दानधर्म

 #दानधर्म_विशेष -:- 


सुपात्र को दान देने से निश्चित शुभ - कल्याणकारी फल की प्राप्ति होती है।और अनाधिकारीओ को दान देने से कोइ फल की प्राप्ति नही होती , इसलिए दान हंमेशा सोच-समझकर सुपात्र को ही देना चाहिए ।


जैसे पत्थर की नाव से पानी में तैरता हुआ मनुष्य पानी मे डूब जाता है वैसे ही दानधर्म को न जानने वाले दाता और प्रतिग्रहीता दोनो नरक मे डूब जाते हैं , सोने का, भूमि का, घोडे का, गौ का, अन्न का, वस्त्र का, तिलो का, घी का प्रतिग्रह करने वाला मूर्ख वेदाध्ययनरहित ब्राह्मण तो काष्ठ की तरह भस्म हो जाता है, इस कारण से अविद्वान वेदाध्यापन रहित ब्राह्मण जिस किसी वस्तु के प्रतिग्रह से भी डरे, क्योंकि अविद्वान ब्राह्मण तो थोडे से वस्तु का दान लेने पर भी किचड मे गौ की तरह नरक मे फंस जाता है। जो दाता दान-धर्म को जानता है वो धर्म को ध्वज की तरह लोक के समक्ष मे प्रचारार्थ दिखाने वाले सदा लोभी, कपटी, लोक को भ्रम मे डालने वाले, परपीडक और सभी को ठगने वाले एसे बैडालव्रतिक ब्राह्मण और साधुता का भ्रम देने के लिए नीचे देखने वाला , धोखाघडी करने वाला , अपने प्रयोजन की सिद्धि मे लगे रहने वाला, प्रत्यक्ष मे प्रिय और परोक्ष मे (पीठ पीछे) अहित करने वाला और जूठा विनय दिखानेवाला ब्राह्मण बकव्रतचर (बकव्रतिक) ब्राह्मण कहा जाता है। एसे बैडालव्रतिक और बकव्रतिक ब्राह्मणो को और वेदार्थ न जानने वाले ब्राह्मणों को भी जलमात्र भी न दे ।।


#दान_के_अधिकारी --->>> पिता को दान देने से सौ गुना, माता को हजार गुना,बहिन को देने से लाख गुना और सहोदर भाई को दान करने से अक्षयगुना फल प्राप्त होता है।


(समब्राह्मण जो मंत्र और संस्कारों से रहित है और खुद को ब्राह्मण कहकर जीविका करता है वो समब्राह्मण कहलाता है)समब्राह्मणको दान देनेसे उसका जो फल होता है वो ब्राह्मणब्रुव (जो वैदिक उपनयनादि संस्कार से युक्त है लेकिन पढ़ता पढ़ाता नहि है) को देने से दूगुना फल ,आचार्य ( वेदपढाने वाले) को देनेने हजार गुना फल विद्वान ब्राह्मण को दान देने से लाख गुना और वेदपारंगत ब्राह्मण को दान देने का फल अक्षय्य होता है।। 


ब्रह्मा ने कहा- अब मैं दानधर्म को कह रहा हूं। यह सर्वोत्तम धर्म है। सश्रद्ध भाव से उचित व्यक्ति को धनादि देना ही दान कहा गया है। इस दानधर्म के पालन से दानदाता इस लोक में सुख भोग करके मृत्यु के पश्चात् मोक्षलाभ करता है। न्यायतः धन उपार्जित करके ही धनदान तथा धनभोग का (यथार्थ) फल मिलता है। अध्यापन, याजन तथा प्रतिग्रह, यह वृत्ति ब्राह्मण धर्मान्तर्गत् है। यदि ब्राह्मण की जीविका इससे न चले, तब ब्राह्मण युद्ध प्रभृति तथा सूद लेना, कृषिकार्य, वाणिज्यरूपी वैश्यवृत्ति अपना सकता है। 


☀️ सत्पात्र को जो दान दिया जाता है, वह सात्विक दान है। यह चार प्रकार का होता है। यथा, (१)#नित्य, (२) #नैमित्तिक, (३) #काम्य एवं (४) #विमल। 

(१) बिना कोई आशा किये तथा बिना किसी फल की कामना किये जो कुछ दान नित्य-प्रति ब्राह्मण को दिया जाये, वही #नित्यदान है। 

