शुद्ध भोजन विचार

 *शुद्धभोजनपाक*


#स्वयंपाकविचार --> 


त्रैवर्णिकस्त्रीयाँ(जो व्रात्य वा शाखारण्ड की पत्नी न हो , जो पतित की पत्नी या पतिता न हो), जो शौचाचार व संस्कारो से शुद्ध हो उसके द्वारा  भक्ष्य, भोज्य, पेय अन्नादि पकाने हेतु न स्वयं वा न स्त्री पाककर्ता को पाक बनाते समय पाक के समीप ऊंचे स्वर में अधिक बोलना चाहिए, न गले से घुरघुरारव करना चाहिए, न छींक् खानी चाहिए, न पाक बनाते समय खाना चाहिए, पाक बनाते समय अपने वा अन्य के केश या अंगवस्त्र का स्पर्श हो जाने  पर जल से हाथ साफ करे, न खूले केश भोजन बनाए। 


स्वयंपाक की परिभाषा --->  अपने हाथ से , पत्नी के हाथ से , पुत्र के हाथ से बनाया हुआ भोजन स्वयंपाक हैं इसमें भी पतितो की ग्राह्यता नहीं हैं। कलिवर्ज्य कुंड, गोलक, समानगोत्रप्रवरगणोढासंताने,शाखारण्ड, व्रात्य तथा  असवर्णविवाहोत्पन्न जातको की मदद से बना पाक स्वयंपाक की तुलना में नहीं हैं।

यदि गुरु, श्वशुर, मामा , चाचा, श्रोत्रियब्राह्मण , भाई आदि - ये पतित न हुए हो तो उनका अन्न उनके द्वारा कृत वैश्वदेवोपरांत ग्राह्य हैं, अर्थात् स्वयंपाकतुल्य हैं। (समान शुद्धि // अशुद्धि वाले अपने समान व्यक्ति के साथ व्यवहार्य हैं) 


यदि उपाध्याय, ऋत्विज, आचार्य, गुरु या शिष्य पतित वा द्विजत्वभ्रष्ट  न हो तो उनका अन्न परान्न नहीं हैं। इनके अन्न कृतवैश्वदेवोपरांत ग्राह्य हैं। ==============================================================>


धर्मसूत्रे ---> आर्याः प्रयता वैश्वदेवेन्नं संस्कर्तारः स्युर्भाषां कासं क्षवथुमित्यभिमुखोऽन्नं वर्जयेत्केशानङ्गवासश्चाऽलभ्याप उपस्पृशेदार्याधिष्ठिता """ ०।।


स्मृतिरत्नाकरे - स्वहस्तेन स्वयंपाकः पत्न्या वा पच्यते यदि । पुत्रेण पच्यते वाऽपि स्वयंपाकः प्रकीर्तितः।। परपाकनिवृत्तोऽपि गुरुश्वशुरमातुलाः। पितृव्यः श्रोत्रियो भ्राता एषामन्नं न हि त्यजेत्।।  उपाध्यायस्यर्त्विजश्च आचार्यस्य गुरोस्तथा । शिष्यस्य चैव यच्चान्नमपरान्नं प्रकीर्तितम्।।

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