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Showing posts from February, 2024

भगवान शिव का गोत्र

 भगवान शिवका गोत्र क्या है ?  आजतक किसीको पता नहीं था की भगवान शिवका गोत्र कोनसा है ? लेकिन। विवाहके समय तो गोत्रोच्चारकी जरूरत पड़ती ही है। जब माता पार्वतीक साथ भगवानका विवाह हुआ तो नारदजीने भगवानका गोत्र बताया।  हिमवानने कहा तात ! महाभाग ! आप अपने गोत्रका नाम बतायें और अपने कुलका विशेषरूपसे परिचय दें। भगवान शङ्करके मुखारविन्दसे इस प्रश्नका  कोई उत्तर नहीं मिला। उस समय नारदजी बहुत हँसे और अपनी वीणा बजाने लगे। वह देख बुद्धिमान हिमवानने  उन्हें मना करते हुए कहा - 'प्रभो! आप वीणा न बजाइये। पर्वतके ऐसा कहनेपर नारदजी बोले – 'गिरिराज ! तुमने साक्षात् शिवजी से उनका गोत्र बतानेके लिये कहा है; परंतु इनका गोत्र और कुल तो 'नाद' ही है । भगवान शङ्कर न तो किसी कुलमें उत्पन्न हुए हैं और न इनका किसी विशेष कुलसे सम्बन्ध ही है। ये गोत्रों के भी परम गति हैं। महादेवजी नादमें प्रतिष्ठित हैं और नाद उनमें प्रतिष्ठित है। अतः भगवान शिव नादमय हैं और नादसे ही उपलब्ध होते हैं। परंतप ! यही भाव व्यक्त करनेके लिये मैंने इस समय वीणा बजायी है। इनके गोत्र और कुलका नाम ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं ज...

गर्भाधान विशेष

  #गर्भाधान_और_लग्नबल  गण्डान्तंत्रिविधं त्यजेन्निधनजन्मर्क्षे च मूलान्तकं। दास्रं पौष्णमयोपरागदिवसं पातं तथा वैधृतिम् ।। पित्रोः श्राद्धदिनं दिवा च परिधाद्याद्धं स्वपत्नीगमे ।  भान्युत्पातहतानि मृत्युभवनं जन्मक्षतः पापभम् ।। भद्राषष्ठी पर्वरिक्ताश्च संध्या भौमार्कार्कोनाद्यरात्रीश्चतस्रः ।  गर्भाधानं व्युत्तरेन्द्रर्कमैत्रब्राह्मस्वाती विष्णुवस्वम्बुपे सत् ॥ 👉 विविधं गण्डान्तं, निधनजन्मक्ष च मूलान्तकं दात्रं पौष्णं अथ उपराग- दिवसान् पातं तथा वैधृति, पित्रोः श्राद्धदिनं दिवा च परिचाद्यर्ध उत्पातहतानि भानि जन्मक्षेतः मृत्युभवनम् (तथा) पापभं (एतानि) स्वपत्नीगमे त्यजेत् । भद्राषष्ठीपर्व- रिक्ताः, च सन्ध्याओमार्कान्, चतस्रः जाद्यरात्रीः (स्वपत्नीगमे त्यजेत्), व्युत्तरेन्द्वर्क- मैव ब्राह्मस्वातीविष्णुवस्वम्बुषे गर्भाधानं सत् ।।  👉 रजोदर्शन से चार दिन बाद अपनी स्त्री के गमन में नक्षत्र गण्डान्त, तिथि गण्डान्त, लग्न गण्डान्त, जन्मनक्षत्र से सातवाँ नक्षत्र, जन्मनक्षत्र, मूल, भरणी, अश्विनी, रेवती, ग्रहण का दिन, व्यतीपात और वैश्तियोग, माता- पिता का श्राद्धदिन, परिषयोग ...

सूतिकागृह

 घर में सूतिकागृह निर्माण कैसे हो ?  ( यह लेख केवल शास्त्रानुरागी सज्जनो के लिये हैं कि जो घर पर ही आयुर्वेदीक अभक्ष्य- ओषधीय उपचारों के साथ बिना ऑपरेशन के प्रसूति करवाना चाहते हो )  घर के नैऋत्य कोने के कमरे में अथवा नैऋत्यकोण में सूतिका के लिये केवल काष्ठनिर्मित शैया हो , सूतिका गृह में अखंडदीप , मूशल, दण्ड, धूपदानी तथा जातकर्म संस्कार और षष्ठीमहोत्सव के लिये सर्वसामग्री सम्पन्न हो ।  सूतिका के लिये कमरे को दो भाग में बाँट दैना चाहिये क्योंकि सूतककालिक प्रसूतास्त्री के बारहहाथ के अन्तराल में आजानेपर संसर्गदोष के कारण किसी भी व्यक्ति को चैल स्नान करना आवश्यक हैं। यदि अज्ञान से इन्हें छू लेवे तो सचैलस्नान करके सूर्य का अवलोकन करना आवश्यक हैं और जानबूझ कर स्पर्श करे तो ८००० अपने अधिकृत गायत्रीमन्त्रजप भी करना होता हैं =>  "युगं युगद्वयं चैव                #त्रियुगं च चतुर्युगम्।  चाण्डाल सूतिकोदक्या                पतितानामधः क्रमात्।।  ततः सन्निधिमात्रेण    ...