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Showing posts from September, 2023

चांडाल की उत्पत्ति कैसे होती है?

 चारोयुगो मे विशेषतम कलियुग मे ब्राह्मणी स्त्री से अन्य वर्णों के लड़को को स्वप्न में भी विवाह नहीं करना चाहिए । क्योंकि ब्राह्मणी स्त्री अन्य वर्णों के लिए माता समान होती है। माता समान नारी से कदापि विवाह नही होता। 👉 पटेल, कम्मा, रेड्डी, कापू, गौड़ा, नायर, जाट,मराठा, गुज्जर, यादव इत्यादि शुद्ध शूद्र जातिओ से #ब्राह्मणी_कन्या_को_विवाह नही करना चाहिए ना ब्राह्मण लडको को शूद्र जातियो से विवाह करके अपनी #जातिभ्रंशकरण करके अधर्म करना चाहिए 👉 क्युकी गीताजी मे भगवान ने कहा है..  #दोषैरेतैः_कुलघ्नानां_वर्णसङ्करकारकैः। #उत्साद्यन्ते_जातिधर्माः_कुलधर्माश्च_शाश्वताः #143  अपने पूर्वजो ने जो जाति का संरक्षण किया ये पशुवत कामुकता की चाहना मे , इन वर्णसंकर पैदा करनेवाले दोषोंसे कुलघातियों के सदा से चलते आये कुलधर्म और जातिधर्म नष्ट हो जाते हैं। इससे बडा अधर्म क्या हो सकता है ? कलियुग मे #प्रतिलोम विवाह सर्वथा निन्दित है। निकृष्ट विवाहो से बडे कुल भी हीन कुल मे परिणत होते है उन्हे स्वयं श्रौतस्मार्त कर्मो का अधिकार नही रहता है। #शूद्रैव_भार्या_शूद्रस्य_सा_च_स्वा_च_विशःस्मृते। #ते_च_स...

कुत्ते की योनि मे जाता है

मंत्र तारक भी है, मंत्र मारक भी है। पुस्तक लिखित मन्त्र को देखकर जो जप करता है वह जीवन में चाण्डाल होता है । मरने पर कुत्ता योनि में जन्म लेता है । विधिवत् दीक्षा लिये बिना जो साधक शैव, शाक्त या वैष्णव मन्त्रों का जप करता है उसे देवता दग्ध कर देते हैं और वह देवता की दृष्टि में जुगुप्सित एवं घृणित हो जाता है । विधिवत् दीक्षा ग्रहण के बिना जो साधक मन्त्र जप करता है उसे करोड़ो-करोड़ो मन्त्र जप के बाद भी सागर के  बालू-कणों की संख्या के बराबर भी वर्षों तक सिद्धि नहीं मिलती । इसलिये सभी प्रयत्नों से कुलगुरु के मुख से उपदेश-क्रम से मन्त्र की दीक्षा अवश्य लेना चाहिए। ईश्वर उवाच- पुस्तके लिखितान्मन्त्रानवलोक्य जपेत्तु यः । स जीवन्नेव चाण्डालो मृतः श्वानो भविष्यति॥३ दीक्षामार्गं विना मन्त्रं शैवं शाक्तञ्च वैष्णवम्। यो जपेत्तं दहत्याशु देवता च जुगुप्सति॥४ दीक्षाविधिं विना मन्त्रं यो जपेत्कोटिकोटयः। न स सिद्धिमवाप्नोति सिन्धुसैकतवर्षवत् ॥५ तत्मात्सर्वप्रयत्नेन दीक्षां कुलगुरोर्मुखात् । उपदेशक्रमेणैव मन्त्रसंग्रहणं चरेत् ॥६ - इतिश्रीसांख्यायनतन्त्रे द्वितीय पटले

इश्वर के पास कौन जा सकता है

 समस्त संसार का संचालन करने वाली शक्ति जिसे हम इश्वर कहते हैं जो उन्हें नहीं मानता वो कभी मृत्यु के बाद इश्वर के पास नहीं जाता लेकिन नरक में जाता है। इश्वर के पास केवल अपने धर्म को मानने वाला अपने मूल वैदिक धर्म का पालन करने वाला ही जा सकता है। पं धवलकुमार शास्त्री नारायण

दर्भामवस्या

 #कुशोत्पाटनम्— *#कुशशब्दव्याख्या*- कशः/कुशम्, क्ली /पुं, (कु पापं श्यति नाशयति । कु + शो + डः । यद्वा कौ भूमौ शेते राजते शोभते इत्यर्थः ।)  *#श्रेष्ठकुशाके_लक्षण* पुष्ट, हरित ,गायके कान के बराबर तथा बिना टूटी फटी कुशा सर्वोत्तम मानी गई है- *सपिञ्जलाश्च हरिताः पुष्टाः स्निग्धाःसमाहिताः।*  *गोकर्णमात्राश्च कुशाः सकृच्छिन्नाः समूलकाः।।* *गोकर्णमात्रा विस्तृताङ्गुष्ठानामिकापरिमिताः।।*                                 (विष्णुः) *यद्यपि कुश और दर्भमें कोई अंतर विशेष नहीं है फिर भी विद्वानोंने दोनों की अलग-अलग परिभाषाएं की हैं* - 1. *अप्रसूताः स्मृतादर्भाः प्रसूतास्तु कुशाः स्मृताः।* *समूलाः कुतपाः प्रोक्ताश्छिन्नाग्रास्तृणसंज्ञताः।।*                        (हेमाद्रौ कौशिकेनोक्तम्)  *#अप्रसूता=असंजातप्रसवाः_अपुष्पिता इत्यर्थः।।* #अर्थ - जब तक पुष्प (बाल)नहीं निकलती तब तक उसे *#दर्भ* कहते हैं । पुष्पित होने पर या गर्भित होने पर *#कुश* कह...