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Showing posts from November, 2023

निषिद्ध विवाह

  प्रश्न --> किसी ब्राह्मणी का क्षत्रिय वैश्य शूद्र के साथ विवाह हो सकता है ❓ #उत्तर --> ना नही हो सकता  शास्त्रो मे एसे विवाहो की कोइ भी व्यवस्था नही है शास्त्रो मे इसे पाप कहा गया है !! ब्राह्मण सभी वर्णो का गुरु है इसलिए ब्राह्मणी गुरुमाता होती है और ध्यान रहे माता के साथ कभी विवाह नही होता... कलियुग मे अन्य जातियों मे, अनुलोम , प्रतिलोम विवाह पूर्णतया निषिद्ध है केवल पाखंड है , व्यभिचार होने के कारण षोडश संस्कार के अंतर्गत भी नही है, इसमे ना तो विवाह करने वाले - विवाह समारोह मे जाने वाले का कल्याण है , और मनघड़ंत विधान करने वाले या करवाने की व्यवस्था भी करवाए वो श्रेष्ठ पंडित तो हो ही नही सकता। इसलिए अपने वंश का कल्याण चाहने वालों को एसे समारोह मे ही जाना चाहिए जिसका विवाह संस्कार शास्त्र संमत हो अपनी जाति मे ही हो अन्यथा इन सभी का त्याग करना ही एक अंतिम रास्ता है एसे स्वच्छंदीओ का प्रायश्चित करना भी निरर्थक है क्योंकि प्रायश्चित भी उसीका होता है जो पापकर्म मे लिप्त ना रहे उससे अपने को अपने वंश की कुलीनता बचाए रखे शुद्ध रखे और अपना जीवन समाप्त करे जानते हुए भी पापकर्...

शास्त्रो मे स्त्रियों की निन्दा? 🙄

 शास्त्रों में स्त्रियों की निन्दा स्त्रियाँ केवल भोगसामग्री या बच्चा पैदा करने का यन्त्र ही नहीं, अपितु, वे प्रत्यक्ष लक्ष्मी है। उनके सतीत्व की विशेषता से वेद-शास्त्र पुराणों के अमित पृष्ठ रञ्जित हैं। पुरुष के चरित्र भ्रष्ट होने पर वहाँ उन दुष्परिणामों का भोक्ता होता है, स्त्री का चरित्र भ्रष्ट होने से मातृ पितृकुल दोनों ही कलंकित और अपमानित होते हैं। स्त्रियां सदाचारिणी एवं पतिव्रता रहकर पतिकुल तथा पितृकुल दोनों का कल्याण कर सकतीं है। सती नारी साक्षात् गङ्गा किं वा उमामहेश्वरस्वरूप मानी गयी हैं— न गङ्गया तया भेदो या नारी पतिदेवता । उमामहेश्वरः साक्षात् तस्मात्तां पूजयेद् बुधः । । स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु । त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् । । इत्यादि भावनाओं के सामने क्षुद्र विषयेन्द्रिय सम्प्रयोगज सुखों का कितना मूल्य रह जाता है? स्त्रियों के इन्हीं उदात्त भावों के रक्षार्थ धर्मशास्त्रों के कठोर नियम है। यद्यपि तर्क की दृष्टि से कहा जा सकता है कि ये ही नियम पुरुषों के लिए भी उचित होने चाहिए, तथापि धर्मशास्त्रों ने शरीर, इन्द्रिय, स्वभाव, शक्ति, प्रकृति की विलक्षणता को देखते हुए इनके...

परधर्मो भयावह

 एकबार काशीजी में एक ब्राह्मणदेवता ने पूज्य श्रीकरपात्री स्वामीजी को प्रणाम करके पुछा - स्वामीजी ! मैं सन्ध्या-यज्ञादि कर्म नहीं करता हूँ बस श्रीरामनाम का जप-कीर्तन एवं रामचरितमानस का मासपारायण पाठ कर लेता हूँ। तो क्या इससे मेरा कल्याण हो जायेगा ?  इसपर पूज्य श्रीकरपात्री स्वामीजी ने कहा - यदी आप शुद्रकुल में उत्पन्न हुए होते तो निश्चित आपका कल्याण हो गया होता पर दुर्भाग्य से आपका जन्म ब्राह्मणकुल में हुआ है अतः आपके लिए सन्ध्या-यज्ञादि वैदिक कर्म करना अत्यंत आवश्यक है।  अब आप विचार करें, क्या करपात्री स्वामीजी भगवन्नाम विरोधी है ? क्या उनको नहीं ज्ञात था कि "राम नाम अवलम्बन एकु" का सिद्धांत कलिकाल में मुख्य है?  अरे भाई ! जितना रामनाम प्रेमी करपात्री स्वामीजी हुए उतना शायद ही कोई और हुआ होगा। स्वामीजी श्वास-प्रश्वास में सतत रामनाम का जप करते थे, इतना की एकबार जब वे अस्वस्थ होकर कुछ समय तक मूर्छित रहें तो जगने पर उन्हें बहुत पश्चाताप हुआ कि उनका रामनाम का जप स्थगित हो गया था। तो विचार कीजिए की स्वामीजी ने उस ब्राह्मण को ऐसा क्यों कहा?  ~~आईये कुछ बातों पर विचार ...

शय्या कैसी हो ?

 शय्या (खाट)कैसी हो?शयन का शास्त्रीय विधान - *84- अंगुल लंबी*  *60- अंगुल चौड़ी* *01- हाथ ऊंची (भूमिसे)*  सभीके लिए शयनकरने के लिए ऐसी शय्याका ही विधान है।इससे अधिक बड़ी होने पर दरिद्रता देने वाली तथा इससे न्यून शय्या सुखका क्षय करने वाली होती है। *#प्रमाण*- *1 #चतुरशीतिपर्वाणि_दैर्घ्येण_परिकल्पयेत्।* *#षष्ट्यंगुलानि_विस्तारं_मंचकं_हस्तसंमितम्।।* *#एवं_शय्या_विधाव्या_सर्वेषां_शयनोचिता।* *#मानाधिक्ये_दरिद्रः_स्यान्मानहीने_सुखक्षयः।।*                     ( शिल्पशास्त्रे) *2 सर्व्वरत्नमलङ्कारं पट्टं कार्य्यं द्बिहस्तकम्।* *हस्तविस्तार उच्छ्राये दशाङ्गुल्यः सुशोभनम्।।* *स्नानाख्यं सार्द्धहस्तन्तु पट्टं वृत्तासनान्वितम् ।* *शय्याख्यं द्विगुणा दैर्घ्याद्धनुर्मानं सपीठकम् ॥*                        (#देवीपुराणे ) *सुखशय्यासनं सेव्यं निद्रापुष्टिधृतिप्रदम्।* *श्रमानिलहरं शस्तं विपरीतमतोऽन्यथा॥* *भूशय्यानिलपित्तघ्नी वृंहणी शुक्रवर्द्धिनी।*  *खट्वा तु वांतला प्रोक्ता प...