अशास्त्रीय मंदिर मान्य नहीं है

 #कलियुग की वर्तमान स्थिति में #नूतन_मंदिरों की आवश्यकता क्यूँ नहीं ? पूरा विवरण पढैं..


(१) भारतवर्ष में इतने पुराने मंदिरों हैं कि जिसका पुनरोद्धार कर वैदिक अनुशासन से संचालित करने की आवश्यकता हैं | 

(२) वर्तमान में किस वर्ण के व्यक्ति को कौनसे देवताओं की प्राणप्रतिष्ठा करनी चाहिये इनके अधिकारी कौन हैं यह बिना जाने ही प्रतिष्ठाएँ होती हैं | 

(३)मंदिरों की स्थापत्य कला जाननें वाले विश्वकर्मा के वंशज की संख्या कम और अपने नित्यकर्मों से च्युत हैं | सोमपुरा शिल्पी की जगह किसी भी वर्ण के कारीगर मानहिन और शल्यदोष पूर्ण मंदिरों की रचना करतें दिख रहैं हैं जिसमें न उपयोग में लिए जाने वाले शल्य विधिहिन निर्मित ईंट, बिना शिल्पशास्त्र से चकासे पत्थर, रेती, लोहा आदि का उपयोग होता हैं | 

(४) महत्वपूर्ण निर्माण से पहिले  भूमिशोधन के लिए उपयुक्त भूमि भी नहीं देखतें जहाँ जिन्हों ने बताया वहाँ बिना भूमिपरिक्षण किए भूमिग्रहण करकें |भूमिपूजन(खात मुर्हूत) जूठे दूर्मुर्हूतों में फूरसत के दिन में होतें हैं, शिलान्यास से पूर्व शल्यशोधन अनुचित हो रहैं हैं | न कोई क्षेत्रफल की आयव्यय देखता हैं कि न भूशुद्धि के लिए अनिवार्य गोबर-गोमूत्र व भूमिपर गौनिवेशन हो रहा हैं | शिलान्यास के मूर्हुतों में भी व्यवधान उत्पन्न कर दिए जातें हैं | (भूमिपूजन(खात) व शिलान्यास में भी कोई कोई ब्राह्मण ताँबे के कलश और  लोहा आदि पञ्चधातु को जमीन में गाड़ देतें हैं जो शल्य में गिने जातें हैं | स्तंभमुहूर्त की आवश्यकता भी नहीं रखतें | आगे मोभ रखने के मुर्हूत, देहली रखने के मुर्हूत, द्वार रखने के मुर्हूतों पर ध्यान नहीं दिया जाता | #आचार्य द्वारा शिल्पि की निर्मित प्रतिमाओं के लक्षण, प्रतिमा के लिए हुए पत्थर के लक्षणों पर ध्यान नहीं दिया जाता | मानहिन द्वार भी कही कहीं बनायें जातें हैं | देवतास्थापन के लिए भूगृह की योग्य विथियों पर ध्यान केन्द्रित नहीं होतें | और तो और पर ये लोभी #ब्राह्मणों जो अनुचित देवतावर्ग में न आने वालें #साधु_संत_महात्माओं की मूर्तिओं की प्रतिष्ठा का समर्थन करतें हैं ये ग्राहक-अपेक्षितपूर्ति करनेवालें #शिल्पीओं भी कम नहीं, #पुराने_शिल्पशास्त्रों के ग्रन्थों में जो जो देवतादि का वर्णन साङ्गोपाङ्ग न मिलता हो उन उन संत आदि की प्रतिमाएँ भी निर्माण कर देतें हैं | करैगे ही न सभी ने धर्म को बेच खाया हैं,यश=प्रतिष्ठा पाने(× <--- यह शब्द अन्ततः याद रखें इनका मूल्यांकन बाद में करैंगे)मंदिरो से पैसे एँठने के लिए धूर्त यजमानों की माँग अनुसार संत आदि की  प्रतिमाओं की लोभ से छूट पहले #ब्राह्मण ने दी,बाद में #शिल्पी ने भी अपना धर्म छोड़ा कह नहीं सकतें थे  ये लोग ? कि ऐसा किसी भी #शिल्पग्रन्थों_में #संत_आदि_प्रतिमाओं_का_विवरण_नहीं हैं | किसी काल में उत्तम शास्त्रसम्मत शिल्पीयों के हाथ नीचे तैयार होने वाले छैनी चलानेवालों ने धीरे धीरे सिर्फ शरीरधारी आकारों के निर्माण कार्य को #बिना_शिल्पशास्त्र पढैं. सिख लिया और यही आगे जाकर वर्तमान में ऐसी अनुचित मूर्तियाँ बनाने में माहिर हो गयें | इनका लाभ #धूर्तों ने उठा लिया जो मन चाहे बनवा लो कल गाँधीजी, मोदिजी, बच्चन आदि के मंदिर बन जाय तो इसमें नविनता की कोई गुंजाईश नहीं |

