Posts

Showing posts from January, 2024

विष्णुसूक्त

विष्णुसूक्त शंकर उवाच - प्रवक्ष्याम्यधुना देवी सूक्त श्री वैष्णवं शुभम् ।  यच्छ्रुत्वा सर्व पापेभ्यो मुक्तो भवति वै नरः ।। पार्वत्युवाच - देव दैव दयासिन्धो लोकानां मुक्तिदायक।  ममोपरि कृपा कृत्वा विष्णुसूक्तं ब्रूहि मे ॥ शंकर उवाच - नमो नमस्ते देवेश धृत्वा चक्रं सुदर्शनम् ।  प्राच्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः ॥  गदां कौमोदकीं धृत्वा पद्मनाभामितधुते ।  याम्यां रक्ष च मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः ॥  हलमादाय भो देव नमस्ते पुरुषोत्तम ।  प्रतीच्यां रक्ष मां विष्णो भवंत् शरणं गतः ॥ मृशलंच करे धृत्वा पुंडरीकाक्ष रक्ष मां। उत्तरस्यां जगन्नाथ त्वामहं शरणं गत:।।  खड्गमादाय चर्मापि ह्यस्त्रं शस्त्रं तथा हरे । नमस्ते रक्ष रक्षोघ्न एशान्यां शरणं गत:।। पांचजन्य महाशंख सन्नध्यायुध पंचकम् ।  प्रगुह्य रक्ष मां विष्णो आग्नेय्यां यज्ञसूकर ।।  चर्मसूर्यसमं धृत्वा खड्रगं चंद्रसमं तथा।  नैऋत्यां चैव मा रक्ष दिव्यमूर्ते च केसरिन् ॥  वैजयन्तीं च संगृह्य श्रीवत्सं कौस्तुभं मणिम् ।  वायव्यां रक्ष मां विष्णो हयग्रीव नमोस्तुते ॥  वैनते...

पुरूष सूक्त

 ।। पुरुषसूक्तम् ।। जिंतं ते पुंडरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन ||  नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुषपूर्वज ॥ १ ॥  देवानां दानवानां च सामान्यमधिदैवतम् ॥  सर्वदा चरणद्वन्द्वं व्रजामि शरणं तव ॥ २ ॥  एकस्त्वमसि लोकस्य स्रष्टा संहारकस्तथा ।  अव्यक्तश्वानुमंता च गुणमायासमादृतः॥ ३ ॥  संसारसागरं घोरमनन्तं क्लेशभाजनम् ।।  त्वामेवशरणं प्राप्य निस्तरन्ति मनीषिणः॥४॥  न ते रूपं न चाकारो नायुधानि न चास्पदम् ।।  तथापिपुरुषाकारो भक्तानांत्वं प्रकाशसे ॥५॥  नैवकिञ्चित् परोक्षं ते प्रत्यक्षोऽसि न कस्यचित् ।।  नव किश्चिदसाध्यं ते न च साध्योऽसि कस्यचित् ॥ ६ ॥  कार्याणां कारणं पूर्वं वचसां वाच्यमुत्तमम् ।।  योगिनांपरमा सिद्धिः परमं ते पदं विदुः ॥ ७॥  अहंभीतोऽस्मि देवेश संसारेऽस्मिन्भयावहे ।। त्राहि मां पुण्डरीकाक्ष न जाने परमंपदम्॥८॥  कालेष्वपि च सर्वेषु दिक्षु सर्वासु चाच्युत ।।  शरीरे च गतौ चापि वर्तते मे महद्भयम् ॥ ९ ॥  त्वत्पादकमलादन्यन्न मे जन्मान्तरेष्वपि । विज्ञानंयदिदंप्राप्य यदिदंज्ञानमर्जितम् ॥१०॥  जन्मान्तरेऽपि मे...

मंदिर शास्त्रीय विधि से हो अशास्त्रोक्त मंदिर की आवश्यकता नही

 #निर्माणाधीन (शिखर, कलश, ध्वजादि रहित) मंदिर में प्राणप्रतिष्ठा की अशास्त्रीयता-- सर्वत्र प्रसारित करें!! सावधान राजनैतिक हिंदू पोस्ट से दुर रहे। पोस्ट से पुर्व अज्ञानी हिंदु के लिए गीता मे भगवान श्रीकृष्ण का आदेश  अवश्य स्मरण करने योग्य है। 👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻 श्रीमद्भगवद्गीता  अध्याय १६ श्लोक २३ यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्।।16.23।। देवप्रासाद(मन्दिर) निर्माण के प्रमुख हेतु के विषय में बताते हुए कहा गया है कि देवप्रासाद के प्रत्येक अङ्ग और उपाङ्गो में देव और देवियों के विन्यास करके देवप्रतिष्ठा के समय उसका अभिषेक किया जाता है। इसलिए देवप्रासाद सर्वदेवमय बन जाता है।  देवप्रासाद को स्थाप्यदेवता/श्रीहरि का स्थूल विग्रह माना गया है। यथा- 'प्रासादो वासुदेवस्य मूर्तिरूपो निबोध मे॥'  'निश्श्चलत्वं च गर्भोऽस्या अधिष्ठाता तु केशवः। एवमेष हरिः साक्षात्प्रासादत्वेन संस्थितः॥' (आग्नेयमहापुराण ६१।१९,२६) 'प्रासादं देवदेवस्य प्रोच्यते तात्त्विकी तनुः। तत्त्वानि विन्यसेत्पीठे यथा तत्त्वाधिवासकः॥' (विश्वामित्रसंहिता १४।...

