जयचंद गद्दार नही था
इतिहास में एक सबसे बड़ा अन्याय महाराज जयचंद के साथ हुआ है। पृथ्वीराज रासो के आधार पर जयचंद्र को देशद्रोही ठहराया गया है ,किन्तु आधुनिक इतिहासकार जयचंद को गद्दार की जगह एक महान दानी राजा माना है। जयचंद के समय के अब तक १४ दानपत्र मिल चुके है। पृथ्वीराज- चंदेल युद्ध में जयचंद ने चन्देलों की सहयता की थी , हो सकता है , इसी से चिढ़कर चौहानों ने पृथ्वीराज रासो में उसे गद्दार लिख दिया हो?? या फिर योजनाबद्ध तरीके से इतिहास को कलंकित करने का यह षड्यंत्र हुआ हो।
#जयचन्द_कौन_थे--
त्यक्तवा देहं सं शुद्धात्मा चन्द्रकान्त्यां सुतोभवत।।
जयचन्द्र इतिख्यातो बाहुशाली जितेंद्रिय ।।
भविष्यपुराण का इस श्लोक का अर्थ है कि जयचन्द्र एक शुद्ध आत्मा और प्रतापी ओर जितेंद्रिय शासक था।
उसका छोटा भाई रत्नभानु था, जिसने गोड़ , मरु तथा बंगाल देशों में विजय प्राप्त की । ( यह भी भविष्यपुराण से लिया गया है - भविष्य पुराण - प्रतिसर्ग पर्व ३.५.१-४)
जब मैने भविष्यपुराण की यह घटना पढ़ी, तो मव समझ गया, की पृथ्वीराज चौहान और जयचन्द क् वास्तविक बैर क्या था ? जयचन्द की मरुभूमि पर भी विजय का उल्लेख है , इसका अर्थ साफ है, की जयचन्द भी पृथ्वीराज जितने ही प्रतापी राजा थे, ओर इनका आपसी विवाद केवल दिल्ली को लेकर नही, बल्कि पूरे भारत को लेकर ही था । दोनो ही भारत सम्राट बनना चाहते थे, ओर इसके लिए दोनो मेयुद्ध भी अवश्यभावी था । शायद पृथ्वीराज की म्रत्यु के कारण जयचन्द- पृथ्वीराज युद्ध टल गया, नही तो संभवतः चन्देल युद्ध के बाद एक ओर महाविनाश भारत देख लेता ।
जयचन्द एक महान शाशक था, उतना ही महान, जितने महान पृथ्वीराज चौहान । दोनो ही युद्धभूमि मे वीरगति को प्राप्त हुए । दोनो ही आन बान शान के लिए अपनी माटी ओर कुर्बान हुए।
दरअसल जयचन्द को लेकर भ्रंतिया जानबूझकर फैलाई गई है । पृथ्वीराज रासो म् मुगलो द्वारा भारी छेड़छाड़ की गई है, रही shi कसर अंग्रेजो ओर वामियो ने पूरी कर दी।
रासो में तैमूर, चंगेज खान, मेवाड़ के रावल रतनसिंह-पदमावती जौहर,ख़िलजी जैसे बाद की सदियों में जन्म लेने वाले चरित्रों और घटनाओ के नाम/प्रसंग आ गए,जबकि उनका जन्म ही पृथ्वीराज चौहान के सैंकड़ो वर्ष बाद हुआ था।
रासों में लिखी काव्य की भाषा में फ़ारसी,तुर्की के बहुत से ऐसे शब्द थे जो बहुत बाद में भारतवर्ष में मुस्लिम शासन काल में प्रचलित हुए।
रासो के अनुसार मेवाड़ के रावल समरसिंह को पृथ्वीराज चौहान का बहनोई बताया गया है और उन्हें तराईन के युद्ध में लड़ता दिखाया गया है
जबकि मेवाड़ के रावल समरसिंह का जन्म ही पृथ्वीराज की मृत्यु के 80 वर्ष बाद हुआ था!!
