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Showing posts from May, 2024

अर्की विवाह

 *श्री मन्नारायणाय नम:* अर्कविवाह का प्रयोजन यह है कि प्रथम दो विवाह करने के बाद भी पुत्रसंतति न हो तो तृतीय मनुष्यकन्या/मानुषी विवाह करने से अनिष्ट होता है ,या तो दो पत्नी के न रहने के कारणवश या तो दो पत्नी की मृत्यु के बाद पुत्रसंतान के लिए तृतीय भार्या बनाने से पहेले *तृतीयमानुषीकन्याविवाहदोष के परिहार* के लिए अर्क विवाह होता है यह है प्रयोजन न हो तो न करना चाहिए क्योंकि लोकवायका मे विवाह न होने के कारण अर्कविवाह करते है जो पूर्णतः अशास्त्रोक्त है  और एसा तृतीयमानुषीकन्या विवाह अर्की के साथ हो न की अर्क के साथ कुछ मूर्ख गधे पंडित तो अर्क और अर्की मे भेद ही नही समजते और अर्क के साथ विवाह करा देते हैं अर्थात समलैंगिक विवाह संबंध जो पूर्णतः अमान्य है इसलिए  विषयानुसंधान जानकर अपने आचार्यों से विधिवत मार्गदर्शन प्राप्त करे क्यो कि अशास्त्रीय कृत्य का दोष उत्पन्न होगा तो आचार्य और यजमान दोनो को पीड़ित ही करेगा और अशुद्ध/अशास्त्रीय कृत्य का फल अशुद्ध और अशास्त्रोक्त ही होता है --  अर्की के पर्ण पुष्प उस की शास्त्रीयता भी देखनी चाहिए कि यह उपयुक्त है भी या नही ? जैसा व...

परिक्षण विधि

 परिक्षण हेतु - नाऽपरीक्षितं याजयेत्, नाऽध्यापयेत्, नोपनयेत्। (विष्णुधर्मसूत्र २९।४,५,६)। (१)पिता का गोत्र ? (२)पिता के प्रवर ऋषियों के नाम ? (३)पिता के मातामह अथवा मामा का गोत्र और प्रवर ऋषियों के नाम ? (४)माता अथवा नाना का गोत्र प्रवर ऋषियों के नाम ? (५)माता के मामा अथवा नाना के ससुर का गोत्र प्रवर ऋषियों के नाम ? (६)परिवार में किसी विवाहितस्त्री का पुनःविवाह ? (७)परिवार में किसी विधवास्त्री के पुनःविवाह ? (८)परिवार में से किसीने विदेशयात्रा ? (९)परिवार में कोई शराबी ? (१०)परिवार में किसी ने भ्रूणगिराया हैं ? (११)परिवार में किसी का असवर्णविवाह ? (१२)परिवार किसी परवर्ण का दत्तक अथवा दत्तक ? (१३) पिता के उपनयन समय की उम्र ? (१४) आपकी पारम्परिक वेदशाखा ? (१५) पितामह के उपनयन के समय की उम्र ? (१६) यदि आपका उपनयन हुआ हैं तो गायत्रीमन्त्र किसने उपदेश किया ? (१७) परिक्षार्थी को अपनी स्वशाखा के अनुसार उच्तारणविधा से गायत्रीमन्त्रोपदेश हुआ था या नहीं यह उनके या उनको उपनयन समय गायत्रीप्रदान करनेवाले पिता या आचार्य के स्वर में श्रवण करना चाहिये। (१८) उपनयन के समय जनेऊ-सूत्र कहाँ से प्राप्...

शिव-विष्णु और शालीग्राम पूजा मे अधिकार

 शिवलिंग, विष्णु और शालीग्राम पूजन मे सभी का अधिकार नही है,तो (ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य) #अप्रायश्चिती_पतित_द्विजो  की तो बात ही क्या करे ?  "ह्रीं शिवाय नम:"  इस मंत्र से स्त्रियो को पूजन करना चाहिए परन्तु यह आज्ञा पुराणोक्त प्राचीन लिंगो (सोमनाथ,मल्लिकार्जुन,महाकाल, ॐकार, केदारनाथ, भीमशंकर विश्वनाथ, त्र्यम्बक,वैद्यनाथ,नागेश,रामेश्वर,गोकर्ण) कि पूजा के विषय मे ही है। त्रिस्थलीसेतु मे नारद पुराण के यह वचन है कि - जो मनुष्य शूद्र से पूजे हुए शिवलिंग अथवा भगवान विष्णु की प्रतिमा को प्रणाम करता है उसका उद्धार सहस्र प्रायश्चितो के करने से भी नही होता, जो व्यक्ति शूद्र के स्पर्श किये हुए शिवलिंग अथवा विष्णु की प्रतिमा को नमस्कार करता है जबतक चन्द्रमा और तारागण है तब तक वह भांति २ के दुःखों को भोगता है, पाखण्डियो के पूजित लिंग को प्रणाम करके मनुष्य स्वयं भी पाखण्डी हो जाता है,आमीरो (घोसी आदि कों) से पूजे हुए लिंग को प्रणाम करने वाला मनुष्य नरकगामी हो जाता है, जिस शिवलिंग की अथवा विष्णुमूर्ति की स्त्रियो ने पूजा की हो , उसे जो व्यक्ति प्रणाम भी करता है,वह करोडो कुल सहित कल्...

