निषिद्ध विवाह
प्रश्न --> किसी ब्राह्मणी का क्षत्रिय वैश्य शूद्र के साथ विवाह हो सकता है ❓
#उत्तर --> ना नही हो सकता शास्त्रो मे एसे विवाहो की कोइ भी व्यवस्था नही है शास्त्रो मे इसे पाप कहा गया है !! ब्राह्मण सभी वर्णो का गुरु है इसलिए ब्राह्मणी गुरुमाता होती है और ध्यान रहे माता के साथ कभी विवाह नही होता...
कलियुग मे अन्य जातियों मे, अनुलोम , प्रतिलोम विवाह पूर्णतया निषिद्ध है केवल पाखंड है , व्यभिचार होने के कारण षोडश संस्कार के अंतर्गत भी नही है, इसमे ना तो विवाह करने वाले - विवाह समारोह मे जाने वाले का कल्याण है , और मनघड़ंत विधान करने वाले या करवाने की व्यवस्था भी करवाए वो श्रेष्ठ पंडित तो हो ही नही सकता।
इसलिए अपने वंश का कल्याण चाहने वालों को एसे समारोह मे ही जाना चाहिए जिसका विवाह संस्कार शास्त्र संमत हो अपनी जाति मे ही हो अन्यथा इन सभी का त्याग करना ही एक अंतिम रास्ता है एसे स्वच्छंदीओ का प्रायश्चित करना भी निरर्थक है क्योंकि प्रायश्चित भी उसीका होता है जो पापकर्म मे लिप्त ना रहे उससे अपने को अपने वंश की कुलीनता बचाए रखे शुद्ध रखे और अपना जीवन समाप्त करे जानते हुए भी पापकर्म करने वालो को ना तो कोइ प्रायश्चित बताना चाहिए और ना ही इनके लिए प्रायश्चित करना चाहिए।
विवाह मूहुर्त के आरंभ के साथ जोर-शोर से असवर्ण विवाह भी होंगे और दुष्टात्माएं पाखंड - शोरबकोर के साथ गंदकी फैलाकर अपने साथ कुलवान विशुद्ध जाति
(ब्राह्मण -क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र) को भी भ्रष्ट करेंगे अपने वंश की कुलीनता - पवित्रता - शुद्धता हेतु धर्मपालन के लिए एसे समारोह मे सभी विशुद्ध जातियो को जाने से बचना चाहिए यही शास्त्र का निर्णय है।
एसे समारोह मे जाने वाली अधिकतम पापात्मा ही होती है एसे लोगो के आगे पीछे कोइ नही होता केवल पापाचार और अधर्म ही होता है इनके वंश मे कभी मंगल नही होता हंमेशा अमंगल ही होता है, इनके लिए पिता-पुत्र-भाइ-बहन-काका-काकी-फुआ-
फोइ-भतीजा-भांजा-भांजी कोइ भी आदर्श नही होता, नाही संस्कार , इनके भाग्य मे केवल पाप ही होता है ये सब नरकगामी ही है इनके चक्कर मे अपने धर्म को भ्रष्ट न करे! एसे समारोह मे इनका अनुगमन करने वालो के साथ सारे संबंध रिश्तेदारी खतम कर देनी चाहिए। क्योकि उनकी अर्थी भी उनके व्यभिचारी रिश्तेदार ही उठाएंगे वो ही अधर्मीओ के रिश्तेदार है, और अन्त्येष्टि कर्म (अंतिम संस्कार) मे भी केवल पाखंड और दंभ ही बचेगा परिणाम स्वरूप विधविध नरक की यातनाओं को ही प्राप्त करेंगे क्योंकि इस कर्मभूमि मे धर्म के नाम पर अधर्म ही किया है और परलोक मे केवल धर्म ही सहायक होता है पापरुपी अधर्म नहीं।
भगवान विष्णु भी अगर कहे तो हमे स्वीकार नही शास्त्र वचन से विपरित कोइ भी निर्णय इस धरातल पर स्वीकार्य नहीं है केवल शास्त्राज्ञा ही सर्वोपरि है।
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