मंत्र जप निषेध
मंत्र तारक भी है, मंत्र मारक भी है।
ईश्वर उवाच -
पुस्तके लिखितान्मन्त्रानवलोक्य जपेत्तु यः।
स जीवन्नेव चाण्डालो मृतः श्वानो भविष्यति॥
दीक्षामार्गं विना मन्त्रं शैवं शाक्तञ्च वैष्णवम्।
यो जपेत्तं दहत्याशु देवता च जुगुप्सति॥
दीक्षाविधिं विना मन्त्रं यो जपेत्कोटिकोटयः।
न स सिद्धिमवाप्नोति सिन्धुसैकतवर्षवत्॥
पुस्तक लिखित मन्त्र को देखकर जो जप करता है वह जीवन में चाण्डाल होता है। मरने पर कुत्ता योनि में जन्म लेता है। विधिवत् दीक्षा लिये बिना जो साधक शैव, शाक्त या वैष्णव मन्त्रों का जप करता है उसे देवता दग्ध कर देते हैं और वह देवता की दृष्टि में जुगुप्सित एवं घृणित हो जाता है। विधिवत् दीक्षा ग्रहण के बिना जो साधक मन्त्र जप करता है उसे करोड़ो-करोड़ो मन्त्र जप के बाद भी सागर के बालू-कणों की संख्या के बराबर भी वर्षों तक सिद्धि नहीं मिलती। इसलिये सभी प्रयत्नों से कुलगुरु/ब्राह्मण के मुख से उपदेश-क्रम से मन्त्र की दीक्षा अवश्य लेना चाहिए।
जय शिवशंकर
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