यज्ञ विषयक

  #यज्ञ_के_लिए_निर्मित_उपकरण_और_काष्ट_निर्णय।।  श्रौत-स्मार्त यज्ञों में विविध प्रयोजनों के लिये विभिन्न यज्ञ पात्रों की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार कुँड मंडप आदि को विधि पूर्वक निर्धारित माप के अनुसार बनाया जाता है, उसी प्रकार इन यज्ञ पात्रों को निश्चित वृक्षों के काष्ठ से, निर्धारित माप एवं आकार का बनाया जाता है। विधि पूर्वक बने यज्ञ पात्रों का होना यज्ञ की सफलता के लिये आवश्यक है। नीचे कुछ यज्ञ पात्रों का परिचय दिया जा रहा है। इनका उपयोग विभिन्न यज्ञों में, विभिन्न शाखाओं एवं सूत्र-ग्रन्थों के आधार पर दिया जाता है। 1.अन्तर्धानकट:—वारुण काष्ठ का आधा अंगुल मोटा, बारह अंगुल का अर्द्ध चन्द्राकार पात्र। गार्हपत्य कुण्ड के ऊपर पत्नी संयाज के समय देव पत्नियों को आढ़ करने के लिए इसका उपयोग होता है। 2. पशु-रशना:—तीन मुख वाली बारह हाथ की पशु बाँधने की रस्सी।। 3. मयूख:—गूलर का एक अंगुल मोटा, बारह अंगुल का वत्स-बन्धन के लिये शकु मयूख होता है| 4. वसा हवनी:—पाक भाण्ड स्थित स्नेह-वसा हवन करने का जूहू सदृश घाऊ का स्रुक। 5. वेद:—दर्शपूर्णमासादि में 50 कुशाओं से रचित वेणी सदृश कुशमुष्टि। 6....

वडवानल स्तोत्र यज्ञ

 #नानाविध_हनुमद्_यागाः(१-मारुतीयाग,२-पञ्चमुख-हनुमद्याग,३- सप्तमुख-हनुमद्याग, ४- एकादशमुख-हनुमद्याग,५- हनुमद् सहस्रनाम याग,६- वडवानल हनुमद्याग)~>  निष्काम-संकल्पः ~ देशकालौ संकीर्त्य  हनुमत् कृपा प्रेरणया अमुक हनुमद्यागाख्यं कर्म करिष्ये |  सकाम-संकल्पः - देशकालौ संकीर्त्य मम आत्मनः श्रृति स्मृति पुराणोक्त पुण्यफलावाप्तये हनुमत् कृपा प्रेरणया अमुक कार्य सिद्ध्यर्थं  अमुक हनुमान् प्रीतये अमुक हनुमद्यागाख्यं कर्म करिष्ये |  उभय-संकल्पः- देशकालौ संकीर्त्य मम आत्मनः श्रृति स्मृति पुराणोक्त पुण्यफलावाप्तये धर्मार्थकाममोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्ध्यर्थं ऐहिकामुष्मिक नानाविध चित्तशुद्धिद्वाराजात कामादि अरि षडर्ग कृत मूर्छा कुलस्य चित्त शुद्धिद्वारा सकलजनपद श्रेयसे च अस्मिन् राष्ट्रे सर्वविध धर्माभ्युदय सकलाधर्म विनाशाय श्रीरामचंद्र प्रसादात् सर्वत्र स्वधर्म परिपालनात् सनातन धर्म विकासाय अभ्युदय श्रेयसे च  हनुमत् प्रीत्यर्थं अमुक हनुमद्यागाख्यं कर्म करिष्ये |  तदङ्गत्वेन गणपति पूजनं,पुण्याहवाचनं(कर्मांग देवता हनुमतः प्रीयताम् ),मातृका पूजनं,नान्दीश्राद...

स्तोत्र यज्ञ निर्णय

 【चंडीपाठ में कवच अर्गला कीलक और कुंजिका स्तोत्र से हवन करें अन्यथा नही??】 यो मूर्ख: कवचं हुत्वा प्रतिवाचं नरेश्वरः । स्वदेह - पतनं तस्य नरकं च प्रपद्यते ।। अन्धकश्चैव महादैत्यो दुर्गाहोम-परायणः । कवचाहुति - प्रभावेण महेशेन निपातितः ।। कवच में पाहि, अवतु, रक्ष रक्ष, रक्षतु, पातु आदि शब्दों का प्रयोग हुआ रहता है। सप्तशती के चतुर्थ अध्याय के 4 मंत्र से इसी कारण होम नहीं होता है। #सिद्ध #कुंजिका स्तोत्र का होम न करने की आज्ञा स्वयं महादेव नें दी है __ इसका प्रथम कारण है की , कुंजिका देवी सिद्धियों की एकमात्र कुंजी है । ओर कुंजी का रक्षण किया जाता है आहूत नहीं किया जा सकता । यदि यदि कुंजी का ही लोप हो जाएगा तो सिद्धी के द्वार का खुलना असम्भव हो जाएगा । दूसरा कारण यह की सप्तशती में आता है की याचना स्तोत्र , कवच एवं कवच मन्त्रों की आहुति नहीं की जाती अन्यथा विनाश ही होता है । || अथ प्रमाण || #कवचं #वार्गलाचैव ,#कीलकोकुंजिकास्तथा । #स्वप्नेकुर्वन्नहोमं #च ,#जुहुयात्सर्वत्रनष्ट्यते: ।। भगवान शिव भैरव स्वरूप में स्थित होकर कहते हैं !  कवच , अर्गला , कीलक , तथा कुंजिका का होम स्वप्न में...