ग्रहरत्न धारण विधि

 ग्रहो के वास्तविक रत्न ही धारण करें उपरत्न या वैकल्पिक नहीं - 


ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों के अरिष्ट शान्ति के लिए अथवा निर्बल ग्रह को बल प्रदान करने के लिए रत्न धारण करने की व्यवस्था की गई है। । रत्न धारण करने से पूर्व रत्नों के पूजन करने का विधान है क्योंकि रत्न खान से निकलने पर उन्हें धारण योग्य बनाने के लिए संघर्षण, संघटन इत्यादि प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है जिससे उनका प्राकृतिक गुण मन्द हो जाता है अतः विधि पूर्वक पूजन करने से वे जागृत एवं पूर्ण शक्तिमान हो जाते हैं। प्रधान रूप से नवग्रहों के नव रत्न ही होते हैं यथा सूर्य का माणिक्य, चन्द्रमा का मोती, मंगल का मूंगा, बुध का पन्ना, बृहस्पति का पुखराज, शुक्र का हीरा, शनि का नीलम्, राहु का गोमेद तथा केतु का लहसुनिया- ये प्रधान रत्न होने से अधिक प्रभावशाली किन्तु मंहगे होते हैं जो इन्हें क्रय करने में समर्थ नहीं हैं वे इनके उपरत्नों को धारण कर संतोष मान सकते हैं लेकिन यह शास्त्र संमत नहीं विकल्प में रुद्राक्ष आदि भले ही धारण करें जिनका मूल्य कम होता है जबकि गुणवत्ता भार में अधिक लेकर धारण करने से तद्वत् ही फल देते हैं। उक्त सभी प्रकार के रत्नों या उपरत्नों के पूजन की विधि समान ही है।

रत्नों को किसी जौहरी से परीक्षण कराकर अच्छे चमकीले जो दाग, धब्बे से रहित हों,कुछ रत्न में जीरम भी पाया जाता है, उन्हें लेकर शुभ मुहूर्त में अंगूठी या लाकेट बनवाकर यथा विहित अंगुली में अथवा गले में में धारण करना चाहिए। बच्चों को लाकेट में रत्न धारण कराना चाहिए जबकि १६ वर्ष की उम्र से लेकर वृद्धत्व तक अंगूठी में रहन धारण कराना चाहिए। 


सामान्यतः माणिक्य और मूँगा सोने की अंगूली में अनामिका अंगुली में। 


मोती, हीरा तथा पन्ना, चांदी की अंगूठी में कनिष्ठिका अंगुली में। 


पुखराज सोने की अंगूठी में, तर्जनी अंगुली में। 


नीलम्, गोमेद तथा लहसुनिया शीश, लोहा या चांदी की अंगूठी में मध्यमा अंगुली में धारण करना चाहिए। 


ग्रहों के वार में अथवा उनके होराकाल में उचित समय पर मान्य नक्षत्र में रत्न धारण करना चाहिए। यदि उक्त रीति से भिन्न अंगुली इत्यादि में धारण करना हो तो किसी योग्य ज्योतिर्विद् की सलाह से ही धारण करना चाहिए अन्यथा विपरीत होने पर उनके धारण का फल भी विपरीत हो जाता है। वैसे भी बिना कुण्डली दिखाए स्वतः कोई रत्न स्व निर्णय से धारण करना उपयुक्त नहीं होता। सामान्यतया दाहिने हाथ की अंगुलियों में ही रत्न धारण करने का विधान है। कुण्डली में कुछ स्थितियां ऐसी भी होती हैं जब बांए हाथ में भी रत्न धारण किये जाते हैं अतः इसका अच्छी तरह विचार करके धारण करें। 


रत्न या रत्नजडित अंगूठी पूजन विधि-


सर्वप्रथम जिस रत्न की अंगूठी/लाकेट का पूजन करना हो उस ग्रह के दिन में उसका पूजन करके उसी के दिन में धारण करना चाहिए। इसके लिए एक दिन पूर्व पंचगव्य - दुग्धादि पदार्थ में रत्न/अंगूठी को डुबो दें, सभी रत्न के लिए पृथक् पृथक् पदार्थ विहित हैं यथा 


माणिक्य एवं मूंगा को तिल के तैल में 


मोती तथा पन्ना को गाय के दूध में, 


पुखराज को गाय के दूध या घी में, 


हीरा को गाय के घी या दही में तथा 


नीलम् को सरसो के तेल में, 


गोमेद को गोमूत्र में तथा 


लहसुनिया को  सरसो के तेल में डुबाना चाहिए। 


उक्त द्रव्यों के अभाव में सभी को गंगाजल या तीर्थ जल में डुबाना चाहिए। माणिक्य सूर्य का रत्न है अतः इसकी पूजा रविवार को करे और पूजन करके शीघ्र धारण भी कर लें, इसी प्रकार मोती को सोमवार या पूर्णिमा को, मूँगा-मंगलवार को, पन्ना-बुधवार को, पुखराज-बृहस्पतिवार को, हीरा- शुक्रवार को, नीलम् शनिवार को, गोमेद  एवं लहसुनिया भी शनिवार को ही पूजन करके धारण करना चाहिए। उक्त दुग्धादि पदार्थ में रत्न को एक दिन पूर्व ही डुबो देना चाहिए समयाभाव में उसी दिन १ घण्टे अथाव ९ मिनट पूर्व ही डुबोकर गंगाजल या शुद्धजल से धोकर रत्न/अंगूठी को किसी पात्र में रखकर अपने सामने रख लें। तत्पश्चात् तत् तत् वर्ण के पुष्पादि से (यथा माणिक्य, मूंगा हो तो लाल फूल से मोती, हीरा हो तो श्वेत से, पन्ना हो तो हरे या पीले से, पुखराज हो तो पीले से, नीलम्, गोमेद, लहसुनिया हो तो नीले या काले पुष्प से) उस रत्न/अंगूठी का पूजन करना चाहिए।