अनंगपाल तोमर प्रथम का शासन काल सन् 736-754 ईस्वी के बीच था जबकि अनंगपाल तोमर द्वित्य का काल सन् 1051-1081 ईस्वी था,इनके अतिरिक्त कोई अनंगपाल हुए ही नही,
फिर दिल्ली नरेश अनंगपाल पृथ्वीराज चौहान के नाना कैसे हो सकते हैं क्योंकि उनके जन्म लेने के लगभग 80-85 वर्ष पूर्व ही अनंगपाल जी स्वर्गवासी हो गए थे ।
ओर तो ओर पृथ्वीराज रासो मे तो मुहम्मद गौरी को सिकंदर महान का बेटा बताया गया है।
जयचन्द्र ओर पृथ्वीराज क् विवाद था महत्वाकाक्षा का । ना तो पृथ्वीराज युद्धप्रिय थे, ओर ना जयचन्द्र ने गौरी को बुलाया था। बल्कि जयचन्द्र ने तो खुद भयंकर मलेछ संघार किया था।
जयचन्द्र एक पराक्रमी शासक था, उसकी सेना हमेशा विचरण किया करती थी। जब वह किसी देश पर चढ़ाई करता था, तो राजा और सेना देश छोड़कर भाग जाते थे । रंभामंजरी पढिये, उसमे साफ वर्णन है, की किस तरह जयचन्द ने मुसलमानों का घोर संघार करवाया था । भला जो आदमी मुसलमानों से इतनी घृणा करें, वह गौरी को क्यो बुलायेगा ?
लौ
वास्तविक इतिहास तो यही है । और बाकी जो है, सब झूठ ।
#सनातन_धर्म_रक्षक_काशीराज_महाराज_जयचन्द:-
काशीराज महाराज जयचंद के यश को कम करने व कुछ देश द्रोहीयों के नाम छुपाने के लिये षड्यंत्र के तहत जयचन्द जी का नाम बदनाम किया गया ।।
इतिहासकारों ने ऐतिहासिक ग्रन्थों व सभी लेखकों को पढ़ने के बाद महाराज जयन्द जी पर अपनी राय दी है ।।
डा. आर. सी. मजूमदार का मत है कि इस कथन में कोई सत्यता नहीं है कि महाराज जयचन्द ने पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिये मुहम्मद गौरी को आमंत्रित किया हो ( एन्सेंट इण्डिया पृ. 336 डाँ. R.C. मजूमदार ) । अपनी एक अन्य पुस्तक में इन्हीं विद्वान इतिहासकार ने निमंत्रण की बात का खण्डन किया है ।।
J. C. पोवल प्राइस महोदय का मत है कि यह बात आधारहीन है कि महाराज जयचन्द ने मोहम्मद गौरी को पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिये आमंत्रित किया । ( हिस्ट्री आफ इण्डिया ) ।
डा. रामशंकर त्रिपाठी का कथन है कि जयचन्द पर यह आरोप गलत है । उन्होंने माना है कि समकालीन मुसलमान इतिहासकार इस बात पर पूर्णतया मौन है कि जयचन्द ने ऐसा कोई निमंत्रण भेजा हो ।
श्री महेन्द्रनाथ मिश्र जो कि एक अच्छे इतिहासकार है ने जयचन्द के विरुद्ध देश-द्रोहीता के आरोप को असत्य माना है । उनका कथन है कि यह धारणा कि मुसलमानों को पृथ्वीराज पर चढाई करने के लिये आमंत्रित किया निराधार हे । उस समय के कपितय ग्रन्थ प्राप्य है किन्तु किसी में भी इन बातों का उल्लेख नहीं है । वे ग्रन्थ पृथ्वीराज-विजय, हम्मीर महाकाव्य, रम्भा- मन्जरी तथा प्रबन्ध-कोश किसी भी मुसलमान यात्री ने इसका जिक्र नहीं किया है । इतिहास साक्षी है कि जयचन्द ने चन्दावर में मोहम्मद गौरी से शौर्यपूर्ण युद्ध किया था ।
