सूतिकागृह

 घर में सूतिकागृह निर्माण कैसे हो ? 

( यह लेख केवल शास्त्रानुरागी सज्जनो के लिये हैं कि जो घर पर ही आयुर्वेदीक अभक्ष्य- ओषधीय उपचारों के साथ बिना ऑपरेशन के प्रसूति करवाना चाहते हो ) 


घर के नैऋत्य कोने के कमरे में अथवा नैऋत्यकोण में सूतिका के लिये केवल काष्ठनिर्मित शैया हो , सूतिका गृह में अखंडदीप , मूशल, दण्ड, धूपदानी तथा जातकर्म संस्कार और षष्ठीमहोत्सव के लिये सर्वसामग्री सम्पन्न हो । 


सूतिका के लिये कमरे को दो भाग में बाँट दैना चाहिये क्योंकि सूतककालिक प्रसूतास्त्री के बारहहाथ के अन्तराल में आजानेपर संसर्गदोष के कारण किसी भी व्यक्ति को चैल स्नान करना आवश्यक हैं। यदि अज्ञान से इन्हें छू लेवे तो सचैलस्नान करके सूर्य का अवलोकन करना आवश्यक हैं और जानबूझ कर स्पर्श करे तो ८००० अपने अधिकृत गायत्रीमन्त्रजप भी करना होता हैं => 

"युगं युगद्वयं चैव 

              #त्रियुगं च चतुर्युगम्। 

चाण्डाल सूतिकोदक्या 

              पतितानामधः क्रमात्।। 

ततः सन्निधिमात्रेण 

               सचैलं स्नानमाचरेत्। 

स्नात्वाऽवलोकयेत् सूर्यमज्ञानात्स्पृशते यदि।। ((पाराशरस्मृ०१२/५३-५४।।))"


इसका निवारण कैसे हो ? 

                  कमरे को दोभाग में ऐसे बाँटना चाहिये कि सूतिका की शैया का किसी पंक्तिभेद करनेवाली वस्तु से पङ्क्तिभेद हो जाय। बाँस से बनी चद्दर को खूंटी और रज्जू के सहारे बाँधकर कमरे को दो हिस्से में बाँट सकते हैं। अथवा तो शैया की सीमापूर्ण होते ही थोडी दूरी पर भस्म की लम्बी लकीर खींचे(लकीर को प्रतिदिन किसी के पास खिंचवानी चाहिये ) अथवा लम्बे दोतीन लकडी के दण्ड एकदूसरे से जूडे रहे इस तरह जमीनपर रख दे जिससे कमरा दो भाग में बँट जाय ====> 

"(#भस्मना_कृतमर्यादा 

             न तेषां संकरे भवेत्। 

अग्निना भस्मना चैव

              सलिलेन विशेषतः

द्वारेण #स्तम्भमार्गेण 

         षड्भिः पङ्क्तिर्विभिद्यते।।(कूर्मपुराण उ०खं० १६/३१-३२)"


शास्त्रोक्त विधि से उत्तम संतान प्राप्ति की विधा

एक आचार्य जी का अनुभव


आज बच्चे जन्मना ही अल्प प्राणशक्ति-प्रज्ञाशक्ति वाले, स्वाभाविक रूप से राजसी-तामसी और नास्तिकता आदि दोषों से युक्त क्यों हो रहे हैं? दुर्गुण ही अधिक क्यों आ रहे हैं?


कारण है संस्कारों का लोप। विवाह ठीक से होता नहीं है। मंत्र की बजाय कामवासना में लिप्त होकर गर्भ धारण करवाते हैं, उसके बाद भी जो दोष निवारण हेतु आवश्यक संस्कार होते हैं वे भी नहीं करवाते। ऐसे में सद्गुणों से युक्त उत्तम संतानें कहाँ से होंगी?


इन्हीं सब विकृतियों को दूर करके वैदिक धर्म के मुख्य स्तंभ― ब्राह्मणत्व की रक्षा करने में अपना जीवन लगा देने वालों में से एक हमारे आत्मीय पूजनीय आचार्य जी ने हाल ही में व्यवहारिक धरातल पर शास्त्रोक्त विधा से सन्तानोत्पत्ति की है। संक्षेप में उनका अनुभव बताने जा रहा हूँ।


पहले ठीक-ठीक ज्ञान आवश्यक है। इसलिए उन्होंने संतान प्राप्ति हेतु शास्त्रीय विधि-निषेध को ध्यान में रखते हुए संतान प्राप्ति की विधि विषयक मार्गदर्शन प्राप्त किया।


