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भस्म धारण की महीमा

 शिवपुराण विद्येश्वर संहिता २४/४०-४१ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः         शूद्राश्चापि च सङ्कराः | स्त्रियोऽथ विधवा बालाः         प्राप्ता पाखण्डिकास्तथा ॥  ब्रह्मचारी गृही वन्यः      संन्यासी वा व्रती तथा।  नार्यो भस्मत्रिपुण्ड्राङ्का        मुक्ता एव न संशयः ॥ तत्रैव ५१ - स्त्रीभिस्त्रिपुण्ड्रमलकावधि धारणीयं       भस्म द्विजादिभिरथो विधवाभिरेवम्।  तद्वत्सदाश्रमवतां विशदा विभूतिर्             धार्यापवर्गफलदा सकलाघहन्त्री ।। Narendra Goswami  ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र संकर  सधवास्त्री विधवा बालक बालिकाएं पाखंडी ब्रह्मचारी गृहस्थी वानप्रस्थी संन्यासी व्रती स्त्रीयाँ - ये भी भस्मत्रिपुण्ड्राङ्का धारण करे तो ये भी निःसंशय  मुक्त हो जाते हैं। सौभाग्यवती तथा विधवास्त्रीयों को भी सम्पूर्ण माथे पर त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये, इसी प्रकार सभी आश्रम वालों को विभूति भी धारण करना चाहिये, क्योंकि यह पापों को दूरकर मोक्ष को...

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 Copyright धौम्य बोले - १ *सूर्याय नम:* २ *अर्यम्णे नम:* ३ *भगाय नम:* ४ *त्वष्ट्रे नमः* ५ *पूष्णे नम:* ६ *अर्काय नम:* ७ *सवित्रे नम:* ८ *रवये नम:* ९ *गभस्तिमते नम:* १० *अजाय नम:* ११ *कालाय नम:* १२ *मृत्यवे नम:* १३ *धात्रे नम:* १४ *प्रभाकराय नम:* १५ *पृथिव्यै नम:* १६ *आपाय नमः* १७ *तेजसे नम:* १८ *आकाशाय नम:* १९ *वायवे नम:* २० *परायणाय नम:* २१ *सोमाय नम:* २२ *बृहस्पतये नम:* २३ *शुक्राय नम:* २४ *बुधाय नम:* २५ *अंगारकाय नम:* २६ *इन्द्राय नम:* २७ *विवस्वते नम:* २८ *दिप्तांशवे नम:* २९ *शुचये नम:* ३० *शौरये नम:* ३६ *शनैश्चराय नम:* ३२ *ब्रह्मणे नम:* ३३ *विष्णवे नम:* ३४ *रुद्राय नम:* ३५ *स्कन्दाय नम:* (३६ वैश्रवणाय नमः )  ३६ *वरुणाय नम:* ३७ *यमाय नम:* ३८ *वैद्युताग्नये नम:* ३९ *जाठराग्नये नम:* ४० *ऐन्धनाग्नये नम:* ४१ *तेजसाम्पतये नम:* ४२ *धर्मध्वजाय नम:* ४३ *वेदकर्त्रे नम:* ४४ *वेदांगाय नम:* ४५ *वेदवाहनाय नम:* ४६ *कृताय नमः* ४७ *त्रेताय नम:* ४८ *द्वापराय नम:* ४९ *सर्वमलाश्रय कलये नम:* ५० *कला -काष्ठा-मूहुर्तरुप समयाय नम:* ५१ *क्षपायै नम:* ५२ *यामाय नम:* ५३ *क्षणाय नम:* ५४ *संवत्सरकराय ...

