विदेशयात्रीओ के कल्याण हेतु

 ब्रह्महत्यारे आदि एवं विशेष विदेशयात्री (म्लेच्छदेश यात्री) आदि पतितो के लिये परोपकारार्थ मरणोत्तरीविधान क्रम लिख रहे हैं, किसी की द्वेषभाव से निंदा करने के लिए नहीं। आजकल धर्म के नाम पर  विदेशयात्रा अधिक हो रही हैं परन्तु विदेशयात्रा एक पतनीय पातक हैं जिसकी शुद्धि कलियुग में प्रायश्चित्त करलेनेपर भी नहीं होती ऐसे मृतको की मरणोत्तरीक्रिया का वर्णन जानना आवश्यक हैं कि पतितों के लिये शास्त्र की आज्ञा क्या हैं ? अज्ञानतावश यात्रा की हो और पश्चाताप हो - तो जरूर इस शास्त्रोक्त विधि का अनुगमन करे -


बोधायनधर्मसूत्र प्रश्न २/अध्याय  १/ खण्ड २ /सूत्र १-२

अथ पतनीयानि। समुद्रसंयानम्(द्वीपान्तर- म्लेच्छदेशे गमनम्)।


आत्महत्यारे, पाखंडी, महापातकी, व्यभिचारिणी स्त्री- आदि पतितो के स्नान, जनेऊ संस्कार, मरणोत्तरी-श्राद्ध सपिंडीकरण आदि नहीं करना चाहिए ---- 

*पाखण्डमाश्रिताश्चैव महापातकिनस्तथ। स्त्रियश्च व्यभिचारिण्य आरूढपतितास्तथा। न तेषां स्नान संस्कारो न श्राद्धं न सपिण्डनम् ।। भविष्य पुराणे ।।*


पतितों का दाह(अग्निसंस्कार, अंत्येष्टिकर्म )और अस्थिसंचय , रोना ,पिण्डश्राद्ध आदि कभी भी न करे, जो पतितो के निमित्त अज्ञानता से श्राद्धादि करता हैं तो उसकी शुद्धि दो तप्तकृच्छ्र-प्रायश्चित्त करने से होती हैं,  -----> *पतितानां न दाह: स्यान्नान्त्येष्टिर्नास्थिसंचय:। न चाश्रुपात: पिण्डो वा कार्यं श्राद्धादिकं क्वचित् । एतानि पतितानां तु य: करोति विमोहित: । तत: कृच्छ्रद्वयेनैव तस्य शुद्धिर्नचान्यथा।। ब्रह्मपुराणे।।*


प्रत्येक पतितो के मरनेपर यदि जानबुझ कर सभी प्रकार के अन्त्यकर्म करे तो तप्तकृच्छ्रसहित चांद्रायण करे... --- *तप्तकृच्छ्रसहितं चरेच्चान्द्रायणव्रतम्।। वसिष्ठ।।*

इन पतितों के निमित्त अग्नि और जलदान, स्नान और स्पर्श , स्मशान में ले जाना , रज्जु का छेदन , रुदन इनको करे तो #तप्तकृच्छ्रप्रायश्चित्त --- *कृत्वाग्निमुदकं स्नानं संस्पर्शं वहनं कथाम्। रज्जुच्छेदाश्रुपातं च तप्तकृच्छ्रेण शुद्ध्यति।। माधवीये वसिष्ठ।।*


पतितों के मरनेपर केवल स्पर्श और अश्रुपात किया हो परंतु दूसरे कर्म न करे तो एकरात्रि उपवास, एकरात भोजन न करे, जानबुझ कर किया हो तो तीनरात्रितक भोजन त्याग दे जो पतितो की आसन्दी अपने कन्धे पर उठाता हैं, उदकदान करता हैं वह सान्तपनकृच्छ्र करे तो शुद्ध हो अज्ञान से करनेपर अाधा प्रायश्चित्त करे ---- *तच्छवं केवलं स्पृष्टमश्रु वा पतितं यदि। पूर्वोक्तनामकारी चेदेकरात्रभोजनम्।। एकरात्रं तु नाश्नीयात् त्रिरात्रं बुद्धिपूर्वकम्।। मिताक्षरा, माधवीये च ।।* /////////  *एषामन्यतमं प्रेतं यो वहेत दहेत वा । कटोदकक्रियां कृत्वा कृच्छ्रंसांतपनं चरेत् ।। अज्ञानेत्वर्धम् (संवर्तस्मृति)*