(५) मंदिर तैयार हो जाने के बाद वर्तमान में प्रतिष्ठा के मुर्हूत भी जूठे निकलतें हैं ->( १ प्रतिष्ठा के प्रारंभ दिन में अग्निवास का दिन, २ प्रासाद वास्तु के मुर्हूत --> किसी किसी मास में नहीं भी होतें तो मंदिरनिर्माण के बाद जिस मास में वृषवास्तु की गिनति हो सकें उसी दिन करना चाहिये इसे भी अवगण्य करते हैं , ३ कलशचक्र प्रवेश के लिए -- ये भी कितनी बार तो कलशचक्र व चन्द्रमावास वामार्क आदि वास्तुशास्त्र सूचक मुर्हूतकाल को निकाले हुए प्रतिष्ठा के दिनों में अवगण्य किए जातें हैं | कहीं कहीं तो मुख्य देवता को स्थिरकर प्रतिष्ठा के मुर्हूतलग्नों के समय चूक जातें हैं अथवा अवगण्य किए जातें हैं |

(६)आचार्य-वरणीय ब्राह्मण व यजमान के लिए उचित हैं कि -> केवल द्विजों को वर्णानुसार प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा करवाने के अधिकारी कहैं हैं | अतः अनुपवीतीयों जिनके कालक्रम से उपनयन संस्कार न हुए हैं वह व्रात्यों को स्मृतियाँदि शास्त्रों में अयाज्यों कहैं हैं जिसको वैदिक कर्म करवाने से #अयाज्ययाजन का दोष लगता ही हैं |ये द्विज बाह्य ही मानें जातें हैं क्योंकि यथार्थ उपनयन-संस्कार से ही द्विजत्व सिद्ध होता हैं |  अधिकारी  द्विज द्वारा अनिवार्य नित्यकर्मों सन्ध्योपासनादि को यथावत् करतें हुए होने चाहिए - तीन ही दिनों यदि द्विज सन्ध्योपासना नहीं करतें तो वे शूद्रत्व को प्राप्त होतें हैं इन्हें द्विजत्व में पुनः प्रवेश करवाने के लिए प्रायश्चित्त पूर्वक पुनरुपनयन होना अनिवार्य हैं  | पुनरुपनयनाधिकारीयों जैसे  लहसुन,प्याज,गाजर,मशरुम, सलगम आदि को खानेवाला मदिरादि अपेयों को ग्राह्य न करने वाला होना चाहिये ऐसे पतितों का भी शास्त्रों में प्रायश्चित्त पूर्वक सम्पूर्ण विधान से पुनरुपनयन कहा हैं | ये सब अनधिकारी ही हैं |

किसी किसी पंडित का मानना हैं कि #देहशुद्धिप्रायश्चित्त कर्म करकें द्विजों(कालक्रम से उपवीती हो)को अधिकार दिये जातें हैं,परंतु यह भी विधान कहीं कहीं निरर्थक ही दिखाई देता हैं प्रायश्चित्त के व्रतों और प्रत्याम्नायों का यथाविधि शरणागति से कोई पालन नहीं कर रहैं है जहाँ देखों वहाँ बस जल रखकर संकल्पपूर्ति करो; लेकिन संकल्प की पूर्ति तो तब होगी जब शास्त्रावश्यक अनिवार्य प्रायश्चित्तोदिष्ट कर्म व्रत-प्रत्याम्नायादि का कथन यथायोग्य जानकर क्रियान्वित हो  |


