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वर्धापनदिन विधान

 ॥ अथ वर्धापनविधिः ॥ આ વિધિ બાળકના જન્મથી એક વર્ષપર્યંત પ્રત્યેક માસે જન્મ-તિથિના દિવસે કરવો, અને તે પછી પ્રત્યેક વર્ષે વર્ષગાંઠના દિવસે કરવો. બાલ્યાવસ્થા હોય ત્યાંસુધી પિતાએ ને તે પછી તેણે પોતાની જાતે કરવો. ॥ अथ वर्धापनप्रयोगः ॥ પોતાના બાળકની જન્મતિથિના દિવસે માતાપિતાએ ઉત્સાહપૂર્વક મંગલસ્નાન કરી, યથાવૈભવ વસ્ત્રાલંકાર ધારણ કરી, રંગાદિ વડે અલંકૃત કરેલી પવિત્રભૂમિમાં પૂજનસાહિત્ય પાસે લઈ, તથા મંગલસ્નાન કરાવી વસ્ત્રાલંકારથી શણગારેલા પોતાના બાળકને માતાએ પોતાની પાસે લઇ, સ્ત્રીપુરુષે પોતાનાં આસનો ઉપર બેસવું, ને તે પછી આચમન-પ્રાણાયામ કરી, નીચે પ્રમાણે બોલી સંકલ્પ કરવોઃ– अत्राद्य महामाङ्गल्यप्रदे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुक-वासरे अस्य बालस्यायुष्याभि- वृद्धयर्थं वर्धापनाख्यं कर्म करिष्ये ॥ આ ક્રિયા પોતાની મેળે કરવાની હોય તો ममायुष्याभिवृद्ध्यर्थं ઉચ્ચારણ કરવુ -  તે પછી તેના અંગભૂત કર્મો ગણપતિપૂજન તથા પુણ્યાહવાચન કરવાનો સંકલ્પ નીચે પ્રમાણે બોલીને કરવોઃ- तत्र निर्विघ्नतासिद्धयर्थं गणपतिपूजनं पुण्याहवाचनं च करिष्ये ॥ પછી આચાર્ય આજ્ઞાનુસાર ગણપતિપૂજન અને પુણ્યાહવાચન વિધિ કરવી. પછી એક ...

सूर्य

सूर्य स्तुति हिंदू धर्म में भगवान सूर्य को जीवन का आधार, ऊर्जा का स्रोत और सत्य का प्रतीक माना गया है। उन्हें प्रत्यक्ष देवता कहा गया है, क्योंकि वे प्रत्यक्ष रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। सूर्य देव की उपासना से आत्मविश्वास, स्वास्थ्य, तेज, और मान-सम्मान प्राप्त होता है। सूर्य स्तुति का नियमित पाठ जीवन में सफलता, मानसिक स्पष्टता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। सूर्य भगवान की स्तुति आदित्याय च सोमाय मङ्गलाय बुधाय च। गुरु शुक्र शनिभ्यश्च राहवे केतवे नमः॥ जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्। तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्॥ आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर। दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥ सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम्। श्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्यं प्रणम्यहम्॥ सप्तलोकप्रकाशं च तेजोराशिं समुद्भवम्। सप्तवर्णैः समायुक्तं सूर्यं देव नमोऽस्तु ते॥ यः शत्रूणां विनाशाय रक्षणाय च सज्जनम्। सदैव पथदर्शी च तं सूर्यं प्रणम्यहम्॥ सर्वदोषहरं देवं सर्वरोगनिवारणम्। अर्जुनस्य सखा कृष्णे साक्षात् देवदिवाकरः॥ नमस्ते रविरूपाय नमस्ते दिव्यचक्षुषे। नमस्ते सर्वलोकस्य जीवनं तेजसां न...