इब्न नसीर कृत "कामिल-उत्-तवारीख" में भी स्पष्ट कहा गया है कि, यह बात नितान्त असत्य है कि जयचन्द ने शाहबुद्दीन को पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिये आमंत्रित किया । शहाबुद्दीन अच्छी तराह जानता था कि जब तक उतर भारत के महाशक्तिशाली जयचन्द को परास्त न किया जाएगा तब तक उसका दिल्ली और अजमेर आदि भू-भाग पर किया गया अधिकार स्थाई न होगा क्योंकि जयचन्द के पूर्वजों ने और स्वयं जयचन्द ने तुर्कों से अनेकों बार मोर्चा लेकर हराया था ।
स्मिथ महोदय ने अपने ग्रन्थ अर्ली हिस्ट्री आफ इण्डिया में इस आरोप का उल्लेख नहीं किया है । पृथ्वीराज की तराईन के दुसरे युद्ध में हुई पराजय का दोष जयचन्द पर नहीं लगाया है ।
डा. राजबली पाण्डे ने अपनी पुस्तक प्राचीन भारत टिप्पणी में लिखा है "यह विश्वास कि गौरी को जयचन्द ने पृथ्वीराज के विरुद्ध निमन्त्रण दिया था,(डा. त्रिपाठी के अनुसार ) ठिक नही जान पङता क्योंकि मुसलमान लेखकों ने कहीं भी इसका जिक्र नहीं किया है ।
हिस्ट्री आफ कन्नौज- डा. त्रिपाठी । इसका अर्थ यह है कि डा. पाण्डे ने डा. त्रिपाठी के कथन को सत्य माना है । वे पूर्णतः सहमत है क्योंकि उन्होंने प्रतिवाद नहीं किया ।
जयचंद ने गौरी को पृथ्वीराज पर ना हमला करने के लिये आमंत्रित किया,ना ही किसी प्रकार का सहयोग दिया...
1-पृथ्वीराज रासो.. चंदबरदाई
2-तारीख-ए-फरिश्ता.... फरिश्ता
3-कन्नौज का इतिहास.. डॉ राजकुमार दीक्षित तथा कृष्णदत्त
4-कामिल-उतवारिख... इब्न नसीर
5- एन्सेंट इंडिया.. डॉ आर सी मजूमदार
6- जे सी पावेल प्राइस
7-हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया.. डॉ रामशंकर त्रिपाठी
8-श्री महेंद्र नाथ मिश्र
9-प्राचीन भारत.. डॉ राजबली पाण्डे
10- पृथ्वीराज विजय
11-हमीर महाकाव्य
12-रम्भा मज्जझरी
13- प्रबंध कोश.....
पृथ्वीराज रासो मे चंदबरदाई ने चार गद्दारों के नाम दिये है जिन्हे आधुनिक इतिहासकारो ने छुपाया व जयचंद जी को झूठा बदनाम किया.... गौरी बुलाने वाले चार गद्दार...
1-नीतिराय खत्री
2-धर्मायन कायस्थ
3-माधो भट्ट
4-प्रताप सिंह जैन..
इन गद्दारों का नाम छुपाये जाने से व जयचंद जी का नाम उछालने के पीछे किसका फायदा है वो अपने स्वविवेक से समझ सकते है...
