जिसकी बुद्धि बिगडी हो
यह उपाय करे जिसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई हो घरमें पवित्रतासे रसोई करो। रसोईघरको पवित्र रखना चाहिये। रसोईघर अन्नपूर्णाजीका मन्दिर है। साधारण कोई मानव रसोईघरमें आये नहीं, अन्न-जलको छुए नहीं। स्पर्शसे अनेक दोष उत्पन्न होते हैं—रसोईघरको पवित्र रखो। बहुत- से लोग चप्पल पहन करके रसोईघरमें जाने लगे हैं- अपनेको बड़ा सयाना समझते हैं; ऐसा मानते हैं कि हम तो सुधरे हुए हैं। “सुधरे हैं कि बिगड़े हैं—ये तो भगवान् ही जाने ! रसोईघर अन्नपूर्णाजीका मन्दिर है - पवित्रतासे रसोई करो। कभी बाजारका खाना नहीं। बाजारका जो खाता है, उसकी बुद्धि बहुत बिगड़ती है। बाजारकी वस्तुमें अनेककी नजर पड़ती है— दृष्टिदोष आता है। बाजारकी वस्तुमें स्वच्छता भले ही हो जाय - पवित्रता जरा भी नहीं होती । छ: महीनेतक बाजारका खाना छोड़ो, घरमें पवित्रतासे रसोई करो- भगवान्को भोग लगाओ। छ: महीना पवित्र अन्न पेटमें जाय, फिर देखो - बुद्धि कैसी सुधरती है! ।।श्री डोंगरे जी महाराज की वाणी!!