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Showing posts from April, 2024

वर्णसंकरो की पहचान

 ~~*#वर्णसंकरों की पहचान और इनके लक्षण*# - ।।  ● ये नेताओं के भक्त होते है लेकिन प्रभु के नही प्रभु का केवल नाम प्रयोग करते है अपने स्वार्थ हेतु  ● ये नेताओं की सुनते है पर शंकराचार्य जी सन्तों और ब्राह्मणों की नही ।  ●ये धर्म की बात तो करते है पर शास्त्रों के अनुसार नही  ● ये राष्ट्र की बात तो करते है पर नीति अनुसार नही करते ● ये खुद वर्णसंकर है इसी कारण ये वर्ण व्यवस्था कभी नही मानते धर्म के मूल वर्ण को मानने से मना कर देते है  ● भक्ष्य अभक्ष्य शौचाचार इनके घरों में कुछ नही मिलेगा कहीं भी जाकर कुछ भी ठूस लेना और फिर स्वयं को धार्मिक और राम भक्त दिखाना ये दिखावा इनके अंदर कूट कूट के भरा रहता है  ● जप तप साधना से इनका दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नही होता क्योंकि ये पहले ही वर्णसंकर है तो न तो ऐसो का कोई गुरु हो सकता है न ही शास्त्र को समझने और उस अनुसार चलने की बुद्धि इनमें होती इसीलिए ये आजीवन केवल मनमाने ढंग और मनमानी सोच से चलकर समाज को और अपने जैसे वर्णसंकरों को भटकाने में अहम भूमिका निभाते है  ● जात पात वर्ण व्यवस्था सबको झूठ कहकर ये लोग किसी के स...

मोतीचूर के लड्डु का भोग

 आज हनुमान जयंती है और सभी जगह भोग लगाते होगे लेकिन क्या यह मान्य है?  अधिकांश हमने सभी हनुमानजी के मंदिरो मे मोतीचूर के लड्डु का भोग लगाते देखा हे भक्तो को इस विषय मे शास्त्रो का क्या मार्गदर्शन है ? 👉 हनुमानजी को मोतीचूर के लड्डू का भोग कौन नहीं लगा सकतें ?  १ शूद्र एवं सभी संकर जातियाँ  २ अनुपनीत  ३ व्रात्य  ४ परशाखा में जिनका उपनयन हुआ हो वे शाखारण्ड तथा  ५ उपनीत होनेपर भी जो लोग नित्यक्रियाहीन हैं एवं  ६ जो पुनरुपनयन निमित्त दोषो से द्विजत्वभ्रष्ट हैं  ७ जिनके घर शौचाचार का उचित संख्या में पालन नहीं होता  ८ जिनके घर में सूतिका रजस्वला पतित आदि के स्पर्श अंतरालसंसर्ग निमित्त सचैल स्नानादि शुचिता का पालन न हो  ९ समस्त पालन होनेपर भी जिन द्विजों के घर बलिवैश्वदेव न करते हो   १० कुण्ड  ११ गोलक  १२ समानगोत्रप्रवरगण में जिनके माता पिता का विवाह हुआ हो वह संतान  १३ विदेशयात्री एवं पतित  १४आरुढपतितापत्य(संन्यासी की उत्पन्न संतान) -  १५ बाजार से खरीदा हुआ क्रियाहीन ये समस्त निमित्त जलक्षाराग्निसंयोग...

