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निन्दिता जापकाः

विशेष विप्रो के लिए -:-  *"निन्दिता जापकाः"* *जपकर्म्मादिषु वर्ज्जनीयाः* *" संध्योपासनरहित:।व्यसनी। वामनः। खल्वाटः। कुब्जकः। कुनखी। शठः। चपलः। अधिकाङ्गः। हिनाङ्गः। पापी। कुटिलः। व्याधितः। तार्किकः। वार्द्धिकः। काकस्वरः। बकवृत्तिकः। गुरुदेवद्विजातिनिदकः। वृषलिपतिः। साहसिकः। अशुचिः। पण्यरङ्गोपजिवी। नास्तिकः। क्लिबः। धर्म्मवृत्तविवर्जितः। परदाररतः। निघृणी। दुर्ह्रदयः। अतिकृष्णः। अतिगौरः। केकराक्षः। कातरः। जडः। पशुशास्त्ररतः। कुण्डः। गोलकः। स्वयंभूः। शवश्राद्धभुक्। लम्बोष्ठकः। भग्नवक्रः। शिशुः। अतिवृद्धः। बधिरः। कपिलाङ्गः। व्यङ्गः। गर्वितः। स्तब्धः। कलिप्रियः। परापवादरतः। पिशुनः। असंस्कृतः। दीनः। दुश्चर्माः। सालस्यः। अतिस्थूलः। अतिकृशः। विषग्रन्थोपजीवी। अभिशस्तः। निष्ठीवनशीलः। कुवृत्तिकः। कुष्ठी। काणः। गारुडी। म्लेच्छदेशवासी।   मांसभक्षी। तन्त्रशास्त्रविद्वेषकः। पुराणनिन्दकः। प्रतिमानिन्दकः। अनेककार्ययुक्तः। रोगी।" इत्यादिदोषयुक्ता विशेषतो जपकर्म्मादिषु वर्ज्जनीयाः।।वैदिकमन्त्रेष्वयं विचारः (ऐसा न होता तो शूद्रादि हीन जन व महापातकी भी पापनिवृत्ति हेतुत्वात् अपने अधिकार ...

सप्तशती पाठ दक्षिणा निर्णय

 सप्तशतीपाठदक्षिणा - पञ्चस्वर्णाः शतावृत्ते पक्षावृत्ते तु तत् त्रयम्। पञ्चावृत्ते स्वर्णमेकं त्रिरावृत्ते तदर्धकम्। एकावृत्ते पादमेकं दद्याद्वा शक्तितो बुधः।। इति ((( मारीचिकल्पे)))) यथा "कर्षं सुवर्णस्य सुवर्णसंज्ञम्" लीलावती पाटी गणित कर्षभर सुवर्ण को सुवर्ण कहते हैं। तत्रैव - "माषाह्वयैः षोडशभिश्च कर्षम्। १६ माष का १ कर्ष होता हैं। तत्रैव - " दशार्धगुंजं प्रवदंति माषः दश आधी रक्तिका माने ५ गुंजा का १ माष प्रयुक्त हैं। यथा माष = 5 रक्तिका × कर्ष= 16 माष = 80 रक्तिका अथवा गुंजा  तुलाधारीका( स्वर्णादि माप की तराजु में तोलनेपर ) ८०रक्तिका साम्य 8 ग्राम सुवर्ण  100 आवृत्ति - 5 सुवर्ण = ८×५ =४० ग्राम लगभग 4 तोला सुवर्ण  १५ आवृत्ति 3 स्वर्ण=> 8 × 3 = 24 ग्राम लगभग दोतोला 4 ग्राम सुवर्ण 5 आवृत्ति  1 स्वर्ण = ८ ग्राम सुवर्ण 3 आवृत्ति  0।। = ४ ग्राम सुवर्ण  1 आवृत्ति  0। = 2 ग्राम सुवर्ण  इसे वर्तमान के नाणक में गिनने के लिए तात्कालिक जिस प्रदेश में अनुष्ठान करना हो उस प्रदेश के ऑनलाईन स्वर्ण के तात्कालिक मूल्य नेट पर से मिल जाते हैं।  जैसे...

आचारकाण्ड , ग्रहशांति विवरण

 आचारकाण्ड ग्रह शांति विवरण याज्ञवल्क्यजीने कहा-हे मुनियो! लक्ष्मी एवं सुख शान्तिके इच्छुक तथा ग्रहोंकी दृष्टिसे दुःखित जनाँको ग्रहशान्तिके लिये तत्सम्बन्धित यज्ञ करना चाहिये। विद्वानकि द्वारा सूर्य, सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु- ये नौ ग्रह बताये गये हैं। इनकी अचकेि लिये इनकी मूर्ति क्रमश: इन द्रव्योंसे बनानी चाहिये-ताम्र, स्फटिक, रक्तचन्दन, स्वर्ण, सुवर्ण, रजत, अयस् (लोहा), सीसा तथा कांस्य । अर्थात् सूर्यग्रहके लिये ताम्र धातु, चन्द्रके लिये स्फटिक, मंगलके लिये रक्तचन्दन, बुध एवं बृहस्पतिके लिये स्वर्ण, शुक्रके लिये रजत, शनिके लिये लोहा, राहुके लिये सीसा तथा केतुके लिये कांस्य धातु प्रशस्त है। सूर्यका वर्ण लाल, चन्द्रमाका सफेद, मंगलका लाल, बुध तथा बृहस्पतिका पीला, शुक्रका श्वेत, शनि, राहु और केतुका काला वर्ण होता है। इसी वर्णके इनके द्रव्य भी होते हैं। एक पाटेपर वस्त्र बिछाकर ग्रहवर्णोंके अनुसार निर्दिष्ट द्रव्योंके द्वारा विधिपूर्वक उनकी स्थापना तथा पूजा होम करे। उन्हें सुवर्ण, वस्त्र तथा पुष्प समर्पित करे। उनके लिये गन्ध, बलि, धूप, गुग्गुल भी देना चाहिये। त...