यज्ञो मे विप्रो के शास्त्रोक्त चयन प्रक्रिया का प्राथमिक चरण
यज्ञो मे विप्रो के शास्त्रोक्त चयन प्रक्रिया का प्राथमिक चरण -:-
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सभी याज्ञिक कर्मो मे यजमान सहित सभी का परिक्षण होना जरूरी है। यज्ञ की पवित्रता हेतु, अधिकार हेतु, सफलता हेतु, देवो की प्रीति हेतु जरूरी है।
पौराणिक/वैदिक यज्ञादि कर्मो मे अधिक संख्या मे बिना प्राथमिक परिक्षण के ब्राह्मणो का वरण नहि करना चाहिए अन्यथा त्रुटि के कारण यज्ञकर्म हेतु सिद्ध नहि होता। वैदिक कर्म मे तो अधिक कुलिन ब्राह्मणो की आवश्यकता रहती है। इस अयाज्यायाजन ना हो इस हेतु यजमान का भी परिक्षण भी करना चाहिए *अयाज्यायाजन के प्रायश्चित्त* के बारे मे पुछो ही मत...... इस हेतु परिक्षण आवश्यक है।
अध्यात्मिक यज्ञादि कर्म मे जितनी अपरिक्षित ब्राह्मणो की संख्या अधिक , अनाधिकारो के संसर्ग के कारण कर्म मे उतने ही अधिक दोष की संभावना होती है,यज्ञ कर्म हेतु सिद्ध नहि होता है,यज्ञ का रक्षण हो इसलिए सावधान रहना जरूरी है,और अधिक विप्रो की वरणी करनी हो तो सबसे पहले परिक्षण मे संमति हो तभी स्वेच्छा से सामान्य गोत्रादि परिक्षण करके यज्ञ मे वरण करना चाहिए। जिसको अपने कुलगोत्र का ज्ञान न हो वो शंकास्पद होते है।
शास्त्रीय मार्गदर्शन का अनुगमन नहि करते और अगर हम यह समजे के वर्तमान मे यह सब नियम लागु नहि होते तो आप अज्ञानी हो, आपको यह सोचना चाहिए की अगर यह सच होगा तो इसका #प्रायश्चित क्या होगा ? हमारी पारलौकिक गति मे यह बाधारूप ना बने इससिए अपने अपने अधिकार की सीमा मे रहकर धर्ममार्ग का अनुगमन करे।
राक्षसाः कलिमाश्रित्य जायन्ते ब्रह्मयोनिषु। कलियुग का आश्रय लेकर राक्षस ब्रह्मयोनि मे पेदा होते है
ब्राह्मणानेव बाधन्ते तत्रापि श्रोत्रियान्कृशान्।। फिर वे राक्षस ज्यादातर विद्वान सज्जन को पीडते है। जो धर्म का अनुगमन करते है।
यज्ञकर्ता के पास यदि कोइ पंक्ति मे अपरिक्षित पतित होगा तो पतित से ४ हाथ की दूरी, रजस्वला से ८ हाथ की दूरी प्रसूता से १२ हाथ की दूरी और चाण्डाल से १६ हाथ की दूरी बनाइ रखनी चाहिए यज्ञकर्ता के इतने से अधिक निकट आवे तो यज्ञकर्ता को सचैलस्नान करना चाहिए यदि अज्ञान से छू लेवे तो स्नान करके सूर्यावलोकन करना चाहिए। सभी के हित मे यह शास्त्र का विधान है।
इसलिए बिना परिक्षित बडे कर्मो मे ज्यादा विप्रो की नियुक्ति नहि करनी चाहिए।
हर हर महादेव हर 🚩
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