विधान की शास्त्रीयता

अत्र माधवाचार्य:-'यो विप्र: शूद्रदक्षिणामादाय तदीयं हविः शान्तिपुष्ट्यादिसिद्धये वैदिकैर्मन्त्रैर्जुहोति तस्य विप्रस्यैव दोषः #शुद्रस्तु_होमफलं_लभेतैवेति_व्याचचक्षे '॥

माधवाचार्यका यह कथन है कि, जो ब्राह्मण शू्द्र की दक्षिणा लेकर शूद्रकी हविको शान्तिपुष्टि आदिके निमित्त वेदके मन्त्रोंसे होमता है उस #ब्राह्मणको ही वेदनिषेध विधि का दोष होता है,


#यथेच्छसि_तथा_कुरु ।। 

भगवान् कहते है - हे अर्जुन मैने तुम्हे सब यथार्थं सत्य बता दिया अब तुमे जो इच्छा करे सो करो ।। क्युकि कर्म फल तो तुम कोहि भोगना है।।

तुम कर्म करने में स्वतन्त्रः हो कर्म फल मे नहीं। हम सबके पास सीमित समय है धर्म/अधर्म का निर्णय करके सत्कर्म का अनुगमन करना चाहिए। 

कर्म का थप्पड़ इतना भारी और भयंकर होता हैं कि हमारा जमा हुआ पुण्य कब खत्म हो जाये पता भी नहीं चलता । 

पुण्य ख़त्म होने पर समर्थ राजा को भी भीख मांगनी पड़ती हैं । इसलिए कभी किसी के साथ छल कपट करके, किसी की आत्मा को दुःखी ना करें।

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