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ज्योतिषीय समाधान

आप अपनी जन्मकुंडली का विश्लेषण करवाना चाहते हैं, ज्योतिषीय प्रश्नो का उत्तर चाहते हैं, अपनी समस्याओं का समाधान चाहते हैं, रत्न धारण कराना चाहते हैं, ग्रहो की शांति, जाप अनुष्ठान कराना चाहते हैं या किसी भी प्रकार के शुभ मूहूर्त की जानकारी चाहते हैं तो आचार्य जी को संदेश भेजकर प्रत्युत्तर की प्रतिक्षा करके मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं  नारायण  

सूर्य संबंधित कार्य

 सरकारी नौकरी , सरकारी सेवा , उच्च स्तरीय प्रशासनिक सेवा , मजिस्ट्रेट , राजनीति , सार्वजनिक क्षेत्र में सोने का काम करने वाले , जौहरी, स्वर्ण विक्रय, फाईनान्सर , प्रबन्धक , , राजदूत , चिकित्सक (फिजिशियन), दवाइयों से संबंधी मैनेजमेंट ,  उपदेशक , मंत्र कार्य , फल विक्रेता (Astrology) , वस्त्र , घास फूस ( नारियल रेशा ,चटाई, बांस तृण आदि ) से निर्मित सामाग्री , तांबा , स्वर्ण, माणिक , सींग या हड्डी के बने समान,डेयरी फार्मिंग या बागवानी/खेती बाड़ी,चामर आदि निर्माण छाता आदि से, सूचनाओं के आदान प्रदान से जीविका (जैसे सट्टा लाटरी के अंक, विशिष्ट गोपनीय सूचना देकर , पुलिस आदि में खबरिया, ) धन विनियोग (पैसा  जमा करके या करवाकर उच्च लाभ कमाना) बीमा एजेंट , सरकारी मुखबीर , गेहूं से संबंधी ,विदेश सेवा , उड्डयन , ओषधि विक्रय, निर्माण या प्रयोग, चिकित्सा , प्रेत कार्य (शवदाह, मृतक संस्कार,बाधा निवारण) दुष्कर्म, यात्रा या विवाह,सभी प्रकार के लाल रंग के अनाज , लाल रंग के पदार्थ , शहद , लकड़ी व प्लाई वुड का कार्य , चतुर्थ से संबंध बनाकर इमारत बनाने मे काम आने वाला लकड़ी , सर्राफा , वानिकी ...

कर्णवेध संस्कार

चूडाकरणम् कर्णवेध श्री:।। सांवत्सरिकस्य चूडाकरणम् ≈> १ वर्ष पूर्ण होने के बाद बालक का मुण्डन करावे // तृतीये वाऽप्रतिहिते ।। तीसरा वर्ष पूर्ण होने के बाद चूड़ाकर्म करना चाहिए ≈ आजकल न तो वैदिक परंपरा मिलती है न तो कुल परंपरा न तो कुल गुरु का भी कोइ अता-पता होता है इसलिए अपने कुल परंपरा के अनुसार शास्त्र संमत सभी संस्कार करने चाहिए, इस संस्कार से पूर्व तीन सदाचारी ब्राह्मण को भोजन कराने की भी विधि है। बालक के जन्मनक्षत्र से ताराबल चन्द बल आदि देखकर शुभ योग में चूड़ा कर्म करें - अन्य जो भी चूड़ा कर्म के प्रमाण है वे सभी गौणकाल के है एसे गौणकाल में चूड़ाकर्म नहीं करना चाहिए - ≈» *कर्णवेध संस्कार* का सभी गृह्य सूत्रकारों ने विस्तार से उल्लेख नहीं किया है, किन्तु हमारे देश के परिवारों में प्रचलित है। बच्चे की प्रथम सालगिरह-अव्दपूर्ति होने पर *चूडाकर्म के साथ उसी दिन अच्छी लग्न देखकर बच्चे का कर्णवेध करते है* वस्त्र-आभूषण आदि से अलंकृत कर माता अपनी गोद में बैठा लेती है। गाँव के स्वर्णकार या वैद्य को बुलाकर स्वर्ण की शलाका से दाहिने कान को पहले और बाँयें कान को बाद में वेधकर शलाका को मोड...

ग्रहरत्न धारण विधि

 ग्रहो के वास्तविक रत्न ही धारण करें उपरत्न या वैकल्पिक नहीं -  ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों के अरिष्ट शान्ति के लिए अथवा निर्बल ग्रह को बल प्रदान करने के लिए रत्न धारण करने की व्यवस्था की गई है। । रत्न धारण करने से पूर्व रत्नों के पूजन करने का विधान है क्योंकि रत्न खान से निकलने पर उन्हें धारण योग्य बनाने के लिए संघर्षण, संघटन इत्यादि प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है जिससे उनका प्राकृतिक गुण मन्द हो जाता है अतः विधि पूर्वक पूजन करने से वे जागृत एवं पूर्ण शक्तिमान हो जाते हैं। प्रधान रूप से नवग्रहों के नव रत्न ही होते हैं यथा सूर्य का माणिक्य, चन्द्रमा का मोती, मंगल का मूंगा, बुध का पन्ना, बृहस्पति का पुखराज, शुक्र का हीरा, शनि का नीलम्, राहु का गोमेद तथा केतु का लहसुनिया- ये प्रधान रत्न होने से अधिक प्रभावशाली किन्तु मंहगे होते हैं जो इन्हें क्रय करने में समर्थ नहीं हैं वे इनके उपरत्नों को धारण कर संतोष मान सकते हैं लेकिन यह शास्त्र संमत नहीं विकल्प में रुद्राक्ष आदि भले ही धारण करें जिनका मूल्य कम होता है जबकि गुणवत्ता भार में अधिक लेकर धारण करने से तद्वत् ही फल देते हैं। उक्त स...

