दर्भामवस्या

 #कुशोत्पाटनम्—


*#कुशशब्दव्याख्या*-

कशः/कुशम्, क्ली /पुं, (कु पापं श्यति नाशयति । कु + शो + डः । यद्वा कौ भूमौ शेते राजते शोभते इत्यर्थः ।) 


*#श्रेष्ठकुशाके_लक्षण*


पुष्ट, हरित ,गायके कान के बराबर तथा बिना टूटी फटी कुशा सर्वोत्तम मानी गई है-


*सपिञ्जलाश्च हरिताः पुष्टाः स्निग्धाःसमाहिताः।*

 *गोकर्णमात्राश्च कुशाः सकृच्छिन्नाः समूलकाः।।*


*गोकर्णमात्रा विस्तृताङ्गुष्ठानामिकापरिमिताः।।*

                                (विष्णुः)


*यद्यपि कुश और दर्भमें कोई अंतर विशेष नहीं है फिर भी विद्वानोंने दोनों की अलग-अलग परिभाषाएं की हैं* -


1. *अप्रसूताः स्मृतादर्भाः प्रसूतास्तु कुशाः स्मृताः।*

*समूलाः कुतपाः प्रोक्ताश्छिन्नाग्रास्तृणसंज्ञताः।।*

                       (हेमाद्रौ कौशिकेनोक्तम्) 

*#अप्रसूता=असंजातप्रसवाः_अपुष्पिता इत्यर्थः।।*


#अर्थ - जब तक पुष्प (बाल)नहीं निकलती तब तक उसे *#दर्भ* कहते हैं । पुष्पित होने पर या गर्भित होने पर *#कुश* कहलाता है। जड़ सहितको  *#कुतप* कहते हैं। तथा अग्रभाग तोड़ देने पर उसे *#तृण* कहा जाता है।


2. *प्रादेशमात्रं दर्भः स्यात् द्विगुणं कुशमुच्यते।*


दूसरे आचार्यके मतमें प्रादेश मात्र (10 या 12 अंगुल) तक का *#दर्भ* कहलाता है तथा एक हाथ के बराबर वालेको *#कुश*  कहते हैं। 


3. *समूलस्तु भवेद्दर्भः पितॄणां श्राद्धकर्मणि।*

                                        (यमः)


*#कुशोंकेभेद*-


कुश ,काश ,शर( सरकण्डा मूज) ,दूर्वा ,यव ,गेहूँ, धान, समा, बल्वज,कमल, उशीर, कुंदक, सुवर्ण, चाँदी तथा ताँबा ये सभी दर्भ कहे गये हैं


1. *कुशाः काशाः शरा दूर्वा यवगोधूमबल्वजाः।*

*सुवर्णं रजतं ताम्रं दश दर्भाः प्रकीर्तिताः।।*


2. *कुशा: काशा यवा दूर्वा उशीराच्छ सकुन्दका:।*

*गोधूमा व्रीहयो मौञ्जा दश दर्भा: सबल्वजा:॥*

                                  (धर्मसिन्धौ) 


3. *कुशा: काशास्तथा दूर्वा यवपत्राणि व्रीहय:।*

*बल्वजा: पुण्डरीकाश्च कुशा: सप्त प्रकीर्त्तिता:।।*

                       (पद्मपुराण सृ.४६/३४)


4. *काशाः कुशाः वल्वजाश्च तथा ये तीक्ष्णशूककाः।*

*मौञ्जलाः शाद्वलाश्चैव षड्दर्भाः परिकीर्तिताः।।*

                               (ब्रह्मपुराण)