(२) कोई पाप हो तथा उसे शान्त करने हेतु विद्वानों के हाथों में जो दान दिया जाता है, इसे सत् व्यक्तिगण #नैमित्तिक_दान कहते हैं।

(३) पुत्रप्राप्ति, युद्ध में विजय, ऐश्वर्य, स्वर्गप्राप्ति के लिये जो दान देते हैं, उसे ऋषियों तथा धर्मचिंतन करने वालो को दिया जाता हैं वो #काम्यदान है। 

(४) ब्रह्मविद् व्यक्ति को सत्वयुक्त चित्त से ईश्वर की प्रसन्नता हेतु जो दान देते है, वह परम कल्याणकारी #विमलदान है।

☀️ जो दानदाता ईख, जौ, भूमि, गेहूं, खेती से लहलहाती भूमि का दान वेदतत्वज्ञ ब्राह्मण को प्रदान करता है, उसे पुनः मृत्युलोक में जन्म नहीं लेना पड़ता। सभी दान देने वालों में भूमिदाता सर्वश्रेष्ठ होता है। इससे उत्तम दान कहीं भी नहीं होता। न तो भविष्य में इससे बढ़ कर कोई दान होगा। जो ब्राह्मण को विद्या देता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति नित्यप्रति ब्रह्मचारी ब्राह्मण को सश्रद्ध भाव से विद्यादान करता है, वह सर्वपापरहित होकर देहत्याग के पश्चात् ब्रह्मलोक जाता है।

☀️ वैशाख मासीय पूर्णिमा के दिन उपवासी रहकर व्यक्ति पांच अथवा सात ब्राह्मणों की सविधि पूजा करके उनको मधु तथा तिलपिष्टक का आहार प्रदान करे तथा गन्धादि से उनकी अर्चना करे और यह कहे-"इस कार्य से धर्मराज प्रसन्न हो जायें।" यह कहकर यही भावना अपने मन में दृढ़ता से करे कि वे सन्तुष्ट हो गये। इस कार्य एवं भावना से उसके जीवन पर्यन्त किये पातक समूह तत्काल नष्ट होते हैं। जो कृष्णमृग के चर्म पर मधु एवं घृतयुक्त तिल पात्र में रखकर तथा स्वर्ण रखकर विप्रों को देता है, वह समस्त दुष्कृतों से पार हो जाता है।। 

👉विशेषतः वैशाख मास में घृत से बना अन्न तथा जल धर्मराज के निमित्त जो ब्राह्मण को दान करता है, वह समस्त भय से मुक्त हो जाता है। एकादशी को उपवासी रहकर जो द्वादशी के दिन विष्णु की आराधना करता है, वह सभी पापों से निश्चित रूप से मुक्त हो जाता है।।

🔥जो कोई व्यक्ति किसी देवता की अर्चना करने को इच्छुक है, वह यत्नतः ब्राह्मण का सत्कार करके उसे भोजन कराये। इससे वे देवता उससे प्रसन्न हो जाते हैं। सन्तान चाहने वाला इन्द्र की पूजा करे, ब्रह्मज्ञान चाहने वाला ब्राह्मा मानकर ब्राह्मण की पूजा करे, आरोग्य चाहने वाला सूर्य की, धन चाहने वाला अग्नि की, कर्म में सफलता चाहने वाला गणेश की, 'भोग प्राप्ति की कामना से चन्द्रमा की, बल चाहने वाला वायु की तथा संसार से मुक्ति चाहने वाला मुमुक्षु यत्नतः हरि की उपासना करे। जो कामना रहित है अर्थात् सर्वकामी (सबके स्वामी प्रभु की कामना करने वाला) गदाधर नारायण की आराधना करे। 