किसी किसी ग्रन्थों में यजमान के #प्रतिनिधिवरण विधान बताया हैं यह भी #शास्त्रोचित_नहीं क्योंकि - प्रथम तो सूतकादि संकट अवस्थाओं में उचित-मुर्हूत का त्याग न हो इसलिये ही प्रतिनिधि-ब्राह्मण का वरण होता हैं ।शास्त्रों में एकयजमान-साध्य कर्म ही मान्य किये हुए हैं | बहुधा यजमान जिसमें व्रात्य-पतित आदि का समावेश होगा वह तो पङ्क्तिपावन द्विज रहैंगे ही नहीं, और अधिकारी प्रतिनिधिब्राह्मण का वरण करने के बाद भी अनधिकारी व्रात्य आदि की आवश्यकता ही नहीं रहती। सामूहिक-यजन में अयाज्ययाजन का दोष रहता हैं | प्रतिष्ठा में प्रतिमाओं को लाने-जाने और स्थापित करने में स्थपति,शिल्पी ब्राह्मण,यजमान आदि  कालक्रम से प्राप्त उपवीती द्विजों जो पतित न हो उनकी ही आवश्यकता मानी गईं हैं | अनुपवीतीयों,व्रात्यों और नित्यकर्मच्युतों की नहीं | आज वर्तमान युग में कहीं कहीं आचार्यादि ब्राह्मणगण भी नित्यसन्ध्योपासनादि रहित व अभक्ष्याभक्षण तथा न पीने की चीजे पीएँ जा रहैं हैं जिस दोषों के कारण वह शूद्रत्वको प्राप्त होतें हैं जहाँ तक इन्हों की प्रायश्चित्त द्वारा शुद्धि और पुनरुपनय विधान से कर के द्विज में सम्मिलित नहीं किएँ जाते तबतक यह सभी यजमान समेत अनधिकारी ही हैं |

(७) वर्तमान में मंदिरों में आवश्यक वर्णाश्रम का पालन नहीं हो रहा हैं पतितों द्वारा प्रवेश,प्रतिमाओं का स्पर्श पूजन आदि हो रहा हैं |

(८ अ ) जिस पातकी द्विजों के पाप से समस्तेन्द्रियों सहित शरीर के प्राणकोष ही मलिन हो तो विचार करें कि यह तो मंदिरों में किए जाने वाली सनातन संस्कृति की अक्क्षुण्णता का रक्षण करने वाली देवप्रतिमाओं के विग्रह में कैसे प्राणोर्ज्जा का सन्निधापन होगा ?  

जिस मंदिरों के गर्भगृहों में देवताओं की शुभ ऊर्जायें एकत्रित होकर भक्तजनों को विशुद्ध कर भगवद्रूपता दे रही थी वहाँ आज  ऐसे दूषित दोषों के कारण ऐसे मंदिरों में ही विविध षड्यंत्रीयों द्वारा पापाचार का केन्द्र बनते जा रहैं हैं |

(ब) मंदिरों में नित्य अर्चन के लिए भी नित्यकर्मप्रवृत्त, सदाचारी,निर्लोभी ,भक्ष्याऽभक्ष्यादि में विवेक रखनेवाले तथा जो जो देवता-विग्रह स्थापित हैं उनकी पूजा पटल विधानों को आचार्यद्वारा शिक्षित हो ऐसा ब्राह्मण होना चाहिये यह भी अवगण्य हो रहा हैं |

(९) सब से अहम बात यह हैं कि मंदिर निर्माण और प्रतिष्ठा होने के बाद मंदिरों का शास्त्रसम्मत परिपालन,अनुशासन और मानसिक-आर्थिक व शरीरशक्ति अनुसार  संरक्षण की जवाबदारी निभाने की होती हैं वहाँ कहीं कहीं यह भी व्यवस्था कलंकित रहती हैं और तो और किसी किसी मंदिरों में तो बिना कारण बिना खंडित हुए आदि अनुचित दुर्लक्ष्यों से प्रतिवर्ष या वारंवार पुनःप्रतिष्ठाएँ करतें रहतें हैं क्यों ? समाज से इस पुनःप्रतिष्ठामहोत्सव नाम से पैसे एँठ़ने के लिए |

(१०) शास्त्रों में अनुचित विधान और परिपालन के दोषपूर्ण नूतन-मंदिरों बाँधने की आवश्यकता के जगह आज ८० से ज्यादा वर्षों पुराने संस्कृति के धरोहर पुराने मंदिरों का नवनिर्माण करकें खंडित प्रतिमाओं का जिर्णोद्धार कर विसर्जन के बाद अधिकारीयों द्वारा पुनःप्राणप्रतिष्ठा करवाने की आवश्यकता अधिक  हैं और उनका फल नयें मंदिरो से कईं गुने अधिक फल हैं आदि......

वर्तमान में पू,पाद विश्व वंदनीय जगन्नाथ-पुरी #शंकराचार्य #निश्चलानंदसरस्वतीजी जैसे वैदिकसंस्कृति संरक्षण पक्षधर  शंकराचार्य-पीठाधिकारी के मार्गदर्शन व देख रेख में ही मंदिरों का परिपालन व्यवस्था आवश्यक हो यह महत्त्वपूर्ण हैं |


हम तो दूरी बनाये रखतें हैं ऐसे अनुचित विधानों से ..


धर्म की जय हो ! 

अधर्म का नाश हो !

प्राणियों में सद्भावना हो !

विश्व का कल्याण हो !

नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव !!

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