वैध्व्य दोष परिहार

 ॥ अथ शीतलासप्तमीव्रतम् ॥ 👉वैधव्यदोष परिहार के लिए अपने आचार्यों से मार्गदर्शन प्राप्त करे। श्रावणशुक्ल सप्तम्यां शीतलाव्रतम् ॥ तच्च मध्याह्रव्यापिन्यां कार्यम् ।।  अथ व्रतविधिः स्कान्दे ॥  #संकल्प -:- अद्येत्यादि० ममेह जन्मनि जन्मान्तरे च अवैधव्यप्राप्तये अखंडितभर्तृसंधोगपुत्रपौत्रादिधनधान्यप्राप्तये च शीतलाव्रतं तदङ्गन्त्वेन पूजनं च करिष्ये ॥ इति संकल्प्य  तत्र अष्ट- दलयुते पीठे अत्रणं कलशं संस्थाप्य तदुपरि सौवर्णादिनिर्मितां शीतला- मूर्ति संस्थाप्य ध्यायेत् ।। वंदेऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगंबराम् ॥ मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालंकृतमस्तकाम् ।। शीतले दह मे पापं पुत्रसौख्य- फलप्रदे ॥ धनधान्यप्रदे देवि पूजां स्वीकुरु ते नमः ।। " शीतलादेव्यै नमः " ध्यायामि ॥ इति शीतलादेवीं ध्यात्वा ततः " ह्रींशीतलायै नमः” इति  मंत्रेणावाहनादिदीपान्तोपचारैः संपूज्य समीपे दधिघृत- मिश्रपक्वान्ननैवेद्यं निधाय " शीतले पंचपक्वान्नदध्योदनयुतं शुभम् ।। नैवेद्यं गृह्यतां देवि घृतमिश्र च सुंदरि" ।॥ इति नैवेद्यं निवेद्य नीराजनं प्रदक्षिणां कृत्वा प्रार्थयेत् ।। " शीतले दह मे पापं पुत्र...

भागवत कथा वक्ता को मुंडन कराना चाहिए

 #कथावाचकोंको_मुण्डन_कराना_चाहिए 🚩 श्रीराम!   भागवतवक्ता के लिए क्षौर ( मुण्डन) का विधान है-- #वक्त्रा_क्षौरं_प्रकर्तव्यम्"  (भाग.मा.६-२३)     फिर आजकल के कथक्कड़ कथक्कड़ीया मुण्डन क्यों नहीं कराते?     यदि कथक्कड़ छोकड़ियाँ यह कहें कि श्लोक में #वक्त्रा ( पु.) ही कहा है, #वक्त्री ( स्त्री.) नहीं कहा है, अतः लड़कियों को मुण्डन कराना आवश्यक नहीं है। तो यहाँ यह प्रश्न भी तो मुह बाये खड़ा होगा कि-- भागवत में विरक्तो वैष्णवो विप्रो कहा है, दृष्टान्तकुशलः कहा है, ये सब पुलिङ्ग में हैं, विरक्ता, वैष्णवी कुशला विप्रा आदि स्त्री लिङ्ग पद भी तो नहीं हैं??😂     यदि विधि का अतिक्रमण करके अनुष्ठान हुआ तो कोई ऐहिक आमुष्मिक गति नहीं होने वाली है। यजमान की भी व कथक्कड़ कथक्कडियों की भी।    विशेष रूप से उन कथक्कडीयों को जो #सच्चिदानन्दरूपाय के आधार पर भागवत का आरम्भ #सच से मानतीं हैं। भागवत का आरम्भ #सच से हुआ है। साभार~~ स्वामी राघवेंद्रदास जी

जिसकी बुद्धि बिगडी हो

  यह उपाय करे जिसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई हो  घरमें पवित्रतासे रसोई करो। रसोईघरको पवित्र रखना चाहिये। रसोईघर अन्नपूर्णाजीका मन्दिर है।  साधारण कोई मानव रसोईघरमें आये नहीं, अन्न-जलको छुए नहीं। स्पर्शसे अनेक दोष उत्पन्न होते हैं—रसोईघरको पवित्र रखो।  बहुत- से लोग चप्पल पहन करके रसोईघरमें जाने लगे हैं- ‍अपनेको बड़ा सयाना समझते हैं; ऐसा मानते हैं कि हम तो सुधरे हुए हैं। “सुधरे हैं कि बिगड़े हैं—ये तो भगवान् ही जाने !  रसोईघर अन्नपूर्णाजीका मन्दिर है - पवित्रतासे रसोई करो। कभी बाजारका खाना नहीं। बाजारका जो खाता है, उसकी बुद्धि बहुत बिगड़ती है।  बाजारकी वस्तुमें अनेककी नजर पड़ती है— दृष्टिदोष आता है। बाजारकी वस्तुमें स्वच्छता भले ही हो जाय - पवित्रता जरा भी नहीं होती ।  छ: महीनेतक बाजारका खाना छोड़ो, घरमें पवित्रतासे रसोई करो- भगवान्‌को भोग लगाओ।  छ: महीना पवित्र अन्न पेटमें जाय, फिर देखो - बुद्धि कैसी सुधरती है! ।।श्री डोंगरे जी महाराज की वाणी!!

