परिक्षण विधि

 परिक्षण हेतु -

नाऽपरीक्षितं याजयेत्, नाऽध्यापयेत्, नोपनयेत्। (विष्णुधर्मसूत्र २९।४,५,६)।


(१)पिता का गोत्र ?

(२)पिता के प्रवर ऋषियों के नाम ?

(३)पिता के मातामह अथवा मामा का गोत्र और प्रवर ऋषियों के नाम ?

(४)माता अथवा नाना का गोत्र प्रवर ऋषियों के नाम ?

(५)माता के मामा अथवा नाना के ससुर का गोत्र प्रवर ऋषियों के नाम ?


(६)परिवार में किसी विवाहितस्त्री का पुनःविवाह ?

(७)परिवार में किसी विधवास्त्री के पुनःविवाह ?

(८)परिवार में से किसीने विदेशयात्रा ?

(९)परिवार में कोई शराबी ?

(१०)परिवार में किसी ने भ्रूणगिराया हैं ?

(११)परिवार में किसी का असवर्णविवाह ?

(१२)परिवार किसी परवर्ण का दत्तक अथवा दत्तक ?

(१३) पिता के उपनयन समय की उम्र ?

(१४) आपकी पारम्परिक वेदशाखा ?

(१५) पितामह के उपनयन के समय की उम्र ?

(१६) यदि आपका उपनयन हुआ हैं तो गायत्रीमन्त्र किसने उपदेश किया ?

(१७) परिक्षार्थी को अपनी स्वशाखा के अनुसार उच्तारणविधा से गायत्रीमन्त्रोपदेश हुआ था या नहीं यह उनके या उनको उपनयन समय गायत्रीप्रदान करनेवाले पिता या आचार्य के स्वर में श्रवण करना चाहिये।

(१८) उपनयन के समय जनेऊ-सूत्र कहाँ से प्राप्त किया था ?

(१९) उपनयन के समय मुंडन किया था या नहीं ?

(२०) उपनयन के दिन कितने बजे करिब जनेऊ कन्धेपर डाला गया ?

(२१) उपनयन के दिन से अविराम स्वशाखासूत्रविधा से सन्ध्योपासना हो रहे हैं , कितने दिन तक विराम रहा ?


(२२) उपनयन के दिन समावर्तन हुआ था ?


(२३)उपनयन करनेवाले आचार्य की पारम्परिक वेदशाखा ?

(२४) उपनयन करनेवाले आचार्य विदेशयात्री थे ?

उपनयन करनेवाले आचार्य को भोजन में क्या क्या खिलाया था और कब ?


(२५) उपनयन के बाद दण्डाजिन-मेखलाधारण संध्याग्निकार्य अविराम चालु रहे थे ?


(२६) यदि आप विवाहित हैं तो पत्नी के पिताजी और उनके मामा का गोत्र ?

२७ - (जहाँ कश्यपगोत्र से सम्बन्ध हो वहाँ आस्पद(सरनेईम) का उल्लेख करें।


यह सब प्रश्नो के उत्तर तत्तत् सगेसम्बन्धिवालों को पूछकर पूछवाकर उत्तर प्राप्त करना चाहिये ।


२८- (ये सभी प्रश्नो के साथ द्विजातिकर्माधिकार सिद्ध करने के लिये अन्य पुनरुपनयन निमित्त हुएं थे या नहीं यह भी प्रश्नोत्तरी करनी अत्यंत आवश्यक हैं)


यह पुरवणी सभी कर्मकांडी एवं वेदाध्यापको के लिये संग्रह करने एवं (यज्ञ श्राद्ध विवाह संस्कार उपनयन वेदाध्यापन आदि के लिये अधिकारी अनधिकारी का )परिक्षण करने मैं उपयोगी हैं।


साभार आचार्य श्री पु० शास्त्री उमरेठ 

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