वैदिक विवाह

 मनुष्यकृत संविधानिक व्यवस्था से पाणिग्रहण करने वाले कथित वैदिकों को मेरी करबद्ध प्रार्थना है उत्तम धर्म के लिए मनु और शतरूपा से विवाह के मान्य सिद्धांतो को जानना और स्वीकार करना चाहिए यदि स्वीकार नहीं कर सकते तो मनुष्य कृत परंपरा बंध करके शास्त्रीय वैदिक प्रणयफाग रचाकर उत्तमोत्तम ब्रह्मादि प्राजापत्य लोक की प्राप्ति और पूर्वजों के समस्त कल्याण के लिए वैदिक धर्म का स्वीकार करके अपने स्वधर्म का विधिवत पालन करें!  पं० धवलकुमार शास्त्री गुजरात

दक्षिणा

 दक्षिणा का महत्व -:-  बिना दक्षिणा किया हुआ कर्म वृथाक्रिया हो जाती है जिसका कोइ फल नही मिलता -:- अल्प दक्षिणा से कर्म विफल होता है। *ददाति नो दानं ग्रहीता तन्न याचते॥ उभौ तौ नरकं यातश्छिन्नरज्जुर्यथा घटः । नार्पयेद्यजमानश्चेद् याचितारं च दक्षिणाम् ॥ भवेद् ब्रह्मस्वापहारी कुम्भीपाकं व्रजेद् ध्रुवम् । वर्षलक्षं वसेत्तत्र यमदूतेन ताडितः ॥ ततो भवेत् स चाण्डालो व्याधियुक्तो दरिद्रकः । पातयेत् पुरुषान् सप्त पूर्वान् वै पूर्वजन्मनः ॥(ब्रह्मवैवर्त ० प्रकृतिखण्ड ४२।६०-६३)”* अर्थ 👇 उचित दक्षिणा न दैने वाले यजमान और दक्षिणा के अधिकारी ब्राह्मण दक्षिणा की याचना न करे तो दौनों नरक में जाय उचित दक्षिणा न दैनेवाला यजमान कुम्भीपाकनरक कौ तीनलाख वर्षतक यमदूतों से यातना भूगतकर पृथ्वीपर दरिद्र चाण्डाल योनि में जन्म लेता हैं, दक्षिणा न दैनेवाले यजमान अपने पूर्व के सातपिढी़ के पितरों का भी नरक में पतन करवाता हैं। ⭕ जय महादेव ‼️ पं० धवलकुमार शास्त्री गुजरात

शिवरात्रि पूजा संकल्प

 शिवरात्रौ संक्षिप्त चतुर्यामयामपूजा - संकल्प:- नमो भगवते रुद्राय । विष्णुः विष्णुः विष्णुः। फाल्गुनमासे(माघमासे)कृष्णपक्षे त्रयोदश्यां (चतुर्दश्यां )तिथौ __वासरे श्रीसाम्बसदाशिवप्रीत्यर्थं प्रथमयामपूजां (द्वितीययाम/तृतीययाम/चतुर्थयाम पूजां) करिष्ये। यथालाभ उपचारद्रव्य से गणपति का संक्षिप्तपूजन करें, तदनन्तर "शिवाय नमः" इसी मन्त्र से मिट्टी का शिवलिंग निर्माण करे जो अंगुठे से लेकर बारह अंगुल तक के प्रमाण में से यथानुकूल व्यवस्थानुरूप हो। ह्रीं ईशानाय नमः - मन्त्र से आसन , पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, दुग्धस्नान करावें, शिवपंचाक्षर स्तोत्र "नागेन्द्रहाराय ०० आदितः" से पल्लव या पुष्प की सहायता से दूध से ही अभिषेक करें। (द्वितीय प्रहर में दहीं से, तृतीय प्रहरमें केवल घृत , चतुर्थ प्रहर में शहद से स्नानाभिषेक करें) अभिषेकान्ते जल द्वारा सीधे हाथ से अन्य पात्र में तर्पण करे " सभी नाम के अन्तमें "तर्पयामि" पद लगावें "भवं देवम्" शर्वं देवम्" ईशानं देवम्" पशुपतिं देवम्" रुद्रं देवम्" उग्रं देवम्" भीमं देवम्" महान्तं दे...