🔥जलदाता तृप्ति पाता है। अन्नदाता को अक्षय स्वर्गलाभ होता है। तिलदाता को वांछित सन्नति परम्परा प्राप्त होती है। दीपप्रदाता को उत्तम नेत्रज्योति मिलती है। भूमिदान करने वाला वांछित ऐश्वर्य भोगलाभ करता है। स्वर्णदाता को दीर्घ आयु मिलती है। जो गृहदान करता है, उसे उत्तम लोक प्राप्त होते हैं। चांदी दाता परम सुन्दर रूप प्राप्त करता है।।जो व्यक्ति वस्त्रदान करता है, उसे चन्द्रलोक में गति मिलती है। अश्वदाता अश्विनीकुमारों के लोक में जाता है। किसी को अभयदान देने से ऐश्वर्यलाभ होता है। धान्यदाता नित्य सुखी होता है। वेद दान करने वाला ब्रह्मलोकगामी होता है। वृषदाता विपुल संपदा, गोदाता सूर्यलोक निवास, यान एवं शय्यादाता पत्नीलाभ करता है। जो मानव ब्राह्मणों को ज्ञान प्रदान करता है, उसे स्वर्ग मिलता है। गौओं को घास देने वाला सभी पापों से छुटकारा पाता है। लकड़ी (इंधन हेतु) दान करने वाले की भूख बढ़ती है। रोगी को रोग शान्ति के लिये औषधि, तैल, सुपथ्य देने वाला व्यक्ति निरोग रहता है। वह सुखपूर्वक दीर्घायु पाता हैं। जो व्यक्ति छाता तथा पादुका दान करता है, उसे छूरे जैसी धार वाले असिपत्रवन नरक तथा तीक्ष्ण रौद्रपथ वाले नरक से छुटकारा मिलता है। जिसे जो वस्तु प्रिय है, उसे वही वस्तु ब्राह्मण को दान देनी चाहिये। गुणी ब्राह्मण को ही दान देना चाहिये। ऐसा करने वाला रोज-रोज अपनी इच्छित वस्तुओं को प्राप्त करता है। 

🔥 उत्तरायण, दक्षिणायन, महाविषुव प्रभृति संक्रान्ति, चन्द्र-सूर्यग्रहण के समय दान देने से प्रभुत एवं अक्षयफल मिलता है। प्रयाग आदि श्रेष्ठ तीथों में दान करके धर्म द्वारा जिस पुण्य की प्राप्ति होती है. उससे बढ़ कर पुण्य कहीं भी जगत् में नहीं होता।।

🔥 स्वर्ग से पतन न हो तथा सभी पाप शान्त हों, इस इच्छा से यज्ञादि करे तथा गौ, अग्नि अथवा देवता के निमित्त दान करना चाहिये। इस काम को करने से रोकने वाला पापी तिर्यक् योनि में जन्म लेगा। अकाल में अन्न के न मिलने से यदि कोई ब्राह्मण मर रहा है, यह जान कर भी यदि नराधम व्यक्ति उस व्यक्ति को अन्नादि देकर नहीं बचाता, उसे ब्रह्महत्या पाप का भागी होना पड़ेगा। यह निश्चित है।।

