शय्या कैसी हो ?
शय्या (खाट)कैसी हो?शयन का शास्त्रीय विधान -
*84- अंगुल लंबी*
*60- अंगुल चौड़ी*
*01- हाथ ऊंची (भूमिसे)*
सभीके लिए शयनकरने के लिए ऐसी शय्याका ही विधान है।इससे अधिक बड़ी होने पर दरिद्रता देने वाली तथा इससे न्यून शय्या सुखका क्षय करने वाली होती है।
*#प्रमाण*-
*1 #चतुरशीतिपर्वाणि_दैर्घ्येण_परिकल्पयेत्।*
*#षष्ट्यंगुलानि_विस्तारं_मंचकं_हस्तसंमितम्।।*
*#एवं_शय्या_विधाव्या_सर्वेषां_शयनोचिता।*
*#मानाधिक्ये_दरिद्रः_स्यान्मानहीने_सुखक्षयः।।*
( शिल्पशास्त्रे)
*2 सर्व्वरत्नमलङ्कारं पट्टं कार्य्यं द्बिहस्तकम्।*
*हस्तविस्तार उच्छ्राये दशाङ्गुल्यः सुशोभनम्।।*
*स्नानाख्यं सार्द्धहस्तन्तु पट्टं वृत्तासनान्वितम् ।*
*शय्याख्यं द्विगुणा दैर्घ्याद्धनुर्मानं सपीठकम् ॥*
(#देवीपुराणे )
*सुखशय्यासनं सेव्यं निद्रापुष्टिधृतिप्रदम्।* *श्रमानिलहरं शस्तं विपरीतमतोऽन्यथा॥*
*भूशय्यानिलपित्तघ्नी वृंहणी शुक्रवर्द्धिनी।*
*खट्वा तु वांतला प्रोक्ता पट्टो रूक्षोऽतिवातलः॥*
(#राजवल्लभे)
*#कृतपादादिशौचस्तु_भुक्त्वा_सायं_ततो_गृही।*
*#गच्छेच्छय्यामस्फुटितामपि_दारुमयीं_नृप॥*
*नाविशालां न वै भग्नां नासमां मलिनां न च।*
*न च जन्तुमयीं शय्यामधितिष्ठेदनास्तृताम्॥*
(#विष्णुपुराणे-3/11/111-112)
*#अर्थ*- हे राजन! तदनंतर गृहस्थ पुरुष सायंकालका भोजन करके तथा हाथ-पांव धोकर छिद्रादिहीन काष्ठमय शय्यापर लेट जाय।
जो काफी बड़ी न हो, टूटी हुई, ऊंची नीची, मलिन अथवा जिसमें जीव (खटमलादि) हों या जिस पर कुछ बिछा हुआ न हो उस शय्यापर न सोवे।
*#शयनसे_सम्बन्धित_नियम*-
गीले पैर करके नहीं सोना चाहिए तथा बिना पैर धोए भी न सोए अर्थात् पैर धोकरके फिर पहुंचकर फिर शयन करना चाहिए।
सदा पूर्व या दक्षिणकी तरफ सिर करके सोना चाहिए,
#पूर्वकी तरफ सिर करके सोनेसे— विद्या प्राप्त होती है ।
#दक्षिणकी तरफ सिर करके सोनेसे— धन तथा आयु की वृद्धि होती है।
#पश्चिमकी तरफ सिर करके सोनेसे— प्रबल चिंता होती है।
#उत्तरकी तरफ सिर करके सोने— से हानि तथा मृत्यु होती है अर्थात् आयु क्षीण होती है—
*#प्राक्शिर:#शयने_विद्याद्धनमायुश्च_दक्षिणे।*
*#पश्चिमे_प्रबला_चिन्ताहानिमृत्युरथोत्तरे।।*
(#भगवंतभास्कर_आचारमयूख)
अधोमुख होकर,
नग्न होकर,
दूसरे की शैया पर,
टूटी हुई खाट पर,
तथा जन शून्य घरमें
बांस या पलाशकी लकड़ीसे बनी खाटपर,
नीचेको सिर करके,
झूठे मुंह,
अंधेरेमें,
सिर पर पगड़ी बांधकर,
दोनों संध्याओंमें,
ब्राह्म मुहूर्तमें,
देव मंदिर या शमशानमें,
कभी नहीं सोना चाहिए—
*#अवाड़्मुखो_न_नग्नो_वा_न_च_भिन्नासने_क्वचित्।
*#न_भग्नायान्तु_खट्वायां_शून्यागारे_तथैव_च।।
( लघुव्याससंहिता- 2 / 88)
*#नान्धकारे_च_शयनं_भोजनं_नैव_कारयेत्।।
( पद्मपुराण_सृष्टिखंड- 51/124)
निद्राके समय मुखसे तांबूल
शैय्यासे स्त्री
ललाटसे तिलक
और सिरसे पुष्पमालाका
त्यागकर देना चाहिए—
*#निद्रासमयमासाद्य_ताम्बूलं_वदनात्त्यजेत्।*
*#पर्यङ्कात्प्रमदां_भालात्पुण्ड्रं_पुष्पाणि_मस्तकात्।।*
(#भगवंतभास्कर_आचारमयुख)
सोनेसे पूर्व दिन भरमें अपने द्वारा किए गए कृताकृतका चिंतन अवश्य करें।
अकृतके न करनेका निश्चय तथा खेद पूर्वक ईश्वरका चिंतन करें
कृतका दृढ़ता पूर्वक और करनेका निश्चय करें।
तथा भगवत् स्मरण, चिन्तन करते हुए शयन करना चाहिए।
साभार~ आचार्य राजेश राजौरिया वैदिक💐
#नमः_पार्वतीपतये_हर_हर_महादेव!
🚩 हर हर महादेव 🚩
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