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Showing posts from December, 2022

वैदिक यज्ञाधिकार किसका ?

 અશાસ્ત્રીય યજ્ઞયાગાદિ ધાર્મિક વિધિ વિધાન કરાવનાર યજમાન અને "અયાજ્યાયાજન" કર્મ કર્તા વિપ્રો માટે નરક ના માર્ગ પ્રશસ્ત છે.  અનધિકૃત યજમાન માટે પૌરાણિક યજ્ઞયાગાદિ  વિધાન ને જાણવા છતાં જે શાસત્રાજ્ઞા નુ ઉલ્લંઘન કરે છે એ દ્વિજો એ ચાંડાલત્વ ને પ્રાપ્ત કરી લીધુ સમજી લેવું જોઈએ.મંત્ર તારક પણ છે, મંત્ર મારક પણ છે જેથી પોતપોતાના અધિકાર ને જાણીને સમજીને ગુરુ આજ્ઞા બાદ જ મંત્ર પ્રયોગ કરવો શાસ્ત્રસંમત અને હિતાવહ છે  અનાધિકારી ને વૈદિક વિધાન કરાવવા છતા અનાધિકારી ને શુભમનવાન્છિત ફલ ની પ્રાપ્તિ થતી હોય છે જે કર્મ નુ શુભાશુભ ફળ છે. बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय કર્તા બંધક છે અને કર્મબંધન છે જેથી અનાધિકારી ને અશાસ્ત્રોક્ત અયાજ્ય યાજન કરાવનાર વિપ્ર પોતાનુ દ્વિજત્વ ગુમાવી ચૂકે છે અજ્ઞાનતાવશ ગુમાવી ચૂકેલ દ્વિજત્વ પુન: પ્રાપ્ત કરવા કટિબદ્ધ બની ઉચિત શાસ્ત્રોક્ત પરિક્ષણ બાદ સપ્રાયશ્ચિત પુનરુપનયન થકી પોતાનો વૈદિક અધિકાર પ્રાપ્ત કરી સકે છે અને પોતાના દ્વિજત્વ નુ સંરક્ષણ કરી સકે છે.  १ शूद्राणामपि मन्त्रवज्यं ग्रहयज्ञकरण अधिकार:-  शूद्रधर्मप्रकरणे मनुः-  धर्मेप्स्वस्तु धर्मज्ञाः सता...

वृद्ध कौन?

 श्रोतव्यं खलु वृद्धानामिति शास्त्र निदर्शनम्  वृद्धो की बात सुननी चाहिए एसी वेदादिशास्त्रो (वृद्धं च मे) का कथन है।  ज्ञान वृद्धोपि वृद्ध आयु वृद्ध- जो आयु ( उम्र) की दृष्टि से बड़े होते हैं ।  ज्ञान वृद्ध- जो ज्ञान की दृष्टि से बड़े होते हैं।  अनुभव वृद्ध- जो अनुभव की दृष्टि से बड़े होते हैं। तपो वृद्ध - जो तप कर कर के तप की दृष्टि से बडे होते है।  पदानुरूप भी वृद्ध होते है,, 😄 विवाहसंस्कार के बाद एक मे से दो, दो मे से तीन, चार, पांच हो जाते है इसे भी वृद्ध कह सकते है।  कोई  बल  में  बड़ा  होता  है, कोई  आयु  में    बड़ा  होता  है  कोई  कदाचित्  धन  में  भी   बड़ा  होता  है~~~ संतों  की  दृष्टि  में  जो    ज्ञान  में  बड़ा  होता  है  उसे  ही  बड़ा  माना   जाता  है  सनकादिक  ऋषि  कहते  हैं~~~   सूतजी  आप  देखने  में  छोटे  ल...

यज्ञादि मे अग्नि के भेद

 अग्नि के भेद यज्ञादि कर्मों में अग्नि के नाम एवं वेदों में अग्नि की महत्ता अग्नि की उत्पत्ति के सम्बन्ध में पौराणिक गाथा इस प्रकार है-सर्वप्रथम धर्म की वसु नामक पत्नी से अग्नि उत्पन्न हुआ। उसकी पत्नी स्वाहा से उसके तीन पुत्र हुए- पावक पवमान शुचि छठे मन्वन्तर में वसु की वसुधारा नामक पत्नी से द्रविणक आदि पुत्र हुए, जिनमें 45 अग्नि-संतान उत्पन्न हुए। इस प्रकार सब मिलाकर 49 अग्नि हैं। विभिन्न कर्मों में अग्नि के भिन्न-भिन्न नाम हैं। लौकिक कर्म में अग्नि का प्रथम नाम पावक है। गृहप्रवेश आदि में निम्नांकित अन्य नाम प्रसिद्ध हैं- अग्नेस्तु मारुतो नाम गर्भाधाने विधीयते। पुंसवने चन्द्रनामा शुगांकर्मणि शोभन:।। सीमन्ते मंगलो नाम प्रगल्भो जातकर्मणि। नाग्नि स्यात्पार्थिवी ह्यग्नि: प्राशने च शुचिस्तथा।। सत्यनामाथ चूडायां व्रतादेशे समुद्भव:। गोदाने सूर्यनामा च केशान्ते ह्यग्निरुच्यते।। वैश्वानरो विसर्गे तु विवाहे योजक: स्मृत:। चतुर्थ्यान्तु शिखी नाम धृतिरग्निस्तथा परे।। प्रायश्चित्ते विधुश्चैव पाकयज्ञे तु साहस:। लक्षहोमे तु वह्नि:स्यात कोटिहोमे हुताश्न:।। पूर्णाहुत्यां मृडो नाम शान्तिके वरदस्तथा।...