भ्रममाकुमारी

 #ब्रह्मकुमारी_या_भ्रमकुमारी 'ओम् शान्ति', 'ब्रह्माकुमारी'... हम लोगों ने छोटे-बड़े शहरों में आते-जाते एक साइन बोर्ड लिखा हुआ देखा होगा *'प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय'* तथा मकान के ऊपर एक लाल-पीले रंग का झंडा लगा हुआ भी देखा होगा, जिसमें अंडाकार प्रकाश निकलता हुआ चित्र अंकित होता है। इस केन्द्र में व आसपास ईसाई ननों की तरह सफेद साड़ियों में नवयुवतियाँ दिखती हैं। वे सीने पर *'ओम् शान्ति'* लिखा अंडाकार चित्र युक्त बिल्ला लगाये हुए मंडराती मिलेंगी। आप *विश्वविद्यालय* नाम से यह नहीं समझना कि वहाँ कोई छात्र-छात्राओं का विश्वविद्यालय अथवा शिक्षा केन्द्र है, अपितु *यह सनातन धर्म के विरुद्ध सुसंगठित ढ़ंग से विश्वस्तर पर चलाया जाने वाला अड्डा है।* *स्थापना*:  इस संस्था का संस्थापक *लेखराज खूबचंद कृपलानी* था। इसने अपने जन्म-स्थान *सिन्ध* (पाकिस्तान) में दुष्चरित्रता व अनैतिकता का घोर ताण्डव किया, जिससे जनता में इसके प्रति काफी आक्रोश फैला। तब यह सिन्ध छोड़कर सन *1938 में* कराची भाग गया। इसने वहाँ भी अपना कुकृत्य चालू रखा, जिससे जनता का आक्रोश आसमान पर...

वैदिक विवाह कुष्मांडहोम प्रायश्चित

वैदिकविवाह में आयु अतिक्रमण और अपूर्ण कुष्मांड होम प्रायश्चित बना पाखंड :  देश काल स्थिति का सिद्धांत के पालन के साथ उचित समय पर उचित विधि विधान होने से ही सिद्धि की प्राप्ति होती है - कुष्मांड होम प्रायश्चित का कोई विरोध नहीं हम इस विधान का पूर्ण श्रद्धा से स्वीकार भी करते हैं। यह लेख से हमारा किसी की वैदिक आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं है। किसी के स्वीकार अस्वीकार से हमें कोइ फर्क नहीं पड़ता यह आपका निजी वैदिक अधिकार है - यह वैदिक समय सूचकता हेतु है - जो आजकल दुर्लभ है।शायद आधुनिक काल में किसी को पसंद न भी आए  वर्तमान समय के मेरे निजी वैदिक मर्यादा मूलक विचार है । मूल विषय पढ़ना गहन अभ्यास करना परिबलो का मर्यादा का भी विचार करना  उत्तमोत्तम विश्लेषण होता है।केवल लिखा है तो कर लिया और रहस्यो को न जानना पाखण्ड है -  वैदिक विवाहविधि से कन्यादान का उचित आरंभिक काल - अंतिमकाल अतिक्रमण -भूतकाल -वर्तमान काल पर विचार करें अंत तक जरूर पढ़ें  विद्वज्जनों को निवेदन है आप कोइ भी पक्ष रखें लेकिन सिद्धांत को , समयस्थिति को और जिस समय प्रायश्चित लिखा गया उस प्रायश्चितकाल पर उस ...

