वर्णसंकरो की पहचान

 ~~*#वर्णसंकरों की पहचान और इनके लक्षण*# - ।। 


● ये नेताओं के भक्त होते है लेकिन प्रभु के नही प्रभु का केवल नाम प्रयोग करते है अपने स्वार्थ हेतु 

● ये नेताओं की सुनते है पर शंकराचार्य जी सन्तों और ब्राह्मणों की नही । 

●ये धर्म की बात तो करते है पर शास्त्रों के अनुसार नही 

● ये राष्ट्र की बात तो करते है पर नीति अनुसार नही करते

● ये खुद वर्णसंकर है इसी कारण ये वर्ण व्यवस्था कभी नही मानते धर्म के मूल वर्ण को मानने से मना कर देते है 

● भक्ष्य अभक्ष्य शौचाचार इनके घरों में कुछ नही मिलेगा कहीं भी जाकर कुछ भी ठूस लेना और फिर स्वयं को धार्मिक और राम भक्त दिखाना ये दिखावा इनके अंदर कूट कूट के भरा रहता है 

● जप तप साधना से इनका दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नही होता क्योंकि ये पहले ही वर्णसंकर है तो न तो ऐसो का कोई गुरु हो सकता है न ही शास्त्र को समझने और उस अनुसार चलने की बुद्धि इनमें होती इसीलिए ये आजीवन केवल मनमाने ढंग और मनमानी सोच से चलकर समाज को और अपने जैसे वर्णसंकरों को भटकाने में अहम भूमिका निभाते है 

● जात पात वर्ण व्यवस्था सबको झूठ कहकर ये लोग किसी के साथ भी विवाह करने में नही हिचकते मानवता ही सब कुछ है कहकर अंग्रेजों के द्वारा की गई मिलावट को मानते है 

● क्योंकि ये वर्णसंकर है इसीलिए ये कभी कर्मणा ब्राह्मण बन जाते है कभी क्षत्रिय कभी वैश्य और शूद्र सब

● इनके गुरु कुल कलंक वाले ही होते है और ये ब्राह्मण द्रोही देव द्रोही और शास्त्र विरुद्ध चलने वालों को और ऐसे को ही आजीवन अपना गुरु मानते है 

● दोगलापन इनकी रग रग में भरा होता है क्योंकि ये कुलीन नही होते 

● ये बुद्ध को मानते है पर भगवान आदि शंकराचार्य को नही 

● ये विवाह आदि कार्यों तथा श्राद्ध अथवा अन्य पर्वों में कुल या गोत्र का विचार नही करते केवल मानवता मानवता का राग अलापकर वो सब कार्य करते है जिनसे हव्य कव्य आदि कर्मों का नाश होता है और सबका फल भूत प्रेतों को प्राप्त होता है ।

● इन लोगों के घरों में सबसे अधिक भूत प्रेत तन्त्र बाधा पितृ दोष ग्रह दोष आदि की समस्या मिलती है।



❗जय महादेव❗

 ⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️

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