विधान की शास्त्रीयता
#भो_भो_विप्रा:
सचैल स्नान करने मे इतना प्रमाद क्यु ??
यज्ञकार्य मे स्पर्शाअस्पर्श दोष निवारण हेतु अत्यंत सरल और पवित्रता/शुद्धता हेतु यज्ञकार्य अधिकार हेतु सचैल स्नान विधि जरूरी है। कोइ बडी विधि भी नहि है। अन्य वस्त्र नहि तो भी कोइ दिक्कत नहि। हमारे धर्म सूत्रो मे सब व्यवस्था है। आचार्याज्ञानु पालन तो ठीक अपितु धर्म पालन हेतु मन मे कर्तव्यपरायणता की दृढ भावना से भी स्वकल्याण हेतु स्नान कर लेना चाहिए। अन्यथा #आचार्य_देवो_भव की प्रतिज्ञा नहि करनी चाहिए।
युगं युगद्वयं चैव त्रियुगं च चतुर्युगम्।
#चाण्डाल #सूतिकोदक्या #पतितानामधः_क्रमात् ॥
पतित रजस्वला प्रसूता और चाण्डाल -- इन सबसे क्रमशः ४/८/१२/१६ हाथ के अन्तराल से #दूर रहना अथवा यज्ञ श्राद्ध आदि में कर्ममण्डप से पतितादिको कों इतने अन्तर से दूर रखना अगर अपना द्विजत्व बचाए रखना चाहते हो।
#शास्त्रीय_व्यवस्था
ततः सन्निधिमात्रेण #सचैलं_स्नानमाचरेत् । स्नात्वाऽवलोकयेत्सूर्यमज्ञानात्स्पृशते यदि ॥
यदि इतने से अधिक समीप वे आ जाँय तो वस्त्रसहित स्नान कर डाले । यदि अज्ञान से इन्हें छू लेवे तो स्नान करके सूर्य का अवलोकन करे ज्ञान से स्पर्श करने में ८००० गायत्रीजप भी करना होता है ॥
#क्या_व्यवस्था_करे?
समूह मे अगर वस्त्र की व्यवस्था ना हो तो स्नान किए वस्त्रो को पुन: निचोड कर शरीर पोछकर पुन: जल मे भिगोकर निचोडने के बाद दाहिने हाथ से पकडकर उसे चोगुना करके १२ बार थपथपाने से वे वस्त्र पुन:धारण करने हेतु उपयुक्त हो जाते है। और कर्म मे विप्रो के प्रायश्चित्त हेतु अशास्त्रीयता नहि रहती ।
यज्ञकार्यो मे चाण्डाल, पतित इत्यादि अस्पृश्य कौन? इन सब की शास्त्रीय अधिकार विधि विधान के बारे मे विशेष जानकारी के लिए अपने गुरू के सान्निध्य मे जाए। और स्वयं को पतित होने से बचाए। तभी तो अधिकार की सीमा मे रहकर सबका आध्यात्मिक उत्कर्ष होगा।
जय महादेव 🚩
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