बिल्वाष्टक

 #बिल्वपत्र_चढाने_के_108_मन्त्र - त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम् । त्रिजन्म पापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१॥ त्रिशाखैः बिल्वपत्रैश्च अच्छिद्रैः कोमलैः शुभैः । तव पूजां करिष्यामि एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२॥ सर्वत्रैलोक्यकर्तारं सर्वत्रैलोक्यपालनम् । सर्वत्रैलोक्यहर्तारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३॥ नागाधिराजवलयं नागहारेण भूषितम् । नागकुण्डलसंयुक्तं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४॥ अक्षमालाधरं रुद्रं पार्वतीप्रियवल्लभम् । चन्द्रशेखरमीशानं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५॥ त्रिलोचनं दशभुजं दुर्गादेहार्धधारिणम् । विभूत्यभ्यर्चितं देवं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६॥ त्रिशूलधारिणं देवं नागाभरणसुन्दरम् । चन्द्रशेखरमीशानं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७॥ गङ्गाधराम्बिकानाथं फणिकुण्डलमण्डितम् । कालकालं गिरीशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८॥ शुद्धस्फटिक सङ्काशं शितिकण्ठं कृपानिधिम् । सर्वेश्वरं सदाशान्तं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९॥ सच्चिदानन्दरूपं च परानन्दमयं शिवम् । वागीश्वरं चिदाकाशं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०॥ शिपिविष्टं सहस्राक्षं कैलासाचलवासिनम् । हिरण्यबाहुं सेनान्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥११॥ अरुणं वामनं तारं वास्तव्यं चैव वास...

सेंधा नमक ही खाए -

 पढ़िये सेंधा नमक की हकीकत....... "सेंधा नमक के साथ इन अंग्रेजो ने कैसे किया था खिलवाड़ "  भारत से कैसे गायब कर दिया गया... आप सोच रहे होंगे की ये सेंधा नमक बनता कैसे है ?? आइये आज हम आपको बताते है कि नमक मुख्यत: कितने प्रकार का होता है। एक होता है समुद्री नमक, दूसरा होता है सेंधा नमक "rock salt"सेंधा नमक बनता नहीं है पहले से ही बना बनाया है। पूरे उत्तर भारतीय उपमहाद्वीप में खनिज पत्थर के नमक को ‘सेंधा नमक’ या ‘सैन्धव नमक’, लाहोरी नमक आदि आदि नाम से जाना जाता है जिसका मतलब है ‘सिंध या सिन्धु के इलाक़े से आया हुआ’। वहाँ नमक के बड़े बड़े पहाड़ है सुरंगे है । वहाँ से ये नमक आता है। मोटे मोटे टुकड़ो मे होता है आजकल पीसा हुआ भी आने लगा है यह ह्रदय के लिये उत्तम, दीपन और पाचन मे मदद रूप, त्रिदोष शामक, शीतवीर्य अर्थात ठंडी तासीर वाला, पचने मे हल्का है । इससे पाचक रस बढ़ते हैं। अतः: आप ये समुद्री नमक के चक्कर से बाहर निकले। काला नमक ,सेंधा नमक प्रयोग करे, क्यूंकि ये प्रकृति का बनाया है, भारत मे 1930 से पहले कोई भी समुद्री नमक नहीं खाता था विदेशी कंपनीयां भारत में नमक के व्यापार ...