चाण्डाल, जल,सर्प, ब्राह्मण के शाप से, बिजली से, दाडवाले पशुसे तथा पापकर्मा पतितो की मृत्यु होती हैं इनको जल, पिण्डदान, जो मरनेपर दिया जाता हैं वह नहीं प्राप्त होता हैं, अन्तरिक्ष में ही नष्ट हो जाता है। 

इन पतितो के लिए उचित और अधिकृत हित यह हैं कि आत्मघाती और पतितो की मरणोत्तरी-क्रिया नहीं होती उनको गङ्गाजी में स्थापन(बहा देना) करदेना चाहिए ----->  (चण्डालदुदकात्सर्पाद्ब्राह्मणाद्वैद्युतादपि। दंष्ट्रिभ्यश्च पशुभ्यश्च मरणं पापकर्मणाम् ।।उदकं पिण्डदानं च प्रेतेभ्यो यत्प्रदीयते। *नोपतिष्ठति तत् सर्वमन्तरिक्षे विनश्यति।। अङ्गिरा।।* आत्मनस्त्यागिनां नास्ति पतितानां तथा क्रिया। *तेषामपि तथा गङ्गातोये संस्थापनं हितम्।।मिताक्षरा।।*


#मरणोत्तरीक्रियाविधान-


अन्त्यकर्मदीपक लेखक  नित्यानंद पर्वतीय 


अग्निदाह न करे गङ्गाजी में शव को बहा देवें और अग्निदाह करे तो समन्त्रक न करे, न अश्रुपात न सूतकपालन न पिंडोदकक्रिया भी एक संवत्सर तक न करे। 


अमन्त्रक अग्निदाह किया हो तो अस्थियों को किसी मिट्टी के पक्केपात्र में रखकर वर्षभर जमीन में गाड़कर उसपर कुछ निशान छोड़ दैवे। 


संवत्सर पूर्ण होते ही प्रथमतः #गरुडपुराण_प्रेतकाण्ड ४४/६ के अनुसार "पूर्णे संवत्सरे तेषामित्थं कार्यं दयालुभिः। एकादशीं समासाद्य शुक्लपक्षे च काश्यप।।"" इत्यादि विधानोक्त अनुसार शुक्लपक्षकी एकादशी के दिन पतित-प्रायश्चित्त द्वादशाब्द-प्राजापत्य के गौदानादि शास्त्रोक्तपरिमाण युक्त प्रत्याम्नायो में से किसी प्रत्याम्नाय द्वारा प्रायश्चित्त करके  केवल नारायणबलि(षोडशश्राद्ध अथवा शाखान्तरे पञ्चदशश्राद्ध) करे।


तदनन्तर पर्णशरदाह करे, चारदिन का मृत-सूतकपालन करे सूतक की गिनती अग्निदाह के दिन से करे, पूर्व संचित अस्थि के साथ पर्णशरदाह की भस्म मिलाकर गङ्गाजी में अस्थि विसर्जन करे , तदनन्तर अवयवश्राद्ध, नवश्राद्ध , (एकादशाहनिमित्त जो कृत्य कहे - प्रेतशय्यादान, कपिलागौदान, उदकुंभदान, वृषोत्सर्ग,  एकोद्दिष्टश्राद्ध, सपिंडीकरण आदि यथाक्रम से और्ध्वदैहिककर्मों को करे। सब मरणोत्तरीक्रियाएं यजमान की स्वशाखासूत्र विधान अनुसार करना चाहिये-->


स्वशाखोक्तविधानेन इत्थं कुर्याद्यथातथम् ।

प्रेतत्वान्मोचयेत्तांस्तु स्वर्गमार्गं नयेत्च ॥ गरुडपुराण प्रेतखण्ड ४४/२९ ॥


'न जनमियान् नान्तमियात्'

    (म्लेच्छों के संसर्ग में न आयें और न ही धर्म को भ्रष्ट करें।)


श्रुति स्मृति में साधु-संतों को कहीं भी विदेशयात्रा(म्लेच्छ देश)  की अनुमति  नहीं दी गयी है ।

 

हमारे वेदों - शास्त्रों  में समुद्रपारम्लेच्छदेश गमन का निषेध  किया गया है  । किसी भी शुद्ध कुलीन ब्राह्मण को कभी भी म्लेच्छ देशों की समुद्रपार यात्रा कर  सनातन वैदिक धर्म की हानि नहीं करनी चाहिये ।  इसे पापकर्म बताया गया है  किन्तु  एक से बढ कर आधुनिक  कथित धर्माचार्य   समुद्रोल्लङ्घन कर  म्लेच्छ देशों में यात्रा करते आ रहे हैं और अब भी  सनातनधर्मनाश का यह क्रम अनवरत  चल रहा है ।


क्या  ऐसे साधु-संत आचार्य कहाने लायक हैं ?