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ब्रह्मोवाच

अथातः संप्रवक्ष्यामि दानधर्ममनुत्तमम्।अर्थानामुचिते पात्रे श्रद्धया प्रतिपादनम्॥ दानन्तु कथितं तज्ज्ञैर्भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्। न्यायेनोपार्जयेद्वित्तं दानभोगफलञ्च तत्॥अध्यापनं याजनञ्च वृत्तमाहुः प्रतिग्रहम्। कुषीदं कृषिवाणिज्यं क्षत्रवृत्तोऽथवार्जयेत्॥ यद्दीयते तु पात्रेभ्यस्तद्दानं सात्त्विकं विदुः। नित्यं नैमित्तिकं काम्यं विमलं दानमीरितम्॥अहन्यहनि यत्किञ्चिद्दीयतेऽनुपकारिणे। अनुद्दिश्य फलंतस्माद् ब्राह्मणाय तुनित्यशः।। यत्तु पापोपशान्त्यै च दीयते विदुषां करे। नैमित्तिकं तदुद्दिष्टं दानं सद्भिरनुष्ठितम् ॥अपत्यविजयैश्वर्य्यस्वर्गार्थ यत्प्रदीयते।दानंतत्काम्यमाख्यातमृषिभिर्धर्मचिन्तकैः॥ईश्वरप्रीणनार्थाय ब्रह्मवित्सु प्रदीयते। चेतसा सत्त्वयुक्तेन दानं तद्विमलं शिवम्॥ इक्षुभिः सन्ततां भूमिं यवगोधूमशालिनीम्। ददाति वेदविदुषे स न भूयोऽभिजायते। भूमिदानात्परं दानं न भूतं न भविष्यति ।।विद्यां दत्त्वा ब्राह्मणाय ब्रह्मलोके महीयते। दद्यादहरहस्तास्तु श्रद्धया ब्रह्मचारिणे। सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मस्थानमवाप्नुयात्॥वैशाख्यांपौर्णमास्यान्तुब्राह्मणान्सप्तपञ्च च।उपोष्याभ्यर्चयेद्विद्वान्मधुना तिलपिष्टकैः।।गन्धादिभिः समभ्यर्च्य वाचयेद्वा स्वयं वदेत्॥प्रीयतां धर्मवाचाभिस्तथा मनसि वर्त्तते। यावज्जीवं कृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ॥कृष्णाजिने तिलान्कृत्वा हिरण्यमधुसर्पिषा । ददाति यस्तु विप्राय सर्वं तरति दुष्कृतम्।घृतान्नमुदकञ्चैव वैशाख्याञ्च विशेषतः। निर्दिश्य धर्मराजाय विप्रेभ्यो मुच्यते भयात्॥ द्वादश्यामर्चयेद्विष्णुमुपोष्याघप्रणाशनम्। सर्वपापविनिर्मुक्तो नरो भवति निश्चितम्॥यो हि यां देवतामिच्छेत्समाराधयितुं नरः । ब्राह्मणान्पूजयेद्यन्नाद्भोजयेद्योषितः सुरान्॥सन्तानकामः सततं पूजयेद् वै पुरन्दरम्। ब्रह्मवर्चसकामस्तु ब्राह्मणान् ब्रह्मनिश्चयात्॥आरोग्यकामोऽथ रविं धनकामो हुताशनम्।कर्मणां सिद्धिकामस्तु पूजयेद् वैविनायकम्॥भोगकामो हि, शशिनं बलकामः समीरणम्।मुमुक्षुः सर्वसंसारात् प्रयत्नेनार्चयेद्धरिम्।अकामः सर्वकामो वा पूजयेत्तु गदाधरम्॥वारिदस्तृप्तिमाप्नोति सुखमक्षय्यमन्नदः । तिलप्रदः प्रजामिष्टां दीपदश्चक्षुरुत्तमम्॥ भूमिदः सर्वमाप्नोति दीर्घमायुर्हिरण्यदः । गृहदोऽग्रयाणि विश्वानि रूप्यदो रूपमुत्तमम्॥वासोदश्चन्द्रसालोक्यमाश्विसालोक्यमश्वदः। अंनडुहः श्रियं पुष्टां गोदो ब्रध्नस्य पिष्टपम्॥यानशय्याप्रदो भार्य्यामैश्वर्य्यमभयप्रदः । धान्यदः शाश्वतं सौख्यंब्रह्मदो ब्रह्म शाश्वतम्।। वेदवित्सु ददज्ज्ञानं स्वर्गलोके महीयते। गवां घासप्रदानेन सर्वपापैः प्रमुच्यते नरः ॥इन्धनानां प्रदानेन दीप्ताग्निर्जायते औषधं स्नेहमाहारं रोगिरोगप्रशान्तये । ददानो रोगरहितः सुखी दीर्घायुरेव च॥ असिपत्रवनं मार्ग क्षुरधारसमन्वितम्। तीक्ष्णातपञ्च तरति छत्रोपानत्प्रदानतः॥ यद्यदिष्टतमं लोके यच्चास्य दयितं गृहे। तत्तद् गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता।।अयने विषुवे चैव ग्रहणे चन्द्रसूर्य्ययोः। संक्रान्त्यादिषु कालेषु दत्तं भवति चाक्षयम् ॥प्रयागादिषु तीर्थेषु गयायाञ्च विशेषतः। दानधर्मात्परो धर्मो भूतानां नेह विद्यते॥स्वर्गादच्युतिकामेन दानं पापोपशान्तये। दीयमानन्तु यो मोहाद्विप्राग्निष्वध्वरेषु च।निवारयति पापात्मा तिर्य्यग्योनिं व्रजेन्नरः।।यस्तु दुर्भिक्षवेलायामन्नाद्यं न प्रयच्छति । भ्रियमाणेषु विप्रेषु ब्रह्महा स तु गर्हितः ॥


पं० धवलकुमार शास्त्री वैदिक ब्राह्मण संन्यास आश्रम अहमदाबाद गुजरात-


---->>>>>>> प्रश्न अपने गुरुदेव से करे 🏵️



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