ग्रहों की डीग्री

 #Astrology_Degree_Consept केवल वैदिक द्विजों के लिए copyright post ©️  ब्रह्मांड में एक भचक्र की कल्पना करी है जिसे ३६०° डीग्री में वृताकार में पूर्वाचार्यों ने हमें ज्ञान दिया है। यह सब आप बाल्यावस्था में स्कूल आदि में इतिहास आदि पढ़ें हो तो ज्ञात ही होगा चलिए आज पुनः उसका अभ्यास करे - एक वृत निर्माण करेंगे जिसमें १२ भाग होंगे सभी में ३०° का एक भाग रहेगा इस प्रकार पूरा भचक्र होगा -  चंद्रमा १ घंटे बारह मिनट पूर्व अगली राशि का फल देते हैं जैसे कि १७ तारीख को चंद्रमा कन्या राशि में २९° का दोपहर २:२२ मिनट को था १ घंटे बारह मिनट के बाद तुला राशि में चंद्र ने राशि परिवर्तन किया - बाद में यह तुला राशि में आया आज वृश्चिक राशि में चंद्रमा 5° का है जो फलित के लिए है ।  यहां पर ध्यान दें सज्जनों ---  हम अंश पर चर्चा कर रहे हैं जबकि फलित से उपर एक संशोधन ही जाने जो आप सभी के मौलिक ज्ञान की अभिवृद्धि के लिए रखा है किसी वाद विवाद के लिए प्रचार के लिए नहीं। एक राशि का पूर्ण भोग 30° का होता है यदी चंद्रमा 25° का मू० त्रिकोण के अंशों से भी बलाबल का विचार करते हैं सार यह है क...

वेश्या का उद्धार

 : "वैश्या का उद्धार"           एक वैश्या थी। उसके मन में विचार आया कि मेरा कल्याण कैसे हो ? अपने कल्याण के लिए वह साधुओं के पास गई, उन्होंने कहा कि तुम साधुओं का संग करो, साधु त्यागी होते हैं, इसलिए उनकी सेवा करो तो कल्याण होगा।           फिर वह ब्राह्मणों के पास गई तो, उन्होंने कहा कि साधु तो बनावटी हैं, पर हम जन्म से ब्राह्मण हैं। ब्राह्मण सबका गुरु होता है। अतः तुम ब्राह्मणों की सेवा करोगी तो कल्याण होगा।           इसके बाद वह सन्यासियों के पास गई तो उन्होंने कहा कि सन्यासी सब वर्णों का गुरु होता है। इसलिए उनकी सेवा करने से कल्याण होगा। फिर वह वैरागियों के पास गई तो उन्होंने कहा कि वैरागी सबसे तेज होता है अतः उनकी सेवा करो तो कल्याण होगा।           फिर वह अलग-अलग संप्रदायों के गुरुओं के पास गई तो, उन्होंने कहा कि हम सबसे ऊंचे हैं शेष सब पाखंडी हैं। तुम हमारी चेली बन जाओ। हमारे से मंत्र ले लो तब हम वह बात बताएँगे जिससे तुम्हारा कल्याण हो जाएगा।           इ...

ज्योतिषीय समाधान

आप अपनी जन्मकुंडली का विश्लेषण करवाना चाहते हैं, ज्योतिषीय प्रश्नो का उत्तर चाहते हैं, अपनी समस्याओं का समाधान चाहते हैं, रत्न धारण कराना चाहते हैं, ग्रहो की शांति, जाप अनुष्ठान कराना चाहते हैं या किसी भी प्रकार के शुभ मूहूर्त की जानकारी चाहते हैं तो आचार्य जी को संदेश भेजकर प्रत्युत्तर की प्रतिक्षा करके मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं  नारायण  