जयचन्द्र (जयचन्द), महाराज विजयचन्द्र के पुत्र थे।
ये कन्नौज के राजा थे। जयचन्द का राज्याभिषेक वि.सं. १२२६ आषाढ शुक्ल ६ (ई.स. ११७० जून) को हुआ। राजा जयचन्द पराक्रमी शासक था। उसकी विशाल सैन्य वाहिनी सदैव विचरण करती रहती थी, इसलिए उसे
" #__दळ__पंगुळ " भी कहा जाता है।
इसका गुणगान पृथ्वीराज रासो में भी हुआ है।
राजशेखर सूरि ने अपने प्रबन्ध-कोश में कहा है कि काशीराज जयचन्द्र विजेता थे ,और गंगा-यमुना दोआब तो उसका विशेष रूप से अधिकृत प्रदेश था।
नयनचन्द्र ने रम्भामंजरी में जयचन्द को #_यवनों_का_नाश करने वाला कहा है।
युद्धप्रिय होने के कारण इन्होंने अपनी सैन्य शक्ति ऐसी बढ़ाई की वह #_अद्वितीय हो गई, जिससे जयचन्द को #__दळ__पंगुळ' की उपाधि से जाना जाने लगा।
जब ये युवराज थे तभी अपने पराक्रम से कई राजाओ को परास्त किया। राजा बनने के बाद अनेकों विजय प्राप्त की।
जयचन्द ने सिन्धु नदी पर मुसलमानों (सुल्तान, गौर) से ऐसा घोर संग्राम किया कि #रक्त__के__प्रवाह से नदी का नील जल एकदम ऐसा लाल हुआ मानों अमावस्या की रात्रि में ऊषा का अरुणोदय हो गया हो (रासो)।
यवनेश्वर #_सहाबुद्दीन__गौरी को जयचन्द्र ने कई बार रण में पछाड़ा (विद्यापति-पुरुष परीक्षा) ।
#_रम्भामञ्जरी में भी कहा गया है कि जयचन्द्र ने #_यवनों का नाश किया।
उत्तर भारत में उसका विशाल राज्य था। उसने अणहिलवाड़ा (गुजरात) के शासक सिद्धराज को हराया था। अपनी राज्य सीमा को उत्तर से लेकर दक्षिण में नर्मदा के तट तक बढ़ाया था।
पूर्व में बंगाल के लक्ष्मणसेन के राज्य को छूती थी।
तराईन के युद्ध में सन् 1192 में गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को परास्त कर दिया था। इसके परिणाम स्वरूप दिल्ली और अजमेर पर मुसलमानों का आधिपत्य हो गया था।
यहाँ का शासन प्रबन्ध गौरी ने अपने मुख्य सेनापति ऐबक को सौंप दिया और स्वयं अपने देश चला गया था।
तराईन के युद्ध के बाद भारत में मुसलमानों का स्थायी राज्य बना। ऐबक गौरी का प्रतिनिधि बनकर यहाँ से शासन चलाने लगा।
इस युद्ध के दो वर्ष बाद सन् 1194 में गौरी दुबारा विशाल सेना लेकर भारत को जीतने के लिए आया।
इस बार उसका कन्नौज जीतने का इरादा था। कन्नौज उस समय सम्पन्न राज्य था। गौरी ने उत्तर भारत में अपने विजित इलाके को सुरक्षित रखने के अभिप्राय से यह आक्रमण किया।
वह जानता था कि बिना शक्तिशाली कन्नौज राज्य को अधीन किए भारत में उसकी सत्ता कायम न रह सकेगी ।और 2 बार महाराजा जय चन्द्र जी से हार हुआ गौरी अपना बदला भी लेना चाहता था !
फिर तराईन के युद्ध के दो वर्ष बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने जयचन्द पर चढ़ाई की। सुल्तान शहाबुद्दीन रास्ते में पचास हजार सेना के साथ आ मिला। और दोनो सेनाये आपस मे मिल गई , मुस्लिम आक्रमण की सूचना मिलने पर जयचन्द जी भी अपनी सेना के साथ युद्धक्षेत्र में आ गये ।
दोनों के बीच इटावा के पास ‘चन्दावर नामक स्थान पर मुकाबला हुआ। युद्ध में राजा जयचन्द हाथी पर बैठकर सेना का संचालन करने लगे ।
इस युद्ध में जयचन्द की #_पूरी__सेना नहीं थी। सेनाएँ विभिन्न क्षेत्रों में थी, जयचन्द के पास उस समय थोड़ी सी सेना थी। महाराजा जय चन्द्र जी की और सेना सीमा पर टुकडी टुकडी रूप मे भ्रमण कर रही थी !
महाराजा जय चन्द्र जी की सेना बहुत कम होने पर भी भीषण संग्राम हुआ , महाराजा जय चन्द्र जी की सेना ने भीषण रक्तपात किया ! कि गौरी और ऐबक व उनके सैनिको के पसीने छूट गये !
गौरी की सारी सेना सहम गई और गौरी समझ मे युध्दनिती से लडते हुये महाराजा जय चन्द्र जी को नही हराया जा सकता !
अतः छल से किसी ने जयचन्द महाराज के #आॅख मे छिपकर एक तीर मार दिया , जिससे वह लडने मे असमर्थ हो गये और उनका प्राणान्त हो गया !!
