कलश वर्णन
#स्वर्णपूर्णकलशम्
ऋग्वैदिक पुण्याहवचन प्रयोग में यजमान को अपने घुटने ज़मीन पर लगाने होते हैं और अपने हाथों से अपने खिले हुए कमल के समान माथे को पकड़ना होता है। कुछ लोग कहते हैं कि माथे पर सोने से भरा कलश धारण करना चाहिए और कुछ कहते हैं कि उसे महसूस करना होता है जैसे हाथ में सोने का कलश है तो #स्वर्णपूर्णकलशम्_भवयित्व धारयित्व का अर्थ है धारण करना, ऐसा कहना भी हास्यास्पद है। परंतु स्वर्णपूर्णकलश का अर्थ जल से भरा हुआ कलश माना गया है।
यास्काचार्य का निघंटु-निरुक्त, दास ग्रंथों में से एक, पानी के लिए 101 पर्यायवाची शब्द देता है, जिनमें से पहला है #अर्नाः #(स्वर्णः)सु-अर्नाः=संयुतिका का अर्थ है कि शुद्ध जल (अच्छा जल) से भरा कलश दाहिने हाथ से लेना चाहिए।
नारायणभट्टी आदि। पाठ में #स्वर्ण पाठ स्वीकार नहीं किया गया है बल्कि #सुवर्णपूर्णकलशम् ही रखा गया है। इस पाठ के अनुसार भी सु-वर्ण = वर्ण (रूप में उत्कृष्ट) का वही अर्थ होना चाहिए जो पूर्णकलश (जल से भरा हुआ) का है। (अर्थात् सोना अथवा सोने से भरा कलश न लेने की हीन भावना मन में उत्पन्न नहीं होगी।)
क्योंकि प्रयोग में कहीं भी उस तरह से सोने का कलश स्थापित करने या सोने से भरा कलश स्थापित करने का कोई वादा नहीं है।
नारायण
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