अर्की विवाह
*श्री मन्नारायणाय नम:* अर्कविवाह का प्रयोजन यह है कि प्रथम दो विवाह करने के बाद भी पुत्रसंतति न हो तो तृतीय मनुष्यकन्या/मानुषी विवाह करने से अनिष्ट होता है ,या तो दो पत्नी के न रहने के कारणवश या तो दो पत्नी की मृत्यु के बाद पुत्रसंतान के लिए तृतीय भार्या बनाने से पहेले *तृतीयमानुषीकन्याविवाहदोष के परिहार* के लिए अर्क विवाह होता है यह है प्रयोजन न हो तो न करना चाहिए क्योंकि लोकवायका मे विवाह न होने के कारण अर्कविवाह करते है जो पूर्णतः अशास्त्रोक्त है और एसा तृतीयमानुषीकन्या विवाह अर्की के साथ हो न की अर्क के साथ कुछ मूर्ख गधे पंडित तो अर्क और अर्की मे भेद ही नही समजते और अर्क के साथ विवाह करा देते हैं अर्थात समलैंगिक विवाह संबंध जो पूर्णतः अमान्य है इसलिए विषयानुसंधान जानकर अपने आचार्यों से विधिवत मार्गदर्शन प्राप्त करे क्यो कि अशास्त्रीय कृत्य का दोष उत्पन्न होगा तो आचार्य और यजमान दोनो को पीड़ित ही करेगा और अशुद्ध/अशास्त्रीय कृत्य का फल अशुद्ध और अशास्त्रोक्त ही होता है -- अर्की के पर्ण पुष्प उस की शास्त्रीयता भी देखनी चाहिए कि यह उपयुक्त है भी या नही ? जैसा व...