वोटरपार्क मे कभी न जाए

 #waterpark #वोटरपार्क मे स्नान आदि क्रीडांगण न करे यह अशास्त्रोक्त है  मनुष्यो के द्वारा निर्मित वोटरपार्क आदि कूपो के दूषित जल मे कभी भी आनंद प्रमाद के लिए स्नान न करना परकीयनिपानेषु न स्न्नायाच्च कदाचन। निपानकर्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते ॥  यानशय्यासनान्यस्य कूपोद्यानगृहाणि च।  अदत्तान्युपभुञ्जान एनसः स्यात्तुरीयभाक् ॥  नदीषु देवखातेषु तडागेषु सरःसु ।  स्नानं समाचरेन्नित्यं गर्तप्रस्रवणेषु च ॥  गृहस्य ब्राह्मणको उचित है कि अन्यके बनायेहुए जलाशयमें (ओ केवल अपनेही लिये बनाया हो, उसमें) स्नान नहीं करे क्योंकि उसमें स्नान करनेसे उसके बनानेवालेके पापोंके अंशका भागी होना पड़ताहै ॥ अन्यकी सवारी, शय्या, आसन, कूप, बाग अथवा गृहको विना उनके स्वामीके अनुमति दिये हुए उपभोग नहीं करे; क्योंकि उपभोग करनेसे उनके स्वामीके पापोंके चौथे अंशका भागी होगा ॥  तीर्थाभाव तु कर्तव्यमुष्णोदकपरोदकैः ॥ स्नानं तु वह्नितप्तेन तथैव परवारिणा ॥  शरीरशुद्धिर्विज्ञाता न तु स्नानफलं भवेत् ॥ अद्भिर्गात्राणि शुद्धचंति तीर्थस्नानात्फलं भवेत् ॥ तीर्थके अभाव में गरम जलसे ...

पिता पुत्र का मुख देख ले

 पितापुत्रस्य जातस्य पश्येच्चेज्जीवतो मुखम् ।। ऋणमस्मिन्संनयति अमृतत्वं च गच्छति ॥  जातमात्रेण पुत्रेण पितॄणामनृणी पित्ता ॥  तदह्नि शुद्धिमाप्नोति नरकात्त्रायते हि सः ॥  एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् ॥यजते चाश्वमेधं च नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ॥ कांक्षंति पितरः सर्वे नरकांतरभीरवः ॥  गयां यास्यति यः पुत्रः स नस्त्राता भविष्यति।।    _```_पिता यदि उत्पन्न हुए पुत्रका मुख जोवित अवस्थामें एकवार भी देखले तो वह पितरोंके ऋणसे मुक्त होकर स्वर्गको प्राप्त होता है , पुत्रके पृथ्वीपर उत्पन्न होते ही मनुष्य पितरोंके ऋणसे छूट जाता है और उसी दिन वह शुद्ध होता है कारण कि यह पुत्र नरकसे उद्धार करता है ,बहुतसे पुत्रोंकी इच्छा करनी उचित है कारण कि यदि उनमेंसे कोई एक भी पुत्र गयाजीजाय, कोई अश्वमेध यज्ञको करे और कोई नील ब्रैषका उत्सर्ग करे ,नरकसे भयभीत हुए पितृगण "जो पुत्र गयाको जायगा वही हमारे उद्धारका करनेवाला होगा" यह विचारकर ऐसे पुत्रकी इच्छा करते हैं ।॥_```_ पं० धवलकुमार शास्त्री गुजरात

वेदो मे हिंसा ?

वेदों में बलिप्रथा  ============ आज कल बहुत से लोग ऑडियो और वीडियो तथा बातचीत में यह बताने का प्रयास करते है कि बलि प्रथा या मांस भक्षण वेदकाल से होता रहा है। जानकारी के अभाव में या तो हम चर्चा नही करते या कन्नी काटने लगते है। ब्राह्मण होंने पर धर्म है की हम कुछ बाते जो आधार है अवश्य जाने और निश्चय ही उनका निवारण भी करें। हिन्दू -धर्म में सर्वत्र निर्दोषों के प्रति अहिंसा बरतने का ही प्रतिपादन किया गया है और सर्वत्र हिंसा का निषेध। वेदों से लेकर पुराणों तक में पशु-बलि का कहीं भी समर्थन नहीं मिलता। कुछ महाज्ञानी जिव्हा के प्रभाव में वैदिक साहित्य की ऐसी व्याख्या कर देते है कि अर्थ का अनर्थ हो जाता है, वैदिक साहित्य की जानकारी न होने की वजह से सामान्य जन उनकी बातों को सत्य मान लेते है। हम भारत मे प्रचलित बली प्रथा को समझने से पहले हम पहले ये देख लेते है कि क्या वास्तव में वैदिक साहित्यो में जीव हिंसा बलि प्रथा आदि बाते है ।। जब कोई अंधा होता है तो सोचता है कि सभी अंधे हो जाये और यही कारण था कि पश्चिमी सभ्यता ने जब भारतीय सभ्यता पर अतिक्रमण करना शुरू किया तो सबसे पहले उसने हमारी संस्...