Posts

Showing posts from January, 2023

મહાભારત યુદ્ધ ભોજન વ્યવસ્થા

 મહાભારતનાં યુદ્ધમાં કોણ બનાવતું હતું લાખો સૈનિકોનું ભોજન? આજથી આશરે પાંચ હજાર વર્ષ પૂર્વે કુરુક્ષેત્રનાં મેદાનમાં હસ્તિનાપુરના જ એક ઘરના બે પરિવારો વચ્ચે લડાયેલું મહાભારતનું યુધ્ધ વિશ્વના ઇતિહાસની એક અજોડ ઘટના હતી.  કૌરવ પક્ષની ૧૧ અક્ષૌહિણી સેના અને પાંડવ પક્ષની ૭ અક્ષૌહિણી સેના વચ્ચે થયેલું આ ૧૮ દિવસના યુધ્ધની ભયાનકતાનો અંદાજ કાઢવો મુશ્કેલ છે. આશરે ૫૦,૦૦,૦૦૦ યોદ્ધાઓ રણભૂમિ પર ઉતર્યા હતા! આટલા માણસોનાં ભોજનનું શું? આવો પ્રશ્ન કદાચ તમારા મનમાં કદી જાગ્યો નહી હોય. જાગ્યો હશે તો પણ તેનો ઇચ્છીત જવાબ નહી મળ્યો હોય.  સવાલ ખરેખર સ્વાભાવિક છે અને પેચીદો પણ! દરરોજ આટલા યોદ્ધાઓને ખવડાવવું શું?  રણભૂમિ હસ્તિનાપુરથી જોજનો દૂર હોવાને નાતે સ્વાભાવિક છે કે ઘરેથી તો ભોજન ના આવતું હોય! ભોજનની વ્યવસ્થા તો રણમેદાનમાં જ કરવી પડે.   આટલા સૈનિકોને ખાવાનું પૂરું પાડવું એ કંઈ ખાવાના ખેલ તો હતા નહી! યુધ્ધની શરૂઆતમાં સૈનિકોનો આંકડો ૫૦ લાખનો હતો. વળી, દરેક દિવસે હજારો સૈનિકો યુધ્ધમાં મૃત્યુ પામે. એટલે દરરોજ જીવતા રહેલા સૈનિકોની સંખ્યા પ્રમાણે ભોજનમાં પણ ફેરકાર કરવો પડે.  દરરોજ ...

विधान की शास्त्रीयता

अत्र माधवाचार्य:-'यो विप्र: शूद्रदक्षिणामादाय तदीयं हविः शान्तिपुष्ट्यादिसिद्धये वैदिकैर्मन्त्रैर्जुहोति तस्य विप्रस्यैव दोषः #शुद्रस्तु_होमफलं_लभेतैवेति_व्याचचक्षे '॥ माधवाचार्यका यह कथन है कि, जो ब्राह्मण शू्द्र की दक्षिणा लेकर शूद्रकी हविको शान्तिपुष्टि आदिके निमित्त वेदके मन्त्रोंसे होमता है उस #ब्राह्मणको ही वेदनिषेध विधि का दोष होता है, #यथेच्छसि_तथा_कुरु ।।  भगवान् कहते है - हे अर्जुन मैने तुम्हे सब यथार्थं सत्य बता दिया अब तुमे जो इच्छा करे सो करो ।। क्युकि कर्म फल तो तुम कोहि भोगना है।। तुम कर्म करने में स्वतन्त्रः हो कर्म फल मे नहीं। हम सबके पास सीमित समय है धर्म/अधर्म का निर्णय करके सत्कर्म का अनुगमन करना चाहिए।  कर्म का थप्पड़ इतना भारी और भयंकर होता हैं कि हमारा जमा हुआ पुण्य कब खत्म हो जाये पता भी नहीं चलता ।  पुण्य ख़त्म होने पर समर्थ राजा को भी भीख मांगनी पड़ती हैं । इसलिए कभी किसी के साथ छल कपट करके, किसी की आत्मा को दुःखी ना करें।

विधान की शास्त्रीयता

 #भो_भो_विप्रा:  सचैल स्नान करने मे इतना प्रमाद क्यु ??  यज्ञकार्य मे स्पर्शाअस्पर्श दोष निवारण हेतु अत्यंत सरल और पवित्रता/शुद्धता हेतु यज्ञकार्य अधिकार हेतु सचैल स्नान विधि जरूरी है। कोइ बडी विधि भी नहि है। अन्य वस्त्र नहि तो भी कोइ दिक्कत नहि। हमारे धर्म सूत्रो मे सब व्यवस्था है। आचार्याज्ञानु पालन तो ठीक अपितु धर्म पालन हेतु मन मे कर्तव्यपरायणता की दृढ भावना से भी स्वकल्याण हेतु स्नान कर लेना चाहिए। अन्यथा #आचार्य_देवो_भव की प्रतिज्ञा नहि करनी चाहिए। युगं युगद्वयं चैव त्रियुगं च चतुर्युगम्।  #चाण्डाल #सूतिकोदक्या #पतितानामधः_क्रमात् ॥ पतित रजस्वला प्रसूता और चाण्डाल -- इन सबसे क्रमशः ४/८/१२/१६ हाथ के अन्तराल से #दूर रहना अथवा यज्ञ श्राद्ध आदि में कर्ममण्डप से पतितादिको कों इतने अन्तर से दूर रखना अगर अपना द्विजत्व बचाए रखना चाहते हो।  #शास्त्रीय_व्यवस्था  ततः सन्निधिमात्रेण #सचैलं_स्नानमाचरेत् । स्नात्वाऽवलोकयेत्सूर्यमज्ञानात्स्पृशते यदि ॥ यदि इतने से अधिक समीप वे आ जाँय तो वस्त्रसहित स्नान कर डाले । यदि अज्ञान से इन्हें छू लेवे तो स्नान करके सूर्य का अव...