सूर्य संबंधित कार्य

 सरकारी नौकरी , सरकारी सेवा , उच्च स्तरीय प्रशासनिक सेवा , मजिस्ट्रेट , राजनीति , सार्वजनिक क्षेत्र में सोने का काम करने वाले , जौहरी, स्वर्ण विक्रय, फाईनान्सर , प्रबन्धक , , राजदूत , चिकित्सक (फिजिशियन), दवाइयों से संबंधी मैनेजमेंट ,  उपदेशक , मंत्र कार्य , फल विक्रेता (Astrology) , वस्त्र , घास फूस ( नारियल रेशा ,चटाई, बांस तृण आदि ) से निर्मित सामाग्री , तांबा , स्वर्ण, माणिक , सींग या हड्डी के बने समान,डेयरी फार्मिंग या बागवानी/खेती बाड़ी,चामर आदि निर्माण छाता आदि से, सूचनाओं के आदान प्रदान से जीविका (जैसे सट्टा लाटरी के अंक, विशिष्ट गोपनीय सूचना देकर , पुलिस आदि में खबरिया, ) धन विनियोग (पैसा  जमा करके या करवाकर उच्च लाभ कमाना) बीमा एजेंट , सरकारी मुखबीर , गेहूं से संबंधी ,विदेश सेवा , उड्डयन , ओषधि विक्रय, निर्माण या प्रयोग, चिकित्सा , प्रेत कार्य (शवदाह, मृतक संस्कार,बाधा निवारण) दुष्कर्म, यात्रा या विवाह,सभी प्रकार के लाल रंग के अनाज , लाल रंग के पदार्थ , शहद , लकड़ी व प्लाई वुड का कार्य , चतुर्थ से संबंध बनाकर इमारत बनाने मे काम आने वाला लकड़ी , सर्राफा , वानिकी ...

कर्णवेध संस्कार

चूडाकरणम् कर्णवेध श्री:।। सांवत्सरिकस्य चूडाकरणम् ≈> १ वर्ष पूर्ण होने के बाद बालक का मुण्डन करावे // तृतीये वाऽप्रतिहिते ।। तीसरा वर्ष पूर्ण होने के बाद चूड़ाकर्म करना चाहिए ≈ आजकल न तो वैदिक परंपरा मिलती है न तो कुल परंपरा न तो कुल गुरु का भी कोइ अता-पता होता है इसलिए अपने कुल परंपरा के अनुसार शास्त्र संमत सभी संस्कार करने चाहिए, इस संस्कार से पूर्व तीन सदाचारी ब्राह्मण को भोजन कराने की भी विधि है। बालक के जन्मनक्षत्र से ताराबल चन्द बल आदि देखकर शुभ योग में चूड़ा कर्म करें - अन्य जो भी चूड़ा कर्म के प्रमाण है वे सभी गौणकाल के है एसे गौणकाल में चूड़ाकर्म नहीं करना चाहिए - ≈» *कर्णवेध संस्कार* का सभी गृह्य सूत्रकारों ने विस्तार से उल्लेख नहीं किया है, किन्तु हमारे देश के परिवारों में प्रचलित है। बच्चे की प्रथम सालगिरह-अव्दपूर्ति होने पर *चूडाकर्म के साथ उसी दिन अच्छी लग्न देखकर बच्चे का कर्णवेध करते है* वस्त्र-आभूषण आदि से अलंकृत कर माता अपनी गोद में बैठा लेती है। गाँव के स्वर्णकार या वैद्य को बुलाकर स्वर्ण की शलाका से दाहिने कान को पहले और बाँयें कान को बाद में वेधकर शलाका को मोड...

ग्रहरत्न धारण विधि

 ग्रहो के वास्तविक रत्न ही धारण करें उपरत्न या वैकल्पिक नहीं -  ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों के अरिष्ट शान्ति के लिए अथवा निर्बल ग्रह को बल प्रदान करने के लिए रत्न धारण करने की व्यवस्था की गई है। । रत्न धारण करने से पूर्व रत्नों के पूजन करने का विधान है क्योंकि रत्न खान से निकलने पर उन्हें धारण योग्य बनाने के लिए संघर्षण, संघटन इत्यादि प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है जिससे उनका प्राकृतिक गुण मन्द हो जाता है अतः विधि पूर्वक पूजन करने से वे जागृत एवं पूर्ण शक्तिमान हो जाते हैं। प्रधान रूप से नवग्रहों के नव रत्न ही होते हैं यथा सूर्य का माणिक्य, चन्द्रमा का मोती, मंगल का मूंगा, बुध का पन्ना, बृहस्पति का पुखराज, शुक्र का हीरा, शनि का नीलम्, राहु का गोमेद तथा केतु का लहसुनिया- ये प्रधान रत्न होने से अधिक प्रभावशाली किन्तु मंहगे होते हैं जो इन्हें क्रय करने में समर्थ नहीं हैं वे इनके उपरत्नों को धारण कर संतोष मान सकते हैं लेकिन यह शास्त्र संमत नहीं विकल्प में रुद्राक्ष आदि भले ही धारण करें जिनका मूल्य कम होता है जबकि गुणवत्ता भार में अधिक लेकर धारण करने से तद्वत् ही फल देते हैं। उक्त स...