विदेश यात्रा-निषेध के प्रमाण देखें –

(क) वेदे म्लेच्छदेशगमननिषेधाे। 

यथा–  न जनमियान् नान्तमियात् ।(माध्यन्दिनीयवाजसनेयिशुक्लयजुर्वेदशतपथब्राह्मणे , 14/4/1/11, 


काण्ववाजसनेयिशुक्लयजुर्वेदशतपथब्राह्मणे , 16/3/3/10,


काण्वबृहदारण्यकाेपनिषदि , 1/3/10)। 


(ख) स्मृताै म्लेच्छदेशगमननिषेधाे । 


यथा – न गच्छेन् म्लेच्छविषयम् (विष्णुधर्मसूत्रे ,84/2),


म्लेच्छदेशे न च व्रजेत् (शङ्खस्मृताै ,14/30), 


(ग) पुराणे म्लेच्छदेशगमननिषेधाे।


यथा –


सिन्धाेरुत्तरपर्यन्तं  तथाेदीच्यतरं नरः। 

पापदेशाश् च ये केचित् पापैरध्युषिता  जनैः ।।


शिष्टैस् तु वर्जिता ये वै ब्राह्मणैर् वेदपारगैः। 

गच्छतां रागसम्माेहात् तेषां पापं न नश्यति ।।


(ब्रह्माण्डपुराणे , 3/14/81-82, वायुपुराणे , 2/16/70-71)


इत्यादि अन्यान्य शास्त्र प्रमाण विदेशयात्रा का निषेध कर रहे हैं ।


हाँ, आर्य समाज का आदर्श वाक्य है–' कृण्वन्तो विश्वमार्यम्',  (ऋग्वेद , 9/63/5 )जिसका अर्थ है – विश्व को आर्य बनाते चलो। अर्थात् सारे संसार के मनुष्यों को श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभाव वाले बनाओ। यह जब का वाक्य है तब सारी पृथ्वी को आर्यावर्त कहा जाता था। वसुधैव  कुटुम्बकम्। अर्थात् यह मन्त्र विदेशयात्रावाद का मंडन नहीं करता।


"अकुर्वन्नपि विध्युक्तं निषिद्धं परिवर्जयेत्। निषिद्धपरिहारेण विहिते लभते मतिम् ।।" इस  संहितोक्त वचनानुसार – " एक विधि है, अगर आपके मन में श्रद्धा है तो आप उसे मानिये ,  पर जहाँ शास्त्र में निषेध है, उसे कथमपि नहीं करना चाहिए।


वेद समस्त धर्म के मूल हैं, और उस  वेदप्रतिपादित  धर्म की यह दिव्य महिमा है कि इस धर्म के सम्यक् परिपालन  से हमारी और हमारे शास्त्र की रक्षा होती है। 'यतो धर्मस्ततो जयः' जहाँ धर्म है, वहीं विजय है ।


अतः  यह अत्यन्त विचारणीय है कि कथानुष्ठान हेतु  वेदादि आर्ष शास्त्रों की दृष्टि  से  विशेष  प्रतिषिद्ध हो चुके     कथाकारों  को  आर्यावर्त की पवित्र भूमि में  खुलकर  प्रायोजित करना धर्मसम्मत कृत्य है और ऐसा न करना धर्म-विरुद्ध ।


अस्तु  सनातन धर्मावलम्बी आचार्यों से निवेदन है कि वे  गुरुकुलों और आचार्य परम्परा की संस्थापना  की  दिशा में ध्यान दें , समाज को  परम्परानुगत , संस्कारवान्  बनाने की दिशा में   प्रचार -प्रसार पर  ध्यान दें जिससे शास्त्रादेश का समुचित रूप से पालन हो सके ।

Comments

Popular posts from this blog

Copyright

सूर्य संबंधित कार्य

भूत प्रेत