5. *पितृतीर्थेन देयाः स्युर्दूर्व्वा श्यामाक एव च।* 

*काशाः कुशा बल्वजाश्च तथान्ये तीक्ष्णरोमशाः।*

*मौञ्जाश्च शाद्वलाश्चैव षड्दर्भाः परिकीर्त्तिताः।।*

 तीक्ष्णरोमशा इति वल्वजानां विशेषणं तेन तेषामलाभे।


*#कुशमें_त्रिदेवोंका_निवास_है*


*दर्भमूले वसेद्ब्रह्मा मध्यदेवो जनार्दनः।*

*दर्भाग्रे तु महादेवस्तस्माद्दर्भेन मार्जयेत् ॥*

दर्भके मूलभागमें ब्रह्माजी, दर्भके मध्यमें विष्णुका , दर्भके अग्रभागमें उमानाथ महादेवजीका वास है। 


*#कुशाओंके_न_मिलनेपर*-


1. *कुशाः काशाःशरो गुन्द्रो यवा दूर्वाऽथ बल्वजाः।*  *गोकेशमुञ्जकुन्दाश्च पूर्वाभावे परः परः।।*

                           (अपरार्के सुमन्तुः)


2. *कुशाभावे तु काशाः स्युः काशाः कुशसमाः स्मृताः।* *काशाभावे ग्रहीतव्या अन्ये दर्भा यथोचिताः।।*

 *दर्भाभावे स्वर्ण्णरूप्यताम्रैः कर्म्मक्रियाः सदा।* 


3. *श्राद्धे वर्ज्यानि प्रयत्नेन ह्यनूपाः सगवेधुकाः।*

*पुनश्च दूर्वाद्याः कुशाभावे प्रतिनिधित्वेनोक्ताः।।*


*#सोनेके_पवित्रककी_महिमा*-


*अन्यानि च पवित्राणि कुशदूर्वात्मकानि च।*

*हेमात्मक-पवित्रस्य ह्येकां नार्हन्ति वै कलाम्।।*


*#पवित्रकका_लक्षण*-


1. *अनन्तर्गर्भिणं साग्रङ्कौशं द्विदलमेव च।* 

*प्रादेशमात्रं विज्ञेयं पवित्रं यत्र कुत्रिचित्।।*

                            (हारीतः)


ब्राह्मण की पवित्री चार कुशोंकी, क्षत्रिय की तीन की, वैश्य की दो की एवं शूद्रोंकी एक कुशाकी पवित्री होनी चाहिए-


2. *पवित्रं ब्राह्मणस्यैव चतुर्भिर्दर्भपिञ्जलैः।*

*एकैकं न्यूनमुद्दिष्टं वर्णेवर्णे यथाक्रमम्।।*

                        ( स्मृत्यर्थसारे)

अथवा सभी वर्णों के लिए 2--2 कुशोंकी पवित्री हो-


3. *सर्वेषां वा भवेद्वाभ्यां पवित्रं ग्रथितं नवम्।*

                                    (रत्नावल्याम्)


4. *समूलाग्रौ विगर्भौ तु कुशौ द्वौ दक्षिणे करे।*

*सव्येचैव तथा त्रीन्वै बिभृयात् सर्वकर्मसु।।*

                                ( बौधायनः)

जड़ और अग्रभाग से युक्त  मध्यमें स्थित शल्यसेरहित  दो कुशोंकी पवित्रीको दाएं हाथमें तथा तीन कुशोंकी पवित्रीको बाएं हाथमें सभी कर्मोंमें धारण करना चाहिए , यह मत सर्वमान्य है।


अथवा दोनों हाथों में दो दो कुशोंकी पवित्री धारण करें।

5. *हस्तयोरुभयोर्द्वौद्वावासनेऽपि तथैव च।*


 *#पवित्री_अनामिकाके_मध्यपर्वमें_या_मूलमें_धारणकरें* -


1 *द्वयोस्तु पर्वणोर्मध्ये पवित्रं धारयेद्बुधः।*

*अनामिकाधृता दर्भाह्येकानामिकयापि वा।*

*द्वाभ्यामनामिकाभ्यां तु धार्ये दर्भपवित्रके।।*

                      (हेमाद्रौ स्कान्दे)