भूत प्रेत

 :( भूत) -प्रेत और आत्माओं के विभिन्न प्रकार- 1.भूत :- सामान्य भूत जिसके बारे में आप अक्सर सुनते है । 2.प्रेत :- परिवार के सताए हुए बिना क्रियाकर्म के मरे हुए आदमी,जो पिडीत रहेते है। 3.हाडल :- बिना नुक्सान पहुचाये प्रेतबाधित करने वाली आत्माए । 4.चेतकिन :- चुडेले जो लोगो को प्रेतबाधित कर दुर्घटनाए करवाती है । 5.मुमिई :- मुंबई के कुछ घरो में प्रचलित प्रेत,जो कभी कभी दिखाई देते है। 6.विरिकस:- घने लाल कोहरे में छिपी और अजीबो-गरीब आवाजे निकलने वाला होता है। 7.मोहिनी या परेतिन : -प्यार में धोका खाने वाली आत्माए जिनसे मनुष्यों को मदत मिल सकती है। 8.शाकिनी:- शादी के कुछ दिनों बाद दुर्घटना से मरने वाली औरत की आत्मा जो कम खतरनाक होती है। 9.डाकिनी :- मोहिनी और शाकिनी का मिला जुला रूप किन्ही कारणों से हुई मौत से बनी आत्मा होती है। 10.कुट्टी चेतन :- बच्चे की आत्मा जिसपर तांत्रिको का नियंत्रण होता है । 11.ब्रह्मोदोइत्यास :- बंगाल में प्रचलित,श्रापित ब्राह्मणों की आत्माए,जिन्होने धर्म का पालन ना किया हो । 12.सकोंधोकतास :- बंगाल में प्रचलित रेल दुर्घटना में मरे लोगो की सर कटी आत्माए होती है। 13.न...

कन्यादान का शास्त्रसंमत समयावधि

 गृहस्थीओ की कन्या संतान रजोदर्शन को प्राप्त होते ही पिता को पनोती बैठ जाती है।  जब उसका विवाह होता है तो वो पनौती पति को बैठ जाती है -- एसा कुछ शनि से भी दृष्टिगोचर होता है -- और रजोदर्शन होते ही सुपात्र को कन्यादान न होने के कारण पिता को भ्रूणहत्या ब्रह्महत्या का पाप लगता है यह भी कारण होता है --  पनौती भी तीन प्रकार की होती है शुभ फलदायक पनौती- मध्यम फलदाई और अनिष्ट फलदाई/ अति अनिष्टकारी पनौती होती है - पुत्री के रजोदर्शन से १२ वर्ष की पनौती शुभकारी - १२ से १६/१८/१९ (वर्तमान मे जो मनघडंत विवाह योग्य समयावधि है १८/१९ ) वर्ष तक की पनौती मध्यम फलप्रद और पुत्री के १६ वर्ष की आयु के बाद कठीन प्रायश्चित के कारण पिता पर अनिष्टकारी पनौती सिद्ध होती है - इसका प्रायश्चित्त न होने के कारण दिन प्रतिदिन अत्यंत अनिष्टकारी पनौती सिद्ध होती है --  पति यदि अपने स्वधर्मपालन से विमुख हो द्विज होने पर वैदिक धर्म से विमुख हो तो पति के लिए भी यह पनोति मध्यम या अनिष्टकारी होती है - मूलतः सिद्धांत यह है कि इहलोक और परलोक के कल्याण के लिए विवाह के बाद संभवतः विधि विधान का पालन करके अपने ग...

भस्म धारण की महीमा

 शिवपुराण विद्येश्वर संहिता २४/४०-४१ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः         शूद्राश्चापि च सङ्कराः | स्त्रियोऽथ विधवा बालाः         प्राप्ता पाखण्डिकास्तथा ॥  ब्रह्मचारी गृही वन्यः      संन्यासी वा व्रती तथा।  नार्यो भस्मत्रिपुण्ड्राङ्का        मुक्ता एव न संशयः ॥ तत्रैव ५१ - स्त्रीभिस्त्रिपुण्ड्रमलकावधि धारणीयं       भस्म द्विजादिभिरथो विधवाभिरेवम्।  तद्वत्सदाश्रमवतां विशदा विभूतिर्             धार्यापवर्गफलदा सकलाघहन्त्री ।। Narendra Goswami  ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र संकर  सधवास्त्री विधवा बालक बालिकाएं पाखंडी ब्रह्मचारी गृहस्थी वानप्रस्थी संन्यासी व्रती स्त्रीयाँ - ये भी भस्मत्रिपुण्ड्राङ्का धारण करे तो ये भी निःसंशय  मुक्त हो जाते हैं। सौभाग्यवती तथा विधवास्त्रीयों को भी सम्पूर्ण माथे पर त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये, इसी प्रकार सभी आश्रम वालों को विभूति भी धारण करना चाहिये, क्योंकि यह पापों को दूरकर मोक्ष को...