यज्ञो मे विप्रो के शास्त्रोक्त चयन प्रक्रिया का प्राथमिक चरण

यज्ञो मे विप्रो के शास्त्रोक्त चयन प्रक्रिया का प्राथमिक चरण -:- https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=pfbid0AQFwkMYi77a4FEEh7MPe3NUdkdXkcUkRJ5U3iYmSwuDQZodXXacf7ikZ3AhL87C8l&id=100064036752252&mibextid=Nif5oz सभी याज्ञिक कर्मो मे यजमान सहित सभी का परिक्षण होना जरूरी है। यज्ञ की पवित्रता हेतु, अधिकार हेतु, सफलता हेतु, देवो की प्रीति हेतु जरूरी है।  पौ राणिक/वैदिक यज्ञादि कर्मो मे अधिक संख्या मे बिना प्राथमिक परिक्षण के ब्राह्मणो का वरण नहि करना चाहिए अन्यथा त्रुटि के कारण यज्ञकर्म हेतु सिद्ध नहि होता। वैदिक कर्म मे तो अधिक कुलिन ब्राह्मणो की आवश्यकता रहती है। इस अयाज्यायाजन ना हो इस हेतु यजमान का भी परिक्षण भी करना चाहिए *अयाज्यायाजन के प्रायश्चित्त* के बारे मे पुछो ही मत...... इस हेतु परिक्षण आवश्यक है।  अध्यात्मिक यज्ञादि कर्म मे जितनी अपरिक्षित ब्राह्मणो की संख्या अधिक , अनाधिकारो के संसर्ग के कारण कर्म मे उतने ही अधिक दोष की संभावना होती है,यज्ञ कर्म हेतु सिद्ध नहि होता है,यज्ञ का रक्षण हो इसलिए सावधान रहना जरूरी है,और अधिक विप्रो की वरणी करनी हो तो सबसे पहले...

अस्त्राणि सर्व शस्त्राणि

अभिषेकार्थं शतपथब्राह्मण मंत्र  अस्त्राणि सर्वशस्त्राणि राजानो वाहनानि च।  औषधानि च रत्नानि कालस्यावयवाश्च ये।।  अभिषेकार्थं शतपथब्राह्मण का यह मंत्र का हवन नहि करना चाहिए यह मंत्र अभिषेक के लिए है पूजित पुण्याहवाचन कलश के साथ पंच कलश मे सर्वौषधि,पंच पल्लव ,पंचधातुरत्नादि से सविधि  मे अभिमंत्रित जल से १०० दर्भ और पंचपल्लव या आम के पर्ण से द्वारा चार वेदो के विप्रो द्वारा यजमान पर अभिषेक करना चाहिए 

अपामार्जन स्तोत्र विधान

अपामार्जन स्तोत्र भगवान विष्णु के विभिन्न रूपों के साथ-साथ सुदर्शन चक्र को संबोधित एक प्रार्थना है जो हमारे शरीर और विभिन्न बीमारियों के साथ-साथ बुरी आत्माओं के साथ-साथ ग्रहों के कष्टों को दूर करने के लिए है। यह विष्णु धर्मोथारा पुराण में आता है। प्रार्थना की शुरुआत में संत धलाभ्य ऋषि अगस्त्य से सभी जीवित प्राणियों के लाभ के लिए, सभी बीमारियों और कष्टों से ठीक होने की विधि के लिए अनुरोध करते हैं। ऋषि अगस्त्य तब उन्हें यह महान प्रार्थना सिखाते हैं। इस स्तोत्र का संस्कृत पाठ परिचय और भाष्य के साथ यहाँ उपलब्ध है मैन विष्णु धर्मोथारा पुराण से अपामार्जन कवचम का हाल ही में मेरे द्वारा संकलन मेरे ब्लोग पर पाया जा सकता है। यह कवच कवच देने के अतिरिक्त साधना के लिए अपमार्जन मन्त्र भी प्रदान करता है।] अपामार्जन स्तोत्र भगवान् विष्णु का स्तोत्र है जिसका प्रयोग विषरोगादि के निवारण के लिए किया जाता है। इस स्तोत्र के नित्य गायन या पाठन से सभी प्रकार के रोग शरीर से दूर रहते हैं, तथा इसका प्रयोग रोगी व्यक्ति पर १०० दर्भ शास्त्रोक्त विधान से प्राप्त किए हुए १०० दर्भो से पूजित अभिमंत्रित जल से ४ वेदो के ...