2 *अनामिकामूलदेशे पवित्रं धारयेद्विजः।*

     (अत्रिस्मृति आह्निकसूत्रावल्याम्)


*#पवित्रीकी_आवश्यकता*- 


जप, होम ,दान, स्वाध्याय  श्राद्ध आदि कर्मोंमें कुशकी पवित्री या स्वर्ण अथवा चांदी की पवित्री को अवश्य धारण करें ,रिक्त हाथोंसे कोई भी शुभ कर्म नहीं करना चाहिए-


1. *अशून्यं करं न कुर्यात् सुवर्णरजतकुशैः।*

*जपे होमे तथा दाने स्वाध्याये पितृ कर्मणिः।*


2. *स्नाने होमेतथा दाने स्वाध्याये पितृतर्पणे।*

 *सपवित्रौ सदर्भौ वा करौकुर्व्वीत नान्यथा।!*

 *सर्वेषां वा भवेद्द्वाभ्यां पवित्रं ग्रथितं न वा।।*


3. *पूजाकाले सर्व्वदैवे कुशहस्तो भवेच्छुचिः।*

*कुशेनरहिता पूजा विफला कथिता मया।।*


4. *पवित्राः परमादर्भा दर्भहीना वृथाक्रियाः।*


*#वर्ज्यकुशा:*-


1. *चितौ दर्भाः पथि दर्भाः ये दर्भा यज्ञभूमिषु।* 

*स्तरणासनपिण्डेषु षड्दर्भान् परिवर्जयेत्।।*

                               (हारीतः)


2. *पिण्डार्थं ये स्तृता दर्भा यैः कृतंपिवृतर्पणम्।*

 *मूत्रोच्छिष्टप्रलेपे तु त्यागस्तेषां विधीयते।।*

                       (छन्दोगपरिशिष्टम्)


3. *धृतैः कृते च विण्मूत्रे त्यागस्तेषां विधीयते।*

*नीवीमध्ये च ये दर्भा ब्रह्मसूत्रे च ये धृताः।।*

*पवित्रांस्तान् विजानीयाद्घथा कायस्तथा कुशाः।।*

 

4. *ब्रह्मयज्ञे च ये दर्भा ये दर्भाः पितृतर्पणे।* *हतामूत्रपुरीषाभ्यान्तेषां व्यागोयय  विधीयते।।*

                              (हेमाद्रौ)


*#पवित्रीधारण_करके_आचमन_करनेसे_पवित्री_उच्छिष्ट_नहीं_होती ,परंतु भोजन करने पर पवित्री उच्छिष्ट हो जाती है, तब उसका त्याग कर देना चाहिए*-


1. *सपवित्रः सदर्भो वा कर्माङ्गाचमनं चरेत्।*

*नोच्छिष्टं तत् सदर्भं च भुक्तोच्छिष्टं तु वर्जयेत्।।*


2. *सपवित्रेण हस्तेन कुर्यादाचमनक्रियाम्।*

*नोच्छिष्टं तत्पवित्रं तु भुक्तोच्छिष्टं तु वर्जयेत्।।*

     (श्राद्धचिंतामणिमें मार्कंडेयजीका वजन)


3. *आचम्य प्रयतो नित्यं पवित्रेण द्विजोत्तमः।*

*नोच्छिष्टन्तु भवेत्तत्र भुक्तशेषं विवर्जयेत्।।*


*#दूर्वा_और_काशकीपवित्री_पहनकर_आचमन_नहीं_करना_चाहिए* -


काशादौ विशेषमाह शङ्खः-

*काशहस्तस्तु नाचामेत्कदाचिद्विधिशङ्कया।* 

*प्रायश्चित्तेन युज्येत दूर्वाहस्तस्तथैव च।।*


*#कुशऔरकाशसे_दन्तधावनभी_नहीं_करें* -


कुश, काश, पलाश और अशोक वृक्ष की दातुन करनेसे व्यक्ति चांडाल हो जाता है और वह चांडालत्त्व को तब तक प्राप्त रहता है जब तक गंगाजीके दर्शन नहीं कर लेता-


