष्मीसूक्तम् ॥   इन्द्रउवाच ।।   नमस्ते सर्वलोकानां  जननी त्रिगुणात्मिका ॥  श्रेयस्कृता च पद्माक्षी  विष्णोर्वक्षःस्थले स्थिता ॥१॥  त्वं सिद्धिस्त्वं स्वधा स्वाहा सुधा त्वं लोकपावनी ।।  संध्या रात्रिः प्रभा भूमि र्मेघा श्रद्धा सरस्वती ।। २ ।।  यज्ञविद्या महाविद्या गुह्मविद्या सुशोभना ।।   आत्म विद्या च देवि त्वं  विमुक्तिः फलदायिनी ॥ ३ ॥ आन्विक्षिकी त्रयी वार्ता  दंडनीतिस्त्वमेव च ।।  सौम्यासौम्यैर्जगत्पूज्ये त्वयैतद्देवि पूरितम् ॥ ४ ॥  कान्त्या त्वया धृतं देवि सर्वयज्ञमयं वपुः ।।  अध्यास्ते देव- देवेशि योगचिन्त्यसदाभृता ॥ ५ ॥ त्वया देवि परित्यक्तं सकलं भुवनत्रयम् ।। निविष्टप्रायमभवत् त्वयेदानीं समेधितम् ।।६।।   दाराः पुत्रास्तथा गावः  सुरधान्यं धनादिकम् ।। भवत्येवं महाभागे नित्यं त्वद्विक्षणा न्नृणाम् ॥७॥ शरीरारोग्यमैश्वर्य मरिपक्षक्षयः सुखम् ।। देवि त्वदृष्टिदृष्टानां  पुरुषाणां तु दुर्लभम् ॥ ८ ॥  त्वं माता सर्वभूतानां देवदेवो हरिः पिता ।।  त्वयैतद्विष्णुना चांब  ...

दानधर्म

 #दानधर्म_विशेष -:-  सुपात्र को दान देने से निश्चित शुभ - कल्याणकारी फल की प्राप्ति होती है।और अनाधिकारीओ को दान देने से कोइ फल की प्राप्ति नही होती , इसलिए दान हंमेशा सोच-समझकर सुपात्र को ही देना चाहिए । जैसे पत्थर की नाव से पानी में तैरता हुआ मनुष्य पानी मे डूब जाता है वैसे ही दानधर्म को न जानने वाले दाता और प्रतिग्रहीता दोनो नरक मे डूब जाते हैं , सोने का, भूमि का, घोडे का, गौ का, अन्न का, वस्त्र का, तिलो का, घी का प्रतिग्रह करने वाला मूर्ख वेदाध्ययनरहित ब्राह्मण तो काष्ठ की तरह भस्म हो जाता है, इस कारण से अविद्वान वेदाध्यापन रहित ब्राह्मण जिस किसी वस्तु के प्रतिग्रह से भी डरे, क्योंकि अविद्वान ब्राह्मण तो थोडे से वस्तु का दान लेने पर भी किचड मे गौ की तरह नरक मे फंस जाता है। जो दाता दान-धर्म को जानता है वो धर्म को ध्वज की तरह लोक के समक्ष मे प्रचारार्थ दिखाने वाले सदा लोभी, कपटी, लोक को भ्रम मे डालने वाले, परपीडक और सभी को ठगने वाले एसे बैडालव्रतिक ब्राह्मण और साधुता का भ्रम देने के लिए नीचे देखने वाला , धोखाघडी करने वाला , अपने प्रयोजन की सिद्धि मे लगे रहने वाला, प्रत्य...