विवाह योग्य निर्णय

 विवाह निमित्त जानकारी -:-  शास्त्रवादी हिंदु सज्जनो ध्यान रखे -- विवाह मे सर्वप्रथम शास्त्रज्ञ विप्र/ब्राह्मण से परिक्षण अवश्य करवाना चाहिए  कलियुग मे असवर्णविवाह -अनुलोम-प्रतिलोम आदि सभी निषिद्ध विवाह से निंदनीय प्रजाति उत्पन्न होती है। कन्यादान रजस्वला होने से पूर्व करना चाहिए अन्यथा प्रायश्चित पूर्वक कन्यादान करना चाहिए -  ब्राह्मण वो ही है जिसके उदर मे वेद है-नित्यसंध्या अग्न्युपासना -देव पितृ कर्म करता हो - जो गुरु परंपरा से वेद नही पढा वो भी अमान्य है - इसके अतिरिक्त ---->>>सभी शूद्र या तो पतित होते हैं वो ब्राह्मण होते ही नही वो मात्र नामधारी ब्राह्मण होते हैं इनमे ब्राह्मणत्व नही होता -- सभी वर्णो को और मनुष्यो को अपनी ही जाति मे विवाह करना चाहिए -  ब्राह्मण - ब्राह्मणी कन्या  क्षत्रिय - क्षत्रिय कन्या वैश्य - वैश्य की कन्या शूद्र - शूद्रा कन्या  वर्णसंकर - वर्णसंकरी कुंडक - कुंडकी  गोलक - गोलकी चांडाल - चांडाली श्वपाक- श्वपाकी स्वजाति- स्वजाति  अगर कोइ ब्राह्मण- क्षत्रिय -वैश्य और शूद्र चारो युगो मे निषिद्ध समुद्रपार यात्रा...

देवलक विशेष

 किन देवलको को कर्मकांड आदि विधि और प्रतिग्रह का अधिकार नही रहता ? अधिकार को कैसे सुरक्षित रखे ? इनको विशेष प्रायश्चित करते करते अधिकार को सुरक्षित रखा जा सकता है।जिनके पास अधिकार ही नही उनके लिए तो पहले अधिकार की प्राप्ति जरूरी है- #देवलक अर्थात् #देवमन्दिरका_पुजारी  'अपरार्क'  स्मृति वचन उद्धृत कर *देवलक* की परिभाषा दी है और कहा है कि देवलक वह ब्राह्मण है जो किसी प्रतिमा का पूजन पारिश्रमिक के आधार पर तीन वर्षों तक करता है, जिसके लिए वह श्राद्धों के पौरोहित्य के लिए अयोग्य हो जाता है। स्पष्ट है, इस कथन के अनुसार देवलक ब्राह्मण वित्तार्थी है ।  मनु (३।१५२) ने *देवलक* को श्राद्धों तथा देवताओं के सम्मान में किये गये कृत्यों में निमन्त्रित किये जाने के लिये अयोग्य घोषित किया है ।  कुल्लूक ने देवल को उद्धृत कर इस विषय में कहा है कि जो व्यक्ति किसी देव स्थान के कोष पर निर्भर रहता है, उसे *देवलक* कहा जाता है।  वृद्ध हारीत (८/७७-८०) के मत से केवल शिव के वित्तार्थी पूजक *देवलक* कहे जाते हैं। जय महादेव  पं० धवलकुमार शास्त्री गुजरात

कलश वर्णन

 #स्वर्णपूर्णकलशम् ऋग्वैदिक पुण्याहवचन प्रयोग में यजमान को अपने घुटने ज़मीन पर लगाने होते हैं और अपने हाथों से अपने खिले हुए कमल के समान माथे को पकड़ना होता है। कुछ लोग कहते हैं कि माथे पर सोने से भरा कलश धारण करना चाहिए और कुछ कहते हैं कि उसे महसूस करना होता है जैसे हाथ में सोने का कलश है तो #स्वर्णपूर्णकलशम्_भवयित्व धारयित्व का अर्थ है धारण करना, ऐसा कहना भी हास्यास्पद है। परंतु स्वर्णपूर्णकलश का अर्थ जल से भरा हुआ कलश माना गया है। यास्काचार्य का निघंटु-निरुक्त, दास ग्रंथों में से एक, पानी के लिए 101 पर्यायवाची शब्द देता है, जिनमें से पहला है #अर्नाः #(स्वर्णः)सु-अर्नाः=संयुतिका का अर्थ है कि शुद्ध जल (अच्छा जल) से भरा कलश दाहिने हाथ से लेना चाहिए। नारायणभट्टी आदि। पाठ में #स्वर्ण पाठ स्वीकार नहीं किया गया है बल्कि #सुवर्णपूर्णकलशम् ही रखा गया है। इस पाठ के अनुसार भी सु-वर्ण = वर्ण (रूप में उत्कृष्ट) का वही अर्थ होना चाहिए जो पूर्णकलश (जल से भरा हुआ) का है। (अर्थात् सोना अथवा सोने से भरा कलश न लेने की हीन भावना मन में उत्पन्न नहीं होगी।) क्योंकि प्रयोग में कहीं भी उस तरह से सोने ...