गर्भाधान से पहले शास्त्रीय और आयुर्वेदिक मार्ग से देहशुद्धि के बाद संतान प्राप्ति तक योग्य व शास्त्रीय वैद्य जी के मार्गदर्शन में ऐसी आयुर्वेदिक औषधियाँ ग्रहण की गई जिनमें मांस आदि अभक्ष्य पदार्थ न हो। इस हेतु स्वयं को भी उपचार विषयक ज्ञान आवश्यक होने के कारण 'अष्टांगहृदय', 'भावप्रकाश', 'सुश्रुतसंहिता' जैसे ग्रन्थों का समय-समय पर अवलोकन करते हुए वैद्य के साथ ग्रन्थ के अनुसार परामर्श लेते रहे।


तदुपरांत आचार्य जी ने स्वशाखा की विधि से गर्भाधान संस्कार किया। उसके बाद उचित समय पर पुंसवन संस्कार और सीमन्तोन्नयन संस्कार सम्पन्न किये गए।


घर में ही आयुर्वेदिक पद्धति से (बिना ऑपरेशन और बिना म्लेच्छचिकित्सा के)संतान के जन्म हेतु आठवें महीने में इस प्रकार सूतिकागृह का निर्माण किया कि केवल सूतिका (उनकी पत्नी) के साथ रहने वाली सवर्णा स्त्री (समान वर्ण की स्त्री, यहाँ ब्राह्मण स्त्री) ही साथ में रह सके। ताकि शौचाचार की शास्त्रोक्त मर्यादा बनी रहे।


घर के कमरे के नैऋत्य कोण में गर्भिणी के लिये केवल काष्ठ की शैय्या और कमरे के आधे मार्ग के अन्तराल में बाँस की चादर लगाकर कमरे को दो भाग में बाँट दिया। बाँस की चादर की एक ओर सूतिकागृह में आने-जाने हेतु 2 हाथ चौड़ा मार्ग रखा गया।


प्रसव के पहले एक महत्वपूर्ण काम बाकी रह गया था― किसी बिना ऑपरेशन के प्रसव करानेवाली अनुभवी धात्री (दाई) को खोजना। अपने गाँव, नगर और मित्र के ससुराल के नगर में खोजना प्रारम्भ किया। परमात्मा की कृपा से कुछ ही दिनों में एक नहीं तीन योग्य धात्रियाँ मिल गईं। पर काम तो किसी एक का ही था, तो गर्भ परीक्षण और उनके अपने अनुभव के आधार पर उनका परीक्षण किया। तीनों ही योग्य थीं तो सबके फोन नम्बर लिये गये।


गर्भिणी को प्रसूति की वेदना के दिन अचानक आचार्य जी के परिवार वाले चिंतित हो उठे, क्योंकि उस समय (नवम्बर 2020 में) कोरोना के कारण दो दिन के लिये कर्फ्यू लगा हुआ था। एक-एक करके सभी धात्रियों से सम्पर्क किया गया, किसी ने आने में आपत्ति नहीं जताई।


सायंकाल के समय प्रसूति की वेदना बढ़ती जा रही थी, तब नजदीक रहने वाली धात्री से सम्पर्क कर उन्हें बुलाया गया। कुशल धात्री ने परीक्षण करके कहा, "अभी योनिमुख नहीं खुला। रात्रि में खुलने की संभावना है।" उनके कहने पर योनि में गोबर कण्डों की धूनी दिलाई गयी।


रात्रि की ओर समय बढ़ता गया, तब फिर से अधिक वेदना होने लगी। इस समय धात्री ने अपनी कुशलता का परिचय देते हुए गर्भिणी को हिम्मत देते हुए योनि की ओर जोर देने को कहा। गर्भिणी ने भी साहसपूर्वक बल लगाया।


परिणाम― बिना ऑपरेशन के आयुर्वेदिक पद्धति से सरलतापूर्वक सुखद कन्या का जन्म हुआ।


स्त्री के अधिकार अनुसार जातकर्म संस्कार पूर्ण होने तक करीब 40 मिनट तक नालच्छेदन नहीं किया, फिर भी संतान स्वस्थ है। आजकल म्लेच्छ पद्धति में तो जन्म के तुरन्त बाद नाल काट देते हैं। शास्त्रोक्त विधा है कि जातकर्म संस्कार के अंत में नाल काटें। इसका भी गूढ़ रहस्य है। स्वयं पर कृपा करके इसमें साइंस मत घुसेड़ना।

धर्मशास्त्र और आयुर्वेद को साथ में रखकर गुरु, गोविंद औरग्रन्थ की कृपा से दुष्कर कार्य भी सरल हो सकता है। बस धैर्य और शास्त्रों पर दृढ़ श्रद्धा रखने की आवश्यकता है।


नारायण 

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