भूत प्रेत

 :( भूत) -प्रेत और आत्माओं के विभिन्न प्रकार- 1.भूत :- सामान्य भूत जिसके बारे में आप अक्सर सुनते है । 2.प्रेत :- परिवार के सताए हुए बिना क्रियाकर्म के मरे हुए आदमी,जो पिडीत रहेते है। 3.हाडल :- बिना नुक्सान पहुचाये प्रेतबाधित करने वाली आत्माए । 4.चेतकिन :- चुडेले जो लोगो को प्रेतबाधित कर दुर्घटनाए करवाती है । 5.मुमिई :- मुंबई के कुछ घरो में प्रचलित प्रेत,जो कभी कभी दिखाई देते है। 6.विरिकस:- घने लाल कोहरे में छिपी और अजीबो-गरीब आवाजे निकलने वाला होता है। 7.मोहिनी या परेतिन : -प्यार में धोका खाने वाली आत्माए जिनसे मनुष्यों को मदत मिल सकती है। 8.शाकिनी:- शादी के कुछ दिनों बाद दुर्घटना से मरने वाली औरत की आत्मा जो कम खतरनाक होती है। 9.डाकिनी :- मोहिनी और शाकिनी का मिला जुला रूप किन्ही कारणों से हुई मौत से बनी आत्मा होती है। 10.कुट्टी चेतन :- बच्चे की आत्मा जिसपर तांत्रिको का नियंत्रण होता है । 11.ब्रह्मोदोइत्यास :- बंगाल में प्रचलित,श्रापित ब्राह्मणों की आत्माए,जिन्होने धर्म का पालन ना किया हो । 12.सकोंधोकतास :- बंगाल में प्रचलित रेल दुर्घटना में मरे लोगो की सर कटी आत्माए होती है। 13.न...

कन्यादान का शास्त्रसंमत समयावधि

 गृहस्थीओ की कन्या संतान रजोदर्शन को प्राप्त होते ही पिता को पनोती बैठ जाती है।  जब उसका विवाह होता है तो वो पनौती पति को बैठ जाती है -- एसा कुछ शनि से भी दृष्टिगोचर होता है -- और रजोदर्शन होते ही सुपात्र को कन्यादान न होने के कारण पिता को भ्रूणहत्या ब्रह्महत्या का पाप लगता है यह भी कारण होता है --  पनौती भी तीन प्रकार की होती है शुभ फलदायक पनौती- मध्यम फलदाई और अनिष्ट फलदाई/ अति अनिष्टकारी पनौती होती है - पुत्री के रजोदर्शन से १२ वर्ष की पनौती शुभकारी - १२ से १६/१८/१९ (वर्तमान मे जो मनघडंत विवाह योग्य समयावधि है १८/१९ ) वर्ष तक की पनौती मध्यम फलप्रद और पुत्री के १६ वर्ष की आयु के बाद कठीन प्रायश्चित के कारण पिता पर अनिष्टकारी पनौती सिद्ध होती है - इसका प्रायश्चित्त न होने के कारण दिन प्रतिदिन अत्यंत अनिष्टकारी पनौती सिद्ध होती है --  पति यदि अपने स्वधर्मपालन से विमुख हो द्विज होने पर वैदिक धर्म से विमुख हो तो पति के लिए भी यह पनोति मध्यम या अनिष्टकारी होती है - मूलतः सिद्धांत यह है कि इहलोक और परलोक के कल्याण के लिए विवाह के बाद संभवतः विधि विधान का पालन करके अपने ग...