*कुशं कासं पलासं च शिशपं यस्तु भक्षयेत्।*

*तावत् भवति चाण्डालो यावद्गंगां न पश्यति।।*

                     (आचारमयूखे गर्गः)


*#सधवास्त्रीको_कुश_और_तिलका_प्रयोग_नहीं_करना_चाहिए*-


सधवायास्तद्धारणनिषेधमाह ब्राह्मणसर्व्वस्वे -


*न स्पृशेत्तिलदर्भांश्च सधवा तु कथञ्चन।*

 


*#कुशोत्पाटनका_मंत्र*


दर्भग्रहणेमन्त्रमाहशङ्खः-

*विरिञ्चिना सहोत्पन्न! परमेष्ठिनिसर्गज!।*

 *नुद सर्वाणि पापानि दर्भ! स्वस्तिकरोभव।।*

            (धर्मसिन्धौ स्मृत्यर्थसारे च) 


*हुम्फट्कारेण मन्त्रेण सकृच्छित्त्वा समुद्धरेत्।*


*#कुशोत्पाटनका_समय_मुख्यप्रातःकाल*


अत्र विशेषः निर्ण्णयसिन्धौपृथ्वीचन्द्रोदये तद्ग्रहणकालमाह दक्षः-


*समित्पुष्पकुशादीनां द्वितीयः परिकीर्तितः।*


( अष्टधा विभक्तदिनस्य द्वितीयोभाग इत्यर्थः।)


*#पितरोंकेलिए_दक्षिणाभिमुख_कुशा_उखाड़नेका_विशेषनियम*-


*प्रेतक्रियार्थं पित्रर्थमभिचारार्थमेव च।* *दक्षिणाभिमुखश्छिन्द्यात् प्राचीनावीतिकोद्विजः।।*


 

*#अन्यअमावस्याओंमें उखाड़ा गया कुश 1 महीने तक तथा भाद्रपदकी अमावस्याको उत्पाटित कुश 1 वर्षतक पवित्र रहता है।*-


*मासि मास्युत्द्धृता दर्भा मासि मास्येव चोदिताः।*

                         ( षड्त्रिंशन्मते)


*मासे मासे त्वमावास्यां दर्मो ग्राह्यो नवः स्मृतः।*


भाद्रामावास्यागृहीतदर्भस्यायातयामतामाह हेमा॰श्रा॰ ख॰ हारीतः-

*मासे नभस्यमावास्या तस्या दर्भोच्चयो मतः।*

*अयातयामास्ते दर्भां विनियोज्याःपुनः पुनः।।*


*#कुशब्रह्मा_और_विष्टर_बनानेका_नियम*


*पंचाशत् कुशोद्भवेत्ब्रह्मा तदर्धेन तु विष्टर।*

 *ऊर्द्ध्वकेशो भवेद्ब्रह्मा लम्बकेशस्तु विष्टरः।*

*दक्षिणावर्त्तको ब्रह्मा वामावर्त्तस्तु विष्टरः।।*

यथा संभवं वा। (कुशकंडिका पद्धतौ) 


*#नम्रनिवेदन* -


यद्यपि शास्त्रोंमें किसी एक विषयपर ही बहुत सी विधिनिषेधात्मक उपलब्ध होती हैं, उनमेंसे कुछ जिनको मैंने गुरुजीसे पढ़कर धारण कर पाया था ,तथा जिनको वर्तमानमें सर्वोपयोगी समझा उन शास्त्रवचनोंको समस्त ब्राह्मणोंके हितार्थ लिखा है,आशा है कि विद्वज्जन त्रुटियोंके लिए अवश्य क्षमाकरेंगे। इस लेखको पूज्य परम पवित्र श्रीगुरुचरणोंमें समर्पित करता हूं ,इससे मेरे परम प्रिय प्यारे प्रभु श्रीराम प्रसन्न हों। 

नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव!!!

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