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 *विशुद्ध अपतित ब्राह्मणो को चाहिये कि* द्विजत्वच्युत , पतित , कुंड , गोलक , गोत्रहीन , क्रियाहीन, व्रात्य ,शाखारण्डदोष आदि दूषित ब्राह्मणों को और अन्य तीन जातियो को एवं पतित,पातकी,महापातकी, द्विजत्व भ्रष्ट वर्णसंकर ब्राह्मणो को भी न तो प्रणाम करना चाहिए,न चरणस्पर्श। लेकिन हां त्रैवर्णो के लिए तो ब्राह्मण सदा पूजनीय ही रहेगा यही शास्त्र का आदेश है । हा! आशीर्वाद बिल्कुल देना चाहिए। यहीं शास्त्रीय मर्यादा है। नारायण

शुद्ध भोजन विचार

 *शुद्धभोजनपाक* #स्वयंपाकविचार -->  त्रैवर्णिकस्त्रीयाँ(जो व्रात्य वा शाखारण्ड की पत्नी न हो , जो पतित की पत्नी या पतिता न हो), जो शौचाचार व संस्कारो से शुद्ध हो उसके द्वारा  भक्ष्य, भोज्य, पेय अन्नादि पकाने हेतु न स्वयं वा न स्त्री पाककर्ता को पाक बनाते समय पाक के समीप ऊंचे स्वर में अधिक बोलना चाहिए, न गले से घुरघुरारव करना चाहिए, न छींक् खानी चाहिए, न पाक बनाते समय खाना चाहिए, पाक बनाते समय अपने वा अन्य के केश या अंगवस्त्र का स्पर्श हो जाने  पर जल से हाथ साफ करे, न खूले केश भोजन बनाए।  स्वयंपाक की परिभाषा --->  अपने हाथ से , पत्नी के हाथ से , पुत्र के हाथ से बनाया हुआ भोजन स्वयंपाक हैं इसमें भी पतितो की ग्राह्यता नहीं हैं। कलिवर्ज्य कुंड, गोलक, समानगोत्रप्रवरगणोढासंताने,शाखारण्ड, व्रात्य तथा  असवर्णविवाहोत्पन्न जातको की मदद से बना पाक स्वयंपाक की तुलना में नहीं हैं। यदि गुरु, श्वशुर, मामा , चाचा, श्रोत्रियब्राह्मण , भाई आदि - ये पतित न हुए हो तो उनका अन्न उनके द्वारा कृत वैश्वदेवोपरांत ग्राह्य हैं, अर्थात् स्वयंपाकतुल्य हैं। (समान शुद्धि // अशु...