युद्ध में गौरी की विजय हुई। यह युद्ध वि.सं. १२५० (ई.स. ११९४) को हुआ था।
जयचन्द पर देशद्रोही का आरोप लगाया जाता है। कहा जाता है कि उसने पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिए गौरी को भारत बुलाया और उसे सैनिक संहायता भी दी। वस्तुत: ये आरोप निराधार हैं। ऐसे कोई प्रमाण नहीं हैं जिससे पता लगे कि जयचन्द ने गौरी की सहायता की ईतिहासकारो का यह मत है कि संयोगिता प्रकरण में पृथ्वीराज और महाराजा जय चन्द्र जी के बीच हुये युध्द मे महाराजा जय चन्द्र जी के 20 सामंत / विशिष्ट योध्दा मारे गये थे !
जबकि पृथ्वी राज चौहान जी के मुख्य-मुख्य 40 सामंत / मुख्य सेनापति मारे जा चुके थे।
इन लोगों ने गुप्त रूप से गौरी को समाचार दिया कि पृथ्वीराज के प्रमुख सामन्त अब नहीं रहे, यही मौका है।
तब भी गौरी को विश्वास नहीं हुआ, उसने अपने दूत फकीरों के भेष में दिल्ली भेजे। ये लोग इन्हीं लोगों के पास गुप्त रूप से रहे थे। इन्होंने जाकर गौरी को सूचना दी, तब जाकर गौरी ने पृथ्वीराज पर आक्रमण किया था।
👉 #_ये__थे__गद्दार गौरी को भेद देने वाले 👇
1. नीतिराव खत्री ( सिन्धी )
2. प्रतापसिंह जैन ( पूँजीपति )
3. माधो भट्ट ( ब्राह्मण )
4. धर्मायन कायस्थ ( कायस्थ )
जो तँवरो के कवि (बंदीजन) और अधिकारी थे
( #पृथ्वीराज_रासो-उदयपुर संस्करण)।
किसी भी मुसलमान लेखक ने महाराजा जय चन्द्र जी का गौरी के मदद संबंधित कुछ भी नही लिखा है !!
इब्न नसीर कृत , कामिल उत तवारिख मे मैं स्पष्ट लिखा है कि महाराजा जयचंद्र जी ने पृथ्वीराज चौहान जी पर आक्रमण के लिए किसी भी प्रकार की सहायता नहीं किया था और ना ही शहाबुद्दीन गोरी को आमंत्रित किया था !!
महाराजा जयचन्द जी पर अय आरोप नितांत असत्य है !!
महाराजा जय चन्द्र जी उस समय भारत वर्ष के सबसे बडे राजा थे ! ऐसा मुस्लिम ईतिहासकारो ने स्वयं लिखा है !!
#_फरिश्ता के अनुसार महाराजा जय चन्द्र जी के पास सबसे बडी विशाल सेना थी !!
#_कामिलउत्तवारिख ने वर्णन किया है कि महाराजा जय चन्द्र जी महाराजा जय चन्द्र जी की सेना मे 700 हाथिया थी !!
#_ताजल-म-आथीर के अनुसार महाराजा जय चन्द्र जी की सेना बालुका कणों के अनुसार #___असंख्य थी !!
सुर्यप्रकाश लिखते है - महाराजा जय चन्द्र जी की सेना मे 80 हजार कवचधारी सैनिक , 3 लाख पैदल सेना , 2 लाख धनुर्धारी , 30 हजार अश्वारोही और बहुसंख्यक हाथी थी !!
इसके अलावा स्वयं पृथ्वी राज रासो के लेखक कवि चंदरवरदाई ने ही स्वयं महाराजा जय चन्द्र जी की #विशाल सेना का वर्णन किया !!
स्वयं पृथ्वी राज रासो मे चंदरवरदाई ने महाराजा जय चन्द्र जी को " दल पंगुल" कहा है !!
अर्थात जिसकी सेनाये हमेशा विचरण करती रहती थी !!
कुछ ईतिहासकारो ने तो हजारो हाथीओ और लाखो घोडो का भी वर्णन किया है इतनी विशाल सेना होने के कारण ही महाराजा जयचन्द जी को " #_दल_पंगुल" की उपाधि मिली थी !!