भस्म धारण की महीमा

 शिवपुराण विद्येश्वर संहिता २४/४०-४१ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः         शूद्राश्चापि च सङ्कराः | स्त्रियोऽथ विधवा बालाः         प्राप्ता पाखण्डिकास्तथा ॥  ब्रह्मचारी गृही वन्यः      संन्यासी वा व्रती तथा।  नार्यो भस्मत्रिपुण्ड्राङ्का        मुक्ता एव न संशयः ॥ तत्रैव ५१ - स्त्रीभिस्त्रिपुण्ड्रमलकावधि धारणीयं       भस्म द्विजादिभिरथो विधवाभिरेवम्।  तद्वत्सदाश्रमवतां विशदा विभूतिर्             धार्यापवर्गफलदा सकलाघहन्त्री ।। Narendra Goswami  ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र संकर  सधवास्त्री विधवा बालक बालिकाएं पाखंडी ब्रह्मचारी गृहस्थी वानप्रस्थी संन्यासी व्रती स्त्रीयाँ - ये भी भस्मत्रिपुण्ड्राङ्का धारण करे तो ये भी निःसंशय  मुक्त हो जाते हैं। सौभाग्यवती तथा विधवास्त्रीयों को भी सम्पूर्ण माथे पर त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये, इसी प्रकार सभी आश्रम वालों को विभूति भी धारण करना चाहिये, क्योंकि यह पापों को दूरकर मोक्ष को...

Copyright

 Copyright धौम्य बोले - १ *सूर्याय नम:* २ *अर्यम्णे नम:* ३ *भगाय नम:* ४ *त्वष्ट्रे नमः* ५ *पूष्णे नम:* ६ *अर्काय नम:* ७ *सवित्रे नम:* ८ *रवये नम:* ९ *गभस्तिमते नम:* १० *अजाय नम:* ११ *कालाय नम:* १२ *मृत्यवे नम:* १३ *धात्रे नम:* १४ *प्रभाकराय नम:* १५ *पृथिव्यै नम:* १६ *आपाय नमः* १७ *तेजसे नम:* १८ *आकाशाय नम:* १९ *वायवे नम:* २० *परायणाय नम:* २१ *सोमाय नम:* २२ *बृहस्पतये नम:* २३ *शुक्राय नम:* २४ *बुधाय नम:* २५ *अंगारकाय नम:* २६ *इन्द्राय नम:* २७ *विवस्वते नम:* २८ *दिप्तांशवे नम:* २९ *शुचये नम:* ३० *शौरये नम:* ३६ *शनैश्चराय नम:* ३२ *ब्रह्मणे नम:* ३३ *विष्णवे नम:* ३४ *रुद्राय नम:* ३५ *स्कन्दाय नम:* (३६ वैश्रवणाय नमः )  ३६ *वरुणाय नम:* ३७ *यमाय नम:* ३८ *वैद्युताग्नये नम:* ३९ *जाठराग्नये नम:* ४० *ऐन्धनाग्नये नम:* ४१ *तेजसाम्पतये नम:* ४२ *धर्मध्वजाय नम:* ४३ *वेदकर्त्रे नम:* ४४ *वेदांगाय नम:* ४५ *वेदवाहनाय नम:* ४६ *कृताय नमः* ४७ *त्रेताय नम:* ४८ *द्वापराय नम:* ४९ *सर्वमलाश्रय कलये नम:* ५० *कला -काष्ठा-मूहुर्तरुप समयाय नम:* ५१ *क्षपायै नम:* ५२ *यामाय नम:* ५३ *क्षणाय नम:* ५४ *संवत्सरकराय ...