रत्न/अंगूठी को तैलादि पदार्थ से निकालकर जल से घुलकर उसमें घृत का लेप कर अग्नि में ताप दिखावे तत्पश्चात् निम्रलिखित मंत्रों से जलाभिसिञ्चन करे उस ग्रह के वैदिक या तांत्रिक मंत्र से आवाहन करे यथा माणिक्य हो तो उसमें अक्षत एवं लाल पुष्प हांथ में लेकर सूर्य का मंत्र पढ़ें-


सूर्यास्त नमः माणिक्य रत्नेऽस्मिन् सूर्यमावाह्यामि स्थापयामि ___


(अन्य रत्न में उसके ग्रह का मंत्र ग्रहों के मंत्र अपने आचार्य से जानकर मंत्र प्राप्त कर लें ) ऐसा पढ़कर अक्षत पुष्प रत्न/अंगूठी में छोड़ दें। पुनः रक्तादि पुष्प लेकर उस रत्न/अंगूठी का पुष्प से स्पर्श करते हुए प्रतिष्ठा मंत्र पढ़ें (सभी रत्नों की प्रतिष्ठा में यह मंत्र पढ़ा जाता है।)

यहां प्रतिष्ठा में दो मत है कोइ आचार्य प्रतिष्ठा को नहीं मानते तो कोइ मानते आप अपने आचार्यों की आज्ञानुसार करें -- 

अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च अस्यै देवत्वमचर्चामै मामहेति च कश्चन्) अस्मिन् माणिक्य रत्ने सूर्यस्य (अमुकस्य)


(अन्य रत्न में उसके ग्रह का मंत्र ग्रहों के पृष्ठ संख्या ... के अनुसार देखें) ऐसा पढ़कर अक्षत पुष्प रत्न/अंगूठी में छोड़ दें। पुनः रक्तादि पुष्प लेकर उस रत्न/अंगूठी का पुष्प से स्पर्श करते हुए प्रतिष्ठा मंत्र पढ़ें (सभी रत्नों की प्रतिष्ठा में यह मंत्र पढ़ा जाता है।)


तत्पश्चात् आचार्य जो सूक्त बतावे वे मंत्रों को पढ़ते हुए उस रत्न में पाद्य, अर्घ्य आचमन तथा स्नानार्थ जल चढ़ावे उसी रंग का वस्त्र अथवा रक्षासूत्र, जनेऊ चढ़ावे, गंध, अक्षत, पुष्प, माला माला चढ़ाकर धूप, दीप दिखावे, नैवेद्य के लिए मीठा एवं फल सामने समर्पित करे पान-सुपाड़ी चढ़ावे अन्त में दक्षिणा चढ़ाकर प्रदक्षिणा करके पुष्पांजलि समर्पित करे तथा तत् तत् ग्रह के प्रार्थना मंत्र से प्रार्थना करे। तत्पश्चात् जिस ग्रह का रत्न हो उस ग्रह के मंत्र' का १०८ बार जप करके उस रत्न को अभिमंत्रित करे। अन्त में आरती पुष्पाञ्जलि करके ब्राह्मण को दक्षिणा प्रदान कर रत्न को धारण कर लेना चाहिए।


दक्षिणा संकल्प-


(दाहिने हांथ में कुशाक्षत जल दक्षिणा लेकर संकल्प करे)


अद्य गोत्रः ......नामाहं श्रुतिस्मृति पुराणोक्त फल प्राप्तये अमुक रत्न पूजनस्य सम्पूर्ण फलप्राप्तये शुभतायै च मनसोद्दिष्टां दक्षिणां तुभ्यं सम्प्रददे । (संकल्प करके दक्षिणा प्रदान करे।) रत्न धारण करने के बाद सभी श्रेष्ठ लोगों को माता पितादि को भी श्रद्धापूर्वक प्रणाम कर विष्णु स्मरण करे।


विष्णवे नमः। विष्णवे नमः। विष्णवे नमः ।।


इस प्रकार विधि पूर्वक रत्न/अंगूठी/लाकेट धारण करने से वह रत्न पूर्ण प्रभावशाली होकर धारक को लाभान्वित करता रहता है। 


संवत्सर परिवर्तन होने पर या रत्न की अवधि समाप्त होने पर पुनः रत्न की पूजा करके धारण करना चाहिए अर्थात् प्रतिवर्ष रत्न/अंगूठी का पूजन उक्त विधि से करके धारण करने से उसकी शक्ति जागृत रहती है। अन्यथा धीरे-धीरे उसका प्रभाव नष्ट हो जाता है।  इति प्रबोधरत्ने  शास्त्री धवलकुमार दवे

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