Posts

Showing posts from July, 2023

पुनरुपनयन निमित्तानी ४५

 ४५ पुनरुपनयन निमित्तानि - जिस कारणो वा अपराध से द्विजो विशेष ब्राह्मण का द्विजत्व नष्ट होता हैं पुनः द्विजत्व की प्राप्ति हेतु पुनरुपनयन निमित्तो को जानना आवश्यक हैं । कलियुग में उपनेतृ लक्षण वाले आचार्य मिलना दुर्लभ हैं  किसी का उपनयन यदि आचारनिष्ठ स्वशाखावलम्बी आचार्य के द्वारा सम्पन्न हो गया तो इस निमित्तो के ज्ञान होनेपर उसे इन्हीं अपराध वा कृत्य से दूरी बना लेनी चाहिये अथवा तो करे ही नहीं। जिसका द्विजत्व नष्ट होता हैं उसका प्रायश्चित्त पुनरुपनयन तक  समस्त द्विजकर्मो को करने में  अधिकार भी चलायमान हो जाता हैं , इसलिये संस्कार रत्नमाला में गोपीनाथजी भट्ट ने कर्मलोपभयाद्रात्रावपि पुनरुपनयन करने को कहा हैं। जो शाखारण्ड नहीं उसे सप्रायश्चित्त पुनरुपनयन तक नित्यसन्ध्योपासना का अधिकार हैं अन्य द्विजकर्मो का नहीं । अथ पुनरुपनयन निमित्तानि  (१) नारदः -  विनर्तुना वसन्तेन कृष्णपक्षे गलग्रहे। अपराह्णे चोपनीतः पुनः संस्कार मर्हति ।।"अपराह्ण स्त्रिधा विभक्तदिनतृतीयांशः। वसन्ते गलग्रहो न दोषायेत्यर्थः।। नारदः - कृष्णपक्षे चतुर्थी च सप्तम्यादि दिनत्रयम्। त्रयोदशी चत...