राज शेखर सूरी ने अपने प्रबंधकोश मे कहा है कि काशीराज जय चंद्र विजेता थे ,और गंगा यमुना दोआब तो उनका विशेष रूप से अधिकृत प्रदेश था !
नयनचंद्र ने रंभामंजरी मे महाराजा जय चन्द्र जी को यौवनो का नाशक और विशाल सेना का संचालक लिखा है !!
उन्होने लिखा कि महाराजा जयचंद युध्दप्रिय होने के कारण अपनी सैन्य शक्ति ऐसी बढाई की वह #_अद्वितीय हो गई !! जिस कारण से महाराजा जय चन्द्र जी को "दल पंगुल" उपाधि से जाना जाने लगा !!
विद्यापति जी अपने "पुरूष -परिक्षा" लिखते है कि महाराजा जय चन्द्र जी उसी मोहम्मद गौरी को कई बार हराया थे !!
#_रम्भामंजरी मे भी महाराजा जय चन्द्र जी के विशाल सेना और विशाल राज्य का उल्लेख है !!
काशीराज महाराज जयचंद के यश को कम करने व कुछ देश द्रोहीयों के नाम छुपाने के लिये षड्यंत्र के तहत जयचन्द जी का नाम बदनाम किया गया ।।
निम्नलिखित इतिहासकारों ने ऐतिहासिक ग्रन्थों व सभी लेखकों को पढ़ने के बाद महाराज जयन्द जी पर अपनी राय दि है ।।
डा. आर. सी. मजूमदार का मत है कि इस कथन में कोई सत्यता नहीं है कि महाराज जयचन्द ने पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिये मुहम्मद गौरी को आमंत्रित किया हो ( एन्सेंट इण्डिया पृ. 336 डाँ. R.C. मजूमदार ) । अपनी एक अन्य पुस्तक में इन्हीं विद्वान इतिहासकार ने निमंत्रण की बात का खण्डन किया है ।।
J. C. पोवल प्राइस महोदय का मत है कि यह बात आधारहीन है कि महाराज जयचन्द ने मोहम्मद गौरी को पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिये आमंत्रित किया । ( हिस्ट्री आफ इण्डिया ) ।
डा. रामशंकर त्रिपाठी का कथन है कि जयचन्द पर यह आरोप गलत है । उन्होंने माना है कि समकालीन मुसलमान इतिहासकार इस बात पर पूर्णतया मौन है कि जयचन्द ने ऐसा कोई निमंत्रण भेजा हो ।
श्री महेन्द्रनाथ मिश्र जो कि एक अच्छे इतिहासकार है ने जयचन्द के विरुद्ध देश-द्रोहीता के आरोप को असत्य माना है । उनका कथन है कि यह धारणा कि मुसलमानों को पृथ्वीराज पर चढाई करने के लिये आमंत्रित किया निराधार हे । उस समय के कपितय ग्रन्थ प्राप्य है किन्तु किसी में भी इन बातों का उल्लेख नहीं है । वे ग्रन्थ पृथ्वीराज-विजय, हम्मीर महाकाव्य, रम्भा- मन्जरी तथा प्रबन्ध-कोश किसी भी मुसलमान यात्री ने इसका जिक्र नहीं किया है । इतिहास साक्षी है कि जयचन्द ने चन्दावर में मोहम्मद गौरी से शौर्यपूर्ण युद्ध किया था ।
इब्न नसीर कृत "कामिल-उत्-तवारीख" में भी स्पष्ट कहा गया है कि, यह बात नितान्त असत्य है कि जयचन्द ने शाहबुद्दीन को पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिये आमंत्रित किया । शहाबुद्दीन अच्छी तराह जानता था कि जब तक उतर भारत के महाशक्तिशाली जयचन्द को परास्त न किया जाएगा तब तक उसका दिल्ली और अजमेर आदि भू-भाग पर किया गया अधिकार स्थाई न होगा क्योंकि जयचन्द के पूर्वजों ने और स्वयं जयचन्द ने तुर्कों से अनेकों बार मोर्चा लेकर हराया था ।
स्मिथ महोदय ने अपने ग्रन्थ अर्ली हिस्ट्री आफ इण्डिया में इस आरोप का उल्लेख नहीं किया है । पृथ्वीराज की तराईन के दुसरे युद्ध में हुई पराजय का दोष जयचन्द पर नहीं लगाया है ।
डा. राजबली पाण्डे ने अपनी पुस्तक प्राचीन भारत टिप्पणी में लिखा है "यह विश्वास कि गौरी को जयचन्द ने पृथ्वीराज के विरुद्ध निमन्त्रण दिया था,(डा. त्रिपाठी के अनुसार ) ठिक नही जान पङता क्योंकि मुसलमान लेखकों ने कहीं भी इसका जिक्र नहीं किया है ।
हिस्ट्री आफ कन्नौज- डा. त्रिपाठी । इसका अर्थ यह है कि डा. पाण्डे ने डा. त्रिपाठी के कथन को सत्य माना है । वे पूर्णतः सहमत है क्योंकि उन्होंने प्रतिवाद नहीं किया ।
अगर किसी भी सनातनी को किसी भी प्रकार की शंका हो महाराजा जय चन्द्र जी के गौरवमयी ईतिहास पर तो वो सुनी सुनाई काल्पनिक कहानीया से बाहर आकर इनमें से किसी भी किताब का अध्ययन कर सच्चाई से अवगत हो जाये !!
कई सारे ईतिहासकारो ने पूरे तथ्यों सहित यह कहा है कि महाराजा
#जय_चन्द्र जी एक #धर्मपरायण देशभक्त महाराजा थे , उनके ऊपर लगे आरोपों का कोई आधार नही है , यह आरोप निराधार है !
उन ईतिहासकारो के नाम किताब का नाम पृष्ठ संख्या सहित प्रमाण के तौर पर -
1 - नयचन्द्र : रम्भामंजरी की प्रस्तावना !!
2 - Indian Antiquary, XI, (1886 A.D.), Page 6,
श्लोक 13-14 !!
3 - #भविष्यपुराण, प्रतिसर्ग पर्व, अध्याय 6 !!
4 - Dr. R. S. Tripathi : History of Kannauj,
Page 326 !!
5 - Dr. Roma Niyogi : History of Gaharwal
Dynasty, Page 107 !!
6 - J. H. Gense : History of India (1954 A.D.),
Page 102 !!
7 - John Briggs : Rise of the Mohomeden
Power in India (Tarikh-a-Farishta),
Vol. I, Page 170 !!
8 - डॉ. रामकुमार दीक्षित एवं कृष्णदत्त वाजपेयी :
कन्नौज, पृ. 15 !!
9 - Dr. R. C. Majumdar : Ancient Indian, Page
336 एवं An Advanced History of India,
Page 278 !!
10 - Dr. Roma Niyogi : History of Gaharwal
Dynasty, Page 112 !
11 - J. C. Powell-Price : History of India,
Page 114 !!
12 - Vincent Arthur Smith : Early History of
India, Page 403 !!
13 - डॉ. आनन्दस्वरूप मिश्र : कन्नौज का इतिहास,
पृ. 519-555 !!
14 - डाॅ. आनन्द शर्मा : अमृत पुत्र, पृ. viii-xii !!
15 - डाॅ. आनन्द शर्मा : अमृत पुत्र, पृ. xi !!
_नोट : राजा जयचंद गद्दार नहीं, निर्दोष थे,
और एक प्रतापी न्यायप्रिय धर्म परायण राजा थे ! वे दुष्प्रचार के शिकार हुये 👈
इन सभी प्रमाणो के आधार पर कोई भी सत्य से अवगत हो सकता है कि बिना छल से महाराजा जय चन्द्र जी को हराना मुश्किल है !!
यौवनो के नाशक और मोहम्मद शहाबुद्दीन गौरी विजेता महाराजा जय चन्द्र जी जय 🙏🚩
जय हो कन्नौज नरेश जयचंद जी की.....
#नोट - इस लेख को सभी सनातनी बंधु जमकर Copy, Paste और Share करें। नेहरू मैकाले शिक्षा पद्धति के समर्थकों को करारा जवाब है ये लेख।
स्वाध्याय करने से और भी ऐतिहासिक प्रमाण मोजुद हैं